लाओत्से की एक पुरानी कथा है कि चीन के किसी राज्य में वे एक बार न्याय-मंत्री बनाए गए। पहले ही दिन अदालत में एक चोरी का मामला आया — एक व्यक्ति ने चोरी की, पकड़ा गया, सामान बरामद हुआ, उसने अपराध कबूल भी कर लिया। साहूकार गुस्से में खड़ा था, दंड की मांग कर रहा था।
लाओत्से ने फैसला सुनाया — चोर को छह महीने की सज़ा, और साहूकार को भी छह महीने की। साहूकार भड़क उठा — "यह कैसा न्याय है? जिसकी चोरी हुई, उसे ही सज़ा?"
लाओत्से का उत्तर था कि जब तक गांव की पूरी संपत्ति एक ही कोने में इकट्ठी होती रहेगी, चोरी रुकेगी नहीं — वह एक तरह से बाकी लोगों की मजबूरी बन जाएगी। चोर बाद में पैदा होता है, शोषण पहले खड़ा हो चुका होता है।
यह कथा सुनने में जितनी पुरानी लगती है, आज के भारत पर उतनी ही सटीक बैठती है। नैतिकता के भाषण और खाली जेबें हमारे यहां हर मंच से एक ही उपदेश दोहराया जाता है — भ्रष्टाचार मत करो, बेईमानी छोड़ो, चरित्र-निर्माण करो, स्कूलों में नैतिक शिक्षा दो। मानो चोरी और भ्रष्टाचार किसी चरित्र-दोष की उपज हों, किसी सामाजिक ढांचे की नहीं।
जबकि हकीकