अथ चरणपादुका कथा : जब पादुकाएँ विचार बन गई त्याग, सत्ता और समानता की कथा


अथ चरणपादुका कथा : जब पादुकाएँ विचार बन गई त्याग, सत्ता और समानता की कथा


चरणपादुका  अर्थात जूता — जिसके बारे में आम धारणा यही है कि यह पैरों को धरती की कठोरता से बचाता है। बस इतना ही काम है उसका, इससे ज़्यादा कुछ नहीं, प्रायः हम यही सोचते हैं। 

पर यही जूता, या पादुका, इतिहास में बार-बार एक साधारण वस्तु से उठकर ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक मर्यादा का प्रतीक बन जाता है — कभी त्याग का, कभी सत्ता की मर्यादा का, कभी भेदभाव का, तो कभी समानता की माँग का।

यह कहानी उन्हीं जूतों की है — जिन्हें उतारकर, त्यागकर, या दूसरे के लिए झुककर लोगों ने दुनिया को एक ही सबक सिखाया: दर्द समझने के लिए, पहले उस दर्द में उतरना पड़ता है। बुद्ध से लेकर रोम के सम्राट तक, अयोध्या के सिंहासन से लेकर रॉबेन आइलैंड की काल-कोठरी तक, हर सभ्यता ने अपने-अपने ढंग से यही सवाल पूछा है।

इसकों समझने की शुरुआत वर्तमान से करते है। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में एक नाम अचानक चर्चा में आ गया — दीपांशु शौकीन। एक डीटीसी बस कंडक्टर का बेटा, जिसे किसी बड़ी पार्टी ने टिकट तक नहीं दिया, निर्दलीय लड़ा और उपाध्यक्ष बनकर सबको चौंका दिया। जीत की वजह सिर्फ भाषण नहीं थी। सत्य निकेतन में एक इमारत गिरी थी, उसमें डीयू के कई छात्रों की जान चली गई थी। उसी दिन दीपांशु ने ठान लिया — अब जूता नहीं पहनूँगा। पूरा चुनाव-प्रचार नंगे पैर किया।

पूछने पर बस इतना कहते — "पैर में जो जलन होती है, वही मुझे हर पल याद दिलाती रहती है कि छात्र किस हाल में जी रहे हैं।"

अब तर्क से देखें तो सवाल उठता है — जूता उतारने से असमय काल कलवित हुए छात्रों को इंसाफ कैसे मिलेगा? न इमारत मज़बूत होगी, न कोई अफसर जेल जाएगा। फिर भी यह प्रतीक हज़ारों वोटों में बदल गया। क्यों? 

ज़रा सोचिए, आज किसी हादसे की खबर आते ही सोशल मीडिया पर मिनटों में "दुख की इस घड़ी में हम साथ हैं" जैसे संदेशों की बाढ़ आ जाती है, और अगले दिन कोई और खबर आते ही सब भूल जाते हैं। यह सहानुभूति सस्ती है, क्योंकि इसमें कुछ खोना नहीं पड़ता। 

असर तब पड़ता है जब आदमी अपनी ज़ुबान से नहीं, अपने पैरों की चमड़ी से बोलता है। यही फ़र्क़ है सहानुभूति जताने और दर्द को अपने भीतर उतार लेने में।

 भोजपुरी की एक पुरानी कहावत में है — "जाके पैर न फटे बिवाई, वो का जाने पीर पराई।" जिसका पैर कभी फटा ही नहीं, वो दूसरे का दर्द क्या जाने।

दीपांशु ने अपने ही पैर फड़वा लिए, ताकि दर्द को सिर्फ समझें नहीं, जिएँ भी। और यहीं से यह किस्सा एक छात्र नेता की निजी कहानी न रहकर, मानव सभ्यता की एक बहुत पुरानी परंपरा से जुड़ जाता है।
 
कैसे इसको जानने के लिए पीछे पुरातन काल में चलते है जहाँ बौद्ध ग्रंथों में सोण नाम के एक युवक की कथा मिलती है। वह इतने अमीर घर से थे कि उनके पैर के तलवों तक पर मुलायम रोएँ थे — यानी उसने कभी नंगे पैर धरती छुई ही नहीं थी। ऐसे बच्चे आज भी हमारे आस-पास हैं — फर्क सिर्फ इतना है कि आज उन्हें एसी गाड़ी से स्कूल भेजा जाता है, और तलवों की जगह मन के रोएँ मुलायम रह जाते हैं, दूसरों का दर्द छू ही नहीं पाता। बड़े-बड़े दफ्तरों में बैठकर मज़दूरों की "प्रोडक्टिविटी" पर रिपोर्ट लिखने वाले लोग भी अक्सर इसी श्रेणी में आते हैं — जिन्होंने कभी धूप में ईंट नहीं ढोई, वे मज़दूरी की दर तय करते हैं, और यही दूरी असंवेदनशीलता की जड़ बन जाती है।

महात्मा बुद्ध का उपदेश सुनकर सोण ने सब कुछ छोड़ दिया , भिक्षु बन गए , और इतनी शिद्दत से ध्यान-साधना में जुट गये कि उनके कोमल पैर फट गए, रास्ता खून से भर गया। तंग आकर सोचा — इतनी मेहनत के बाद भी कुछ हासिल नहीं हो रहा, घर लौट जाऊँ, धन है, दान-पुण्य से ही मोक्ष कमा लूँगा। यह वही मानसिकता है जो आज भी हर उस आदमी में दिखती है जो थोड़ी मेहनत करके तुरंत नतीजा चाहता है, वरना निराश होकर पीछे हट जाता है — किसी और की तकलीफ़ को समझने का जो थोड़ा-सा प्रयास शुरू किया था, वह भी बीच में छूट जाता है।

महात्मा बुद्ध को खबर लगी तो उन्होंने सोण से सीधा एक सवाल पूछा और समझाया — "वीणा बजाना जानते हो? तार बहुत कसा हो तो? टूट जाएगा। बहुत ढीला हो तो? सुर नहीं निकलेगा। ठीक कसा हो, तभी संगीत बजेगा।" 
एक लाइन में पूरा जीवन-दर्शन समझा दिया — न ज़्यादा अकड़ो, न ज़्यादा ढीले पड़ो, बीच का रास्ता ही टिकता है। 

सदियों बाद चीन के महान चिंतक कन्फ़्यूशियस ने भी लगभग यही बात दूसरे शब्दों में कही — संतुलन (मध्यम मार्ग) ही सद्गुण की जड़ है, न अति-भोग अच्छा है, न अति-त्याग।

अब आते है सोण पर, अरहंत बनने के बाद बुद्ध ने सोण के फटे पाँव कों देखकर उनकी तकलीफ कों कम करने के उदेश्य से उनको  जूता पहनने की छूट  दी।

सोण ने मना कर दिया और कहा कि — "मैंने अस्सी गाड़ी सोना और सात हाथी छोड़े हैं संन्यास के लिए। अब अगर मै अकेला जूता पहन लूँ तो लोग कहेंगे कि इतना त्याग करके भी जूते के मोह में पड़ गया।इसलिए यह सुविधा या तो पूरे संघ को मिले, अन्यथा मुझे भी नहीं चाहिए।" तब जाकर बुद्ध ने सभी भिक्षुओं के लिए जूते की इजाज़त दी।

अब ज़रा इसे आज के दौर से मिलाकर देखिए। आज सुविधा किसी एक को मिलती है तो वह उसे "अपनी मेहनत का फल" बताकर छाती फुला लेता है, बाकियों को भूल जाता है। 

सोण की महानता जूता स्वीकार कर लेने या लेने से इंकार में नहीं थी — उस एक सवाल में थी कि क्या यह सुविधा सबको मिलेगी, या सिर्फ मुझे? 

अब आज के परिदृश्य मेँ देखे हवाई अड्डों पर अलग लेन, अस्पतालों में अलग वार्ड, मंदिरों में "स्पेशल दर्शन" का टिकट — जब भी हम इनमें से किसी सुविधा का फ़ायदा उठाते हैं, कभी यह सवाल अपने अंतर्मन से पूछते हैं क्या कि यह जो व्यक्ति कतार में खड़ा है, उसे यह सुविधा क्यों नहीं मिली?

