अथ चरणपादुका कथा : जब पादुकाएँ विचार बन गई त्याग, सत्ता और समानता की कथा
अथ चरणपादुका कथा : जब पादुकाएँ विचार बन गई त्याग, सत्ता और समानता की कथा चरणपादुका अर्थात जूता — जिसके बारे में आम धारणा यही है कि यह पैरों को धरती की कठोरता से बचाता है। बस इतना ही काम है उसका, इससे ज़्यादा कुछ नहीं, प्रायः हम यही सोचते हैं। पर यही जूता, या पादुका, इतिहास में बार-बार एक साधारण वस्तु से उठकर ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक मर्यादा का प्रतीक बन जाता है — कभी त्याग का, कभी सत्ता की मर्यादा का, कभी भेदभाव का, तो कभी समानता की माँग का। यह कहानी उन्हीं जूतों की है — जिन्हें उतारकर, त्यागकर, या दूसरे के लिए झुककर लोगों ने दुनिया को एक ही सबक सिखाया: दर्द समझने के लिए, पहले उस दर्द में उतरना पड़ता है। बुद्ध से लेकर रोम के सम्राट तक, अयोध्या के सिंहासन से लेकर रॉबेन आइलैंड की काल-कोठरी तक, हर सभ्यता ने अपने-अपने ढंग से यही सवाल पूछा है। इसकों समझने की शुरुआत वर्तमान से करते है। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में एक नाम अचानक चर्चा में आ गया — दीपांशु शौकीन। एक डीटीसी बस कंडक्टर का बेटा, जिसे किसी बड़ी पार्टी ने टिकट तक नहीं दिया, निर्दलीय लड़ा और उपाध्यक...