जब घर एक पता बनकर रह जाए
एक बार सोचिए — आपके दादा-परदादा के ज़माने में घर कैसा दिखता था? एक बड़ा-सा आँगन, बीच में तुलसी का चौरा, चारों तरफ़ कमरे, और उन कमरों के बीच रात को कोई दरवाज़ा बंद नहीं होता था। चाची की रसोई से आती खुशबू पूरे घर में फैलती थी, और बच्चे यह तय नहीं कर पाते थे कि माँ किसकी है — घर की हर औरत माँ जैसी लगती थी। अब ज़रा आज का घर देखिए — हर कमरे में ताला, हर हाथ में मोबाइल, और खाना भी अब "साथ बैठकर" नहीं, "अपने-अपने समय पर" खाया जाता है।
पहले घर एक जगह हुआ करता था जहाँ लौटा जाता था। अब घर सिर्फ़ एक पता बनकर रह गया है, जहाँ बस रुका जाता है। सुनने में यह बात मामूली लगती है, पर ज़रा ठहरकर सोचिए — इसी छोटे से फ़र्क़ के भीतर हमारे पूरे समय की टूटन छिपी बैठी है।
अब गाँव-कस्बों में भी वह पुरानी साझी थाली कम ही दिखती है। भाई-भाई ज़मीन के एक टुकड़े के लिए अदालत के चक्कर काट रहे हैं, बेटा बूढ़े बाप को बोझ समझने लगा है, और कई घरों में पति-पत्नी एक ही छत के नीचे दो अजनबियों की तरह जी रहे हैं — साथ रहते हुए भी अकेले।
पड़ोस में ही किसी घर में देख लीजिए — बाहर से सब ठीक दिखता है, अंदर से रिश्ते कब के दरक चुके होते हैं।
अब सवाल उठता है, यह हुआ आख़िर कैसे? इसका जवाब सिर्फ़ किस्से-कहानियों में नहीं मिलता, बड़े-बड़े विद्वानों ने भी इस पर सिर खपाया है और कुछ ऐसी बातें कही हैं जो सुनकर लगता है, जैसे वे हमारे ही घर की बात कर रहे हों।
एक जर्मन विद्वान थे टोनीज़, आज से क़रीब डेढ़ सौ साल पहले उन्होंने एक बात कही थी जो आज एकदम सटीक बैठती है।
उनका कहना था — रिश्ते दो तरह के होते हैं। एक वो जो दिल से बंधे होते हैं, जैसे परिवार, जहाँ बिना मतलब के भी लोग एक-दूसरे का साथ निभाते हैं।
और दूसरे वो जो सिर्फ़ फ़ायदे के लिए बनते हैं, जैसे दुकानदार और ग्राहक का रिश्ता।
टोनीज़ को डर था कि एक दिन आधुनिक दुनिया पहली तरह के रिश्तों को भी दूसरी तरह में बदल देगी।
आज परिवार को देखिए — क्या यह डर सच नहीं हो गया?
एक और विद्वान थे ज़िग्मंट बाउमन, उन्होंने एक बहुत मज़ेदार बात कही — आज के रिश्ते "पानी" जैसे हो गए हैं।
जिस बर्तन में डालो, उसी का आकार ले लेते हैं, पर ठोस कभी नहीं बनते। मन बदला, रिश्ता बदल दो — जैसे मोबाइल का सिम कार्ड निकालकर दूसरा लगा लिया जाए।
मनोविज्ञान की दुनिया से एक बड़ा नाम है एरिक फ्रॉम। उन्होंने अपनी किताब To Have or To Be में एक बात कही जो हर घर पर लागू होती है — जब समाज "जीने" की जगह "जमा करने" को ही ज़िंदगी का मक़सद बना ले, तो इंसान चीज़ें तो इकट्ठी करने लगता है, पर रिश्तों को जीना भूल जाता है। फिर पत्नी, बच्चे, माँ-बाप — सब धीरे-धीरे "मैनेज" की जाने वाली चीज़ें बन जाते हैं, प्यार से जिए जाने वाले लोग नहीं रहते।
और इसका असर सिर्फ़ बड़ों तक सीमित नहीं रहता, बच्चों पर तो और गहरा असर पड़ता है।
मनोवैज्ञानिक जॉन बाउल्बी कहते हैं कि बच्चे का पहला भरोसा उसके घर से बनता है। अगर यह भरोसा एक बार टूट जाए, तो वह बच्चा पूरी ज़िंदगी भीतर से डरा-सहमा रहता है।
अमेरिका की मनोवैज्ञानिक जूडिथ वालरस्टीन ने दशकों तक तलाकशुदा घरों के बच्चों पर नज़र रखी और पाया कि यह डर बचपन में ही ख़त्म नहीं होता — वे बच्चे बड़े होकर भी रिश्ता जोड़ने से घबराते हैं, जैसे टूटे घर की छाया उनका पीछा कभी छोड़ती ही नहीं।
अब बात सबसे पुराने और सबसे डरावने अध्ययन की।
एमिल दुर्खाइम नाम के एक फ्रांसीसी विद्वान ने आज से सवा सौ साल पहले आत्महत्या के आँकड़े खंगाले थे। उन्होंने पाया — जिन समाजों में पारिवारिक जुड़ाव कमज़ोर पड़ता है, वहाँ आत्महत्या की दर बढ़ जाती है। वजह सीधी है — इंसान को जीने के लिए सिर्फ़ रोटी-कपड़ा-मकान नहीं चाहिए, किसी अपने से जुड़े होने का एहसास भी उतना ही ज़रूरी है।
रॉबर्ट पुटनम ने अपनी किताब Bowling Alone में अमेरिका के हाल के आँकड़े दिखाए — लोग अब अकेले खाना खाते हैं, अकेले घूमते हैं, अकेले खेलते हैं, और यही अकेलापन आज सबसे बड़ी बीमारी बनता जा रहा है।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का एक अध्ययन तो अस्सी साल से चल रहा है, और उसका नतीजा चौंकाने वाला है — इंसान की सेहत और लंबी उम्र तय करने वाली सबसे बड़ी चीज़ न पैसा है, न कसरत, न परहेज़ — बल्कि उसके अपनों के साथ के गहरे, भरोसे वाले रिश्ते हैं।
अमेरिका के सर्जन जनरल ने तो हाल ही में एक रिपोर्ट में साफ़ लिख दिया — अकेलापन अब महामारी बन चुका है, और यह शरीर के लिए उतना ही ख़तरनाक है जितना रोज़ कुछ सिगरेट पीना।
क्रिस्टोफ़र लाश नाम के एक और विद्वान ने परिवार को "एक निर्दयी दुनिया में शरण की जगह" कहा था।
पर आज विडंबना देखिए — वही शरणस्थली भी अब बाज़ार के हिसाब-किताब से चलने लगी है। घर के भीतर भी अब लेन-देन है, त्याग की जगह शर्तें आ गई हैं।
सवाल उठता है बदलाव आया कैसे और सवाल यह भी उठता है कि यह अचानक नहीं हुआ तो फिर हुआ कैसे? किसी एक दिन तो घर नहीं टूटा, यह तो धीरे-धीरे, चुपके-चुपके हुआ बदलाव है — जैसे दीमक लकड़ी को अंदर से खाती है, ऊपर से लकड़ी वैसी ही दिखती रहती है।
सबसे पहला कारण है — गाँव से शहर की ओर भागना।
पहले संयुक्त परिवार इसलिए टिकते थे क्योंकि खेत साझे थे, ज़मीन साझी थी, काम साझा था। जब बेटा नौकरी के लिए शहर गया, तो वह अकेला गया — कमरा छोटा था, ख़र्चा सीमित था, माँ-बाप गाँव में ही रह गए। धीरे-धीरे यही "मजबूरी" आदत बन गई, और आदत सोच बन गई — कि अलग रहना ही सही तरीक़ा है।
यही वह प्रक्रिया है जिसे समाजशास्त्री उलरिख बेक "व्यक्तिकरण" कहते हैं — यानी इंसान अब परिवार, गाँव, बिरादरी से जुड़कर नहीं, अकेले अपने दम पर जीने-मरने का हौसला रखने लगा।
दूसरा बड़ा कारण है — पैसे का बढ़ता महत्व और बाज़ार की सोच का घर में घुस आना। पहले ज़िंदगी में सफलता का मतलब था — इज़्ज़त, रिश्ते, मेलजोल। अब सफलता का मतलब सिमट गया है — बड़ा घर, बड़ी गाड़ी, बैंक बैलेंस।
समाजशास्त्री जॉर्ज सिमेल ने यही कहा था — पैसा जब साधन से लक्ष्य बन जाता है, तो रिश्ते अपने आप उपकरण बनने लगते हैं। आज भाई अपने भाई को "फ़ायदे-नुक़सान" के हिसाब से आँकता है, यही उसका नतीजा है।
तीसरा कारण, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता — मोबाइल और सोशल मीडिया।
पहले शाम को पूरा परिवार आँगन में या छत पर बैठकर गप्पें मारता था। अब शाम को सब एक ही कमरे में बैठे हैं, पर हर कोई अपनी-अपनी स्क्रीन में डूबा है। साथ बैठे होने का मतलब अब साथ होना नहीं रह गया — "अकेले में साथ रहना" यही आज के घर की सबसे बड़ी सच्चाई बन गई है।
चौथा कारण है — कानून और अदालतों का रिश्तों में हस्तक्षेप बढ़ना।
पहले घर के झगड़े घर में ही, बड़े-बुज़ुर्गों की मौजूदगी में सुलझ जाते थे। अब हर छोटी बात के लिए वकील, अदालत, और थाना — यही रास्ता समझा जाने लगा है। जब रिश्तों को सुलझाने के लिए क़ानून की ज़रूरत पड़ने लगे, तो समझिए कि आपस की समझ पहले ही टूट चुकी होती है।
पाँचवाँ और शायद सबसे गहरा कारण है — शिक्षा और परवरिश में बदलाव।
पहले बच्चों को सिखाया जाता था "मिलजुलकर रहो, बड़ों का आदर करो, बाँटकर खाओ"। आज की परवरिश ज़्यादातर "आगे बढ़ो, प्रतियोगिता जीतो, किसी से पीछे मत रहो" पर केंद्रित है।
मनोवैज्ञानिक बैरी श्वार्ट्ज़ जिसे "maximizer" कहते हैं — यानी हमेशा सबसे बेहतर की तलाश में रहने वाला इंसान — वही आज की इस परवरिश की उपज है, और शोध यही बताता है कि ऐसे लोग "पर्याप्त" में संतोष पाने वालों से कहीं अधिक अशांत रहते हैं।
इसका असर समाज पर कैसे पड़ा,अब बात करें कि इस बदलाव का असर समाज पर कैसे पड़ा है।
सबसे पहला - और सबसे दर्दनाक असर — बुज़ुर्गों की हालत पर पड़ा है। जो माँ-बाप कभी पूरे परिवार की धुरी हुआ करते थे, आज वृद्धाश्रमों की तरफ़ धकेले जा रहे हैं। यह सिर्फ़ शहरों की बात नहीं रही, अब छोटे कस्बों-गाँवों में भी वृद्धाश्रम खुलने लगे हैं — यह अपने आप में बताता है कि समाज किस दिशा में जा रहा है।
दूसरा असर - पड़ा है बच्चों की मानसिक सेहत पर। टूटते घरों में पलने वाले बच्चे, या जिन्हें माँ-बाप का पूरा समय और ध्यान नहीं मिलता, वे बड़े होकर आत्मविश्वास की कमी, अकेलापन और रिश्ते बनाने में डर लेकर जीते हैं। स्कूलों में बढ़ता तनाव, कम उम्र में डिप्रेशन के मामले — इसकी जड़ें कहीं न कहीं घर की टूटन से जुड़ी हैं।
तीसरा असर पड़ा है - समाज के आपसी भरोसे पर। पहले पड़ोसी भी परिवार जैसे होते थे — किसी के घर मुसीबत आए तो पूरा मोहल्ला साथ खड़ा होता था। अब पड़ोसी का नाम तक पता नहीं होता।
पुटनम इसी को "सामाजिक पूंजी" का ख़त्म होना कहते हैं — जब लोग एक-दूसरे पर भरोसा करना छोड़ देते हैं, तो पूरा समाज कमज़ोर पड़ने लगता है, अपराध बढ़ते हैं, मदद माँगने में शर्म आने लगती है।
चौथा असर — शादी और परिवार जैसी संस्थाओं पर से भरोसा उठता जा रहा है। तलाक़ की बढ़ती दर, लिव-इन का चलन, अकेले रहने की बढ़ती चाहत — यह सब इसी बात का संकेत है कि लोग अब स्थायी रिश्तों में सुरक्षा नहीं, बोझ महसूस करने लगे हैं।
और पाँचवाँ, सबसे व्यापक असर — मानसिक अकेलापन। सर्जन जनरल जिसे "महामारी" कह चुके हैं, वही अकेलापन अब हमारे यहाँ भी क़दम रख चुका है। भरे-पूरे घर में रहते हुए भी लोग भीतर से अकेले हैं — और जो साथ, जो सुनना, जो अपनापन कभी घर के भीतर मुफ़्त में मिल जाता था, आज उसे "काउंसलिंग" के नाम पर पैसे देकर ख़रीदना पड़ रहा है। जो रिश्ता कभी दिल से मिलता था, आज बाज़ार का सामान बन गया है।
तो कुल मिलाकर बात यह निकलती है — यह बदलाव किसी एक झटके में नहीं आया, यह कई छोटी-छोटी वजहों का जोड़ है — रोज़गार की मजबूरी, पैसे की अंधी दौड़, मोबाइल की लत, बदलती परवरिश, और क़ानून का बढ़ता दख़ल।
जिस बात की आशंका विद्वानों ने डेढ़ सौ साल पहले जताई थी, हम आज ठीक उसी मुहाने पर खड़े हैं — फ़र्क़ बस इतना है कि तब यह आशंका थी, आज यह हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी बन चुकी है।
सवाल अब यह नहीं कि यह हुआ क्यों, सवाल यह है कि क्या हम इसे पहचानकर वापस मुड़ने की हिम्मत रखते हैं, या इसे भी "समय की माँग" कहकर, ताली बजाते हुए, ख़ुद अपने गले लगा लेंगे।
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