एक और अन्य उदाहरण देखते है अपने पिता दसरथ के वचनों के पालन हेतु राम वनवास चले गए, अयोध्या का तख्त खाली पड़ा था। भरत चाहते तो राजा बन सकते थे, कोई रोकने वाला नहीं था। पर वे चित्रकूट गए, राम से पादुकाएँ माँगीं, सिर पर रखकर लाए, सिंहासन पर बिठाईं, और खुद तपस्वी जैसा जीवन जीते हुए नंदिग्राम से राजकाज चलाते रहे। कहा — "यह राज्य मेरा नहीं, भाई की धरोहर है, मैं तो बस निगरानी कर रहा हूँ जब तक वे लौटें।"
     यह चरणपादुका वापस लाना उस समृद्ध विरासत, इच्छाशक्ति, जिम्मेदारी, नैतिकता का प्रतीक था, जो भरत के मन में व्याप्त थी, उस आदर्श कों स्थापित करने में सहयोग करना था जहाँ बड़े भाई ने अपने पिता के बचनों की लाज रखने हेतु सहर्ष वन गमन को स्वीकार किया और अपने कर्म, धर्म को ध्यान रखते हुए सीता और लक्ष्मण भी वन में साथ गए थे।
   यहाँ चरणपादुका उसी महान परम्परा, विरासत, वचनबद्धता, कर्तव्यबोध का प्रतीक थी जो सदियों से चली आ रही थी उसे मांगकर भरत ने वहा पुर्वजो के दिखाए मार्ग पर चलते हुए, अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने का संकल्प था।

भरत का यह किस्सा हर उस इंसान को आईना दिखाता है, जिसे कोई ज़िम्मेदारी अस्थायी तौर पर सौंपी जाती है, और वह उसे अपनी स्थायी मिल्कियत समझने लगता है — चाहे वह किसी परिवार की साझा संपत्ति की देखरेख हो, किसी संस्था का पद हो, या किसी और की सौंपी हुई अमानत। भरत के मुकाबले में रखिए तो एक बात साफ़ दिखती है — जिम्मेदारी मिलते ही आदमी के मन में सबसे पहला सवाल यह उठना चाहिए कि "यह मुझे सौंपा गया है, यह मेरा अपना नहीं है", न कि "अब यह मेरा है, जब तक मैं चाहूँ रखूँगा"।

दिलचस्प बात यह है कि यूरोप के राजनीतिक चिंतकों को यही बात समझाने में सदियाँ लग गईं।

सत्रहवीं-अठारहवीं सदी में जॉन लॉक और रूसो ने कहा कि जिसे भी सत्ता या अधिकार मिलता है, वह जनता या समुदाय ने उसे अमानत के तौर पर सौंपा है, यह उसकी निजी संपत्ति नहीं — इसी विचार को आगे चलकर "सामाजिक अनुबंध" (सोशल कॉन्ट्रैक्ट) कहा गया। 

रोम के सम्राट मार्कस ऑरेलियस, जो खुद सबसे बड़ी सत्ता के मालिक थे, अपनी डायरी "मेडिटेशंस" में खुद को याद दिलाते रहते थे कि जिसे भी अधिकार मिला है, वह जनता का स्वामी नहीं, उसका सेवक है, और सत्ता का घमंड आदमी को अंदर से खोखला कर देता है। 

भरत ने यह सिद्धांत किताब में नहीं, चरण पादुका को सिंहासन पर बिठाकर, व्यवहार में कर दिखाया था — यूरोप को उसे कागज़ पर उतारने में हज़ार-डेढ़ हज़ार साल और लग गए। और शायद हम सबको भी यह सवाल बार-बार खुद से पूछना बाकी है — जो कुछ भी मेरे हाथ में है, क्या वह वाकई मेरा है, या किसी की अमानत है जो मेरे पास कुछ समय के लिए है?


अब एक दूसरी कथा के माध्यम से इसे समझते है एक लोककथा है कि — यशोदा जी ने बाल कृष्ण से जंगल के काँटों से बचने के लिए जूते पहनने को कहा। कृष्ण ने जवाब दिया  — "मेरी गायें नंगे पैर चलती हैं, तो मैं अकेला जूता कैसे पहनूँ? पहले गायों के लिए जूते लाओ।" 

 इस कथा में  मज़ाक है — चार लाख गायें, सोलह लाख जूते! भला गायों के लिए जूते कहा बनते है,पर मर्म वही पुराना — जिस सुविधा में साथ चलने वाले शामिल नहीं, वह सुविधा अकेले भोगना ठीक नहीं। 

समाज में जब भी विकास और समृद्धि की बात होती है, तो बाल-कृष्ण का यह प्रकरण याद दिलाता है कि असली सवाल यह नहीं कि कितनों के पास जूते पहुँचे, बल्कि यह कि जो सबसे पीछे खड़ा है, क्या उस तक भी पहुँचे है ?


पर यह जूता हर बार त्याग, सेवा का ही प्रतीक नही रहा है।पश्चिम में यह कहानी एक भयावह रूप में दोहराई गई है — दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद दौर में रॉबेन आइलैंड जेल में नेल्सन मंडेला और उनके साथी काले कैदियों को जान-बूझकर ठंड में भी छोटी पतलून और घटिया जूते दिए जाते थे, जबकि अन्य नस्ल के कैदियों को बेहतर कपड़े मिलते थे — यानी जूता वहाँ सिर्फ पैर ढकने की चीज़ नहीं, नस्ल के आधार पर इंसान को छोटा साबित करने का हथियार बन गया था। 
            कैसे इसको मेरे पूर्व के एक ब्लॉग से जाने 

https://chanchalsohaon.blogspot.com/2026/06/blog-post_26.html 

सोचिए, जो चीज़ भारत में सोण और कृष्ण की कथाओं में समानता और सेवा का प्रतीक बनी, वही चीज़ दुनिया के एक हिस्से में भेदभाव और अपमान का औज़ार बन गई। 

यही फ़र्क़ है — जूता खुद कुछ नहीं है, उसे पहनाने या छीनने वाला हाथ ही उसका मतलब तय करता है। और यही वह जगह है जहाँ जागरूकता की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है — कि हम किसी भी साधारण चीज़ को किसी के अपमान का ज़रिया न बनने दें।

एक अन्य कथा में पांडवों के साथ किसी गुप्त यात्रा में द्रौपदी की खड़ाऊँ आवाज़ कर रही थी, दुश्मन को खबर लगने का डर था। कृष्ण ने खुद झुककर खड़ाऊँ उठाई, और अपने कपड़े में छिपा ली। भीष्म बोल उठे — जिसकी हिफाज़त के लिए भगवान खुद किसी की चप्पल उठा ले, उसे हराए कौन। 

अर्थात सहयोग, सेवा में कोई काम छोटा नहीं होता, उसके लिए भगवान अर्थात बड़े पद वाला व्यक्ति भी झुक सकता है। 

ईसाई परंपरा में भी लगभग वैसा ही एक दृश्य मिलता है — बाइबिल के मुताबिक ईसा मसीह ने अपने शिष्यों के पैर खुद धोए थे, यह दिखाने के लिए कि जो सबसे बड़ा बनना चाहता है, उसे सबसे पहले सबसे छोटे की सेवा करनी होगी। हमारे अपने घरों में भी अक्सर यही भूल दोहराई जाती है — घर का बड़ा सदस्य छोटे काम को "मेरी हैसियत से नीचे" मानकर टाल देता है, जबकि यहाँ खुद परमात्मा झुककर चप्पल उठा रहा है या पैर धो रहा है।

अमेरिकी लेखिका हार्पर ली ने अपने मशहूर उपन्यास में लिखवाया था कि किसी इंसान को तब तक मत आँको, जब तक उसकी खाल में घुसकर, उसके नज़रिए से दुनिया देख न लो। 

एक पुरानी अमेरिकी आदिवासी कहावत कहती है —कि किसी की मोकासिन (चमड़े के जूते) पहनकर एक मील चले बिना उसका न्याय मत करो।

 जर्मन दार्शनिक नीत्शे ने भी एक तीखी बात कही थी — कि आराम और सुविधा अक्सर इंसान की आत्मा को कमज़ोर बना देते हैं, जबकि तकलीफ़ से गुज़रा हुआ इंसान ही गहराई पाता है। यही वजह है कि जिसने कभी खुद तकलीफ़ नहीं झेली, वह दूसरे के दुख पर सांत्वना के शब्द तो बोल सकता है, पर उसकी गहराई को छू नहीं सकता।

जैन साधु-साध्वियों की परंपरा में नंगे पैर चलना गरीबी नहीं, तप और अपरिग्रह का प्रतीक रहा है — सवाल यही कि मैं अपने शरीर को कितनी सुविधा दूँ, कितना सामान अपने साथ ढोऊँ।

यहाँ यूनानी दार्शनिक डायोजनीज़ को भी याद करें, जो हर तरह के भौतिक सुख को त्यागकर एक मटके में रहते थे, और सिकंदर जैसे विश्व-विजेता सम्राट को भी बेझिझक टोक देते थे — जब सिकंदर ने पूछा "मुझसे कुछ माँगो", तो डायोजनीज़ ने कहा, "बस थोड़ा हटकर खड़े हो जाओ, तुम मेरी धूप रोक रहे हो।"

 सुविधा से ज्यादा आज़ादी ही असली ताकत है, यह उनका मानना था — और आज के दौर में जहाँ पद, प्रतिष्ठा और दिखावे के लिए लोग अपनी रीढ़ तक गिरवी रख देते हैं, वहाँ डायोजनीज़ की यह बेपरवाही किसी करारे तमाचे से कम नहीं लगती।

उन्नीसवीं सदी के अमेरिकी विचारक हेनरी डेविड थोरो ने भी लगभग यही रास्ता चुना — शहर की भीड़-भाड़ और भौतिक सुविधाएँ छोड़कर जंगल में एक झोंपड़ी बनाकर रहने लगे, सिर्फ यह जानने के लिए कि इंसान को असल में जीने के लिए कितना कम चाहिए। उन्होंने लिखा कि ज़्यादातर लोग "शांत निराशा" का जीवन जीते हैं — जूते, कपड़े, घर, गाड़ी जमा करते-करते वे भूल जाते हैं कि जीवन का मक़सद क्या था।

आज के उपभोक्तावादी युग में, जहाँ हर साल नए मॉडल का जूता, नया फोन, नई गाड़ी "स्टेटस सिंबल" बन जाता है, थोरो की यह बात किसी चेतावनी से कम नहीं लगती — क्योंकि जितना हम जमा करने में डूबे रहते हैं, उतना ही दूसरे की ज़रूरत देखने की फुर्सत कम होती जाती है।

महात्मा गाँधी जी ने भी भारत में यही विचार सामाजिक जीवन में उतारा। तामझाम घटाया, आम आदमी जैसा जीवन जिया, ताकि खुद को उस दर्द के जितना करीब हो सके, रख सकें जिसे वे मिटाना चाहते थे। 

बिहार के किशनगंज में देवदास नाम के एक भक्त ने राम मंदिर बनने तक लगभग 23 साल जूता नहीं पहना, और प्राण-प्रतिष्ठा के दिन संकल्प पूरा किया। 

यह दिखाता है कि जूते अर्थात सुविधा के त्याग कि यह परंपरा किताबों में बंद नहीं है,आज भी साँस ले रही है — आस्था और संकल्प को शरीर पर उतारकर निभाने की क्षमता अब भी कहीं न कहीं ज़िंदा है।

अब कुछ सवाल हम सभी के सामने है।

सोण ने पूछा था — सुविधा सबको मिलेगी या सिर्फ मुझे? 
भरत ने पूछा — जो मेरे हाथ में है, क्या वह वाकई मेरा है? 
कृष्ण ने पूछा — मेरे साथ चलने वाले नंगे पैर हों तो मैं अकेला कैसे जूता पहनूँ? 
डायोजनीज़ ने पूछा — तुम्हारी सारी ताकत मेरी धूप भी नहीं छीन सकती, तो फिर तुम्हारी ताकत है क्या? 

रॉबेन आइलैंड के कैदियों की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि जिस चीज़ को कोई त्याग के प्रतीक की तरह चुनता है, वही चीज़ किसी और से ज़बरदस्ती छीनकर अपमान का हथियार भी बनाई जा सकती है — फ़र्क़ सिर्फ नीयत का होता है।

आज हमारे पास जूते पहले से ज़्यादा हैं, सुविधाएँ पहले से ज़्यादा हैं, और सहानुभूति जताने के तरीके भी खूब हैं — एक संदेश भेज देना, एक पोस्ट शेयर कर देना, बिना अपनी जगह से हिले। दर्द को समझने का दावा अब एक "क्षण" बन गया है, जो आता है और गुज़र जाता है। 

ऐसे में दीपांशु का नंगे पैर चलना अगर वाकई असर कर गया, तो शायद इसलिए कि आज किसी और के दर्द को सच में अपने शरीर पर उतार लेना इतना दुर्लभ हो गया है कि लोग उसे देखकर चौंक जाते हैं — जैसे किसी रेगिस्तान में अचानक कोई हरा पेड़ दिख जाए।

तो सवाल अपने आप से पूछने वाला है कि — जो जूता हम पहने बैठे हैं, क्या वो हमें अपने आस-पास फैले नंगे पैरों से दूर तो नहीं कर रहा? और अगर कोई सुविधा हमें अकेले मिल रही हो, तो क्या हम कभी सोण की तरह पूछते हैं — यह सबको भी मिलेगी न? या हम बस इतना कहकर संतोष कर लेते हैं कि "मेरी मेहनत है, मुझे मिलनी ही चाहिए" — और यह भूल जाते हैं कि जिस रास्ते पर हम जूता पहनकर चल रहे हैं, वहीं बगल में कोई नंगे पैर, फटी बिवाई लिए, हमारा ही रास्ता साफ़ कर रहा है?

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