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सड़क पर आए नारे: सिर्फ गुस्सा नहीं, टूटते भरोसे की चेतावनी।

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सड़क पर आए नारे: सिर्फ गुस्सा नहीं, एक चेतावनी है। दिल्ली में हाल ही में नारे लगे: "एक कचौड़ी दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा", "मेरे सिर में दर्द है, उसका कारण मर्द है।" कुछ लोग कहेंगे कि यह गुस्से में निकले शब्द हैं, इन पर इतना क्यों सोचना? पर यह समझना अब नादानी होगी। जो बात कल तक मज़ाक, ताने और रील में थी, वह आज सड़क पर नारा बन गई है। जब कोई बात हँसी-मज़ाक से निकलकर सड़क पर आ जाए, तो समझिए वह लोगों के मन में बैठ चुकी है। यह चिंता सिर्फ मेरी नहीं है। समाजशास्त्री, कानूनविद् और मनोवैज्ञानिक, तीनों अपने-अपने तरीके से इस बदलाव को समझाते हैं। आइये सबसे पहले देखते है कि सामाजिक विचारक इस पर क्या कहते हैं। फ्रांस के समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम ने डेढ़ सौ साल पहले चेताया था कि जब समाज में साझा नियम और आपसी बंधन कमज़ोर पड़ते हैं, तो लोग दिशाहीन और अकेले हो जाते हैं।   उन्होंने इस हालत को "एनोमी" यानी मूल्यहीनता की स्थिति कहा। अमेरिकी विद्वान रॉबर्ट पुटनम ने अपनी किताब Bowling Alone में दिखाया कि जहाँ आपसी मेल-जोल और भरोसा घटता है, वहाँ समाज की ताकत घट...

कागज

जब  कागज़  जीत गया और इंसान हार गया ओडिशा के जीतू मुंडा को अपनी मृत बहन का कंकाल कंधे पर उठाकर बैंक जाना पड़ा  यह एक घटना नहीं, इस व्यवस्था का असली चेहरा है। अप्रैल 2026 क्योंझर, ओडिशा व्यवस्था_रूपी_राक्षस कागज़_नामक_दैत्य जगह -मल्लिप्सी गाँव · क्योंझर जिला · ओडिशा अप्रैल की  तपती दोपहर  में 42 वर्षीय जीतू मुंडा अपनी मृत बहन ककरा मुंडा का  कंकाल कंधे पर उठाए , जलती धूप में तीन किलोमीटर पैदल चलकर ओडिशा ग्रामीण बैंक की शाखा पहुँचता है जानते है क्यों, उसे अपनी मृत बहन के जन धन खाते में पड़े पैसे निकालने थे  उसकी माँग बेहद मामूली थी — बहन के खाते में जमा  ₹19,300 उसे दिया जाए  लेकिन जिस व्यवस्था ने उसे यहाँ तक पहुँचाया था उसने कागज़ माँगे, दस्तावेज़ माँगे, और जब कुछ नहीं बना तो उसे श्मशान से बहन की हड्डियाँ उठानी पड़ीं। यह कोई फ़िल्म का दृश्य नहीं। यह  2026 के "डिजिटल इंडिया" का असली चेहरा  है। पूरी कहानी यह है कि  ककरा मुंडा की ज़िंदगी पहले ही बर्बाद हो चुकी थी। पति जा चुका था, इकलौता बेटा जा चुका था। दो महीने पहले वह भी चली गई। जी...