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Showing posts from September, 2026

अथ चरणपादुका कथा : जब पादुकाएँ विचार बन गई त्याग, सत्ता और समानता की कथा

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अथ चरणपादुका कथा : जब पादुकाएँ विचार बन गई  त्याग, सत्ता और समानता की कथा चरणपादुका  अर्थात जूता — जिसके बारे में आम धारणा यही है कि यह पैरों को धरती की कठोरता से बचाता है। बस इतना ही काम है उसका, इससे ज़्यादा कुछ नहीं, प्रायः हम यही सोचते हैं।  पर यही जूता, या पादुका, इतिहास में बार-बार एक साधारण वस्तु से उठकर ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक मर्यादा का प्रतीक बन जाता है — कभी त्याग का, कभी सत्ता की मर्यादा का, कभी भेदभाव का, तो कभी समानता की माँग का। यह कहानी उन्हीं जूतों की है — जिन्हें उतारकर, त्यागकर, या दूसरे के लिए झुककर लोगों ने दुनिया को एक ही सबक सिखाया: दर्द समझने के लिए, पहले उस दर्द में उतरना पड़ता है। बुद्ध से लेकर रोम के सम्राट तक, अयोध्या के सिंहासन से लेकर रॉबेन आइलैंड की काल-कोठरी तक, हर सभ्यता ने अपने-अपने ढंग से यही सवाल पूछा है। इसकों समझने की शुरुआत वर्तमान से करते है। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में एक नाम अचानक चर्चा में आ गया — दीपांशु शौकीन। एक डीटीसी बस कंडक्टर का बेटा, जिसे किसी बड़ी पार्टी ने टिकट तक नहीं दिया, निर्दलीय लड़ा और उपाध्यक...

अथ चरणपादुका कथा : जब पादुकाएँ विचार बन गई त्याग, सत्ता और समानता की कथा

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अथ चरणपादुका कथा : जब पादुकाएँ विचार बन गई  त्याग, सत्ता और समानता की कथा चरणपादुका  अर्थात जूता — जिसके बारे में आम धारणा यही है कि यह पैरों को धरती की कठोरता से बचाता है। बस इतना ही काम है उसका, इससे ज़्यादा कुछ नहीं, प्रायः हम यही सोचते हैं।  पर यही जूता, या पादुका, इतिहास में बार-बार एक साधारण वस्तु से उठकर ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक मर्यादा का प्रतीक बन जाता है — कभी त्याग का, कभी सत्ता की मर्यादा का, कभी भेदभाव का, तो कभी समानता की माँग का। यह कहानी उन्हीं जूतों की है — जिन्हें उतारकर, त्यागकर, या दूसरे के लिए झुककर लोगों ने दुनिया को एक ही सबक सिखाया: दर्द समझने के लिए, पहले उस दर्द में उतरना पड़ता है। बुद्ध से लेकर रोम के सम्राट तक, अयोध्या के सिंहासन से लेकर रॉबेन आइलैंड की काल-कोठरी तक, हर सभ्यता ने अपने-अपने ढंग से यही सवाल पूछा है। इसकों समझने की शुरुआत वर्तमान से करते है। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में एक नाम अचानक चर्चा में आ गया — दीपांशु शौकीन। एक डीटीसी बस कंडक्टर का बेटा, जिसे किसी बड़ी पार्टी ने टिकट तक नहीं दिया, निर्दलीय लड़ा और उपाध्यक...

जब रिश्ते टूटते हैं, तो एक समाज जन्म लेता है — उदास समाज

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  जब रिश्ते टूटते है, घर बिखरते हैं, आपसी सम्बन्धों में संवाद हीनता उत्पन्न हो जाती है तो क्या तब व्यक्ति के साथ साथ समाज भी, सामाजिक अवसाद की चपेट में आ जाता है? क्या आज हमारा समाज और देश भी उसी कगार पर खड़ा है। और क्या सामाजिक अवसाद सभ्यता के लिए भी खतरा बन जाता है आज इसी विषय पर चिंतन है। एक बात हमेशा याद रखिए — कोई सभ्यता उस दिन नहीं गिरती जिस दिन उसका खजाना खाली होता है। वह उस दिन गिरनी शुरू होती है जिस दिन उसके लोगों के मन से भरोसा उठ जाता है। आज भारत को देखिए। एक तरफ चाँद पर हमारा तिरंगा है, फोन से एक सेकंड में पैसा इधर से उधर हो रहा है, सड़कें चौड़ी हो रही हैं, शहर चमक रहे हैं। और दूसरी तरफ? घर के भीतर झाँकिए। रिश्तों में वही चमक कहाँ है? पति-पत्नी के बीच बातचीत घटकर "हाँ", "ठीक है", "पता नहीं" रह गई है। भाई-भाई ज़मीन के टुकड़े पर अदालत में खड़े हैं। बेटा माँ-बाप को वृद्धाश्रम छोड़ आया है और खुद मोबाइल में "फैमिली टाइम" की रील बना रहा है। पड़ोसी का नाम तक नहीं पता, लेकिन उसकी हर पोस्ट पर लाइक ज़रूर है। सवाल यह नहीं है कि देश तरक्की कर रहा ...

टूटते रिश्ते - बिखरते घर : रिश्तों का अकेलापन

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टूटते रिश्ते - बिखरते घर  जब घर एक पता बनकर रह जाए एक बार सोचिए — आपके दादा-परदादा के ज़माने में घर कैसा दिखता था? एक बड़ा-सा आँगन, बीच में तुलसी का चौरा, चारों तरफ़ कमरे, और उन कमरों के बीच रात को कोई दरवाज़ा बंद नहीं होता था। चाची की रसोई से आती खुशबू पूरे घर में फैलती थी, और बच्चे यह तय नहीं कर पाते थे कि माँ किसकी है — घर की हर औरत माँ जैसी लगती थी। अब ज़रा आज का घर देखिए — हर कमरे में ताला, हर हाथ में मोबाइल, और खाना भी अब "साथ बैठकर" नहीं, "अपने-अपने समय पर" खाया जाता है। पहले घर एक जगह हुआ करता था जहाँ लौटा जाता था। अब घर सिर्फ़ एक पता बनकर रह गया है, जहाँ बस रुका जाता है। सुनने में यह बात मामूली लगती है, पर ज़रा ठहरकर सोचिए — इसी छोटे से फ़र्क़ के भीतर हमारे पूरे समय की टूटन छिपी बैठी है।  अब गाँव-कस्बों में भी वह पुरानी साझी थाली कम ही दिखती है। भाई-भाई ज़मीन के एक टुकड़े के लिए अदालत के चक्कर काट रहे हैं, बेटा बूढ़े बाप को बोझ समझने लगा है, और कई घरों में पति-पत्नी एक ही छत के नीचे दो अजनबियों की तरह जी रहे हैं — साथ रहते हुए भी अकेले।  पड़ोस म...

पैसा साधन है या स्वामी ?

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पैसा साधन है या स्वामी।  “सुख,संतोष,रिश्तों और उस  अंतहीन दौड़ पर एक सवाल।”  Altruistic behaviour, wellbeing,sufficiency, contentment — यह वाक्य मात्र शब्द नहीं, मानव जीवन के दर्शन का  सार है। आज यह शब्द अनायास याद नहीं आए। कल एक सामूहिक परिचर्चा में हमारे अज़ीज़ मित्र, शुभचिंतक सुशील जी का एक प्रश्न उठा — पैसा ही सुख है, या सुख के लिए सहजता, समन्वय, शांति, भाईचारा अहम है? सुनने में यह प्रश्न सामान्य लगा, कुछ लोगों ने हल्के में लिया, किसी ने मुस्कुराकर टाल भी दिया। पर जो प्रश्न सतह पर सरल दिखे, ज़रूरी नहीं कि वह भीतर से भी सरल हो। पेड़ से फल नीचे ही क्यों गिरा — इस एक प्रश्न ने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को जन्म दिया। इसलिए  कोई भी प्रश्न औचित्यहीन नहीं होता। जो प्रश्न  बचकाना बताकर टाल दिया जाता है, कई बार वही  सबसे बड़े उत्तर की दहलीज़ होता है — बस पूछने वाले की नीयत और सुनने वाले का धैर्य साथ  होना चाहिए। जीवन से जुड़े प्रश्नों ने सिद्धार्थ को महात्मा बुद्ध बना दिया। सुशील जी का यह प्रश्न भी ऐसा ही था। यह भागती-दौड़ती, गला-काट प्रतिस्...

“फिर भी वह घूमती है: सत्य की खोज में अज्ञानता की कहानी”

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  फिर भी वह घूमती है — सत्य की खोज में अज्ञानता की कहानी मनुष्य जब से इस धरती पर आया है, एक प्रश्न उसके मन में सदा कौंधता रहा है—सत्य क्या है? उपनिषद् कहते हैं—“सत्यमेव जयते”, बौद्ध दर्शन सम्यक दृष्टि पर बल देता है और सुकरात से जुड़ी प्रसिद्ध उक्ति है—“स्वयं को जानो।” हम जो देखते हैं, सुनते हैं और अनुभव करते हैं, वही हमारी वास्तविकता मान लेते हैं। पर जीवन में ऐसे क्षण आते हैं जब आँख का देखा भी धोखा दे देता है और कान का सुना भी असत्य निकलता है। मरुस्थल में प्यासे यात्री को जल का भ्रम होता है, अंधेरे में रस्सी साँप दिखाई देती है। तब प्रश्न उठता है—यदि हमारी इन्द्रियाँ ही कभी-कभी भ्रामक हो सकती हैं, तो सत्य का आधार क्या है? और इससे भी बड़ा प्रश्न— क्या हम जो जानते और समझते हैं, उससे परे भी कोई सत्य हो सकता है? इतिहास इसका उत्तर देता है—और वह उत्तर चौंकाने वाला है। “जो हम नहीं जानते, वह आवश्यक रूप से असत्य नहीं होता; वह केवल हमारे लिए अभी अज्ञात हो सकता है।” अज्ञानता और असत्य एक नहीं हैं। अज्ञानता और असत्य दो अलग-अलग अवस्थाएँ हैं। अज्ञानता का अर्थ है—किसी विषय के बारे में पर्याप्त ज्ञा...

विवेक का पतन: जब समाज सोचना बंद कर देता है — लोकतंत्र, असहमति और नागरिक चेतना का संकट

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  विवेक का पतन: जब समाज सोचना बंद कर देता है किसी भी समाज की असली ताकत सिर्फ उसकी सेना, पैसे या तकनीक में नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसके लोगों की सोचने, सवाल करने और सही-गलत को तर्क और प्रमाण के आधार पर समझने की क्षमता में होती है। जब लोग सवाल पूछना छोड़ देते हैं, जब वे हर बात को बिना जाँचे सच मान लेते हैं और जब आलोचना को दुश्मनी समझने लगते हैं, तब समाज धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। लोकतंत्र का मतलब सिर्फ वोट डालना नहीं है। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक अपने नेता से भी सवाल कर सके, दूसरी राय सुन सके और नया तथ्य सामने आने पर अपनी राय बदलने का साहस रखे। आज की दुनिया, खासकर सोशल मीडिया के दौर में, यही सबसे बड़ी चुनौती है। हमारे पास जानकारी पहले से कहीं अधिक है, लेकिन उस जानकारी को समझने, परखने और संदर्भ में देखने की चुनौती भी उतनी ही बढ़ गई है। इसलिए सबसे बड़ा सवाल यह है— क्या हम सच में सोच रहे हैं, या सिर्फ वही दोहरा रहे हैं जो हमें पहले से बताया गया है? काण्ट की सीख: खुद सोचो जर्मन दार्शनिक इमैनुएल काण्ट ने 1784 में अपने प्रसिद्ध निबंध What Is  Enlightenment? में प्र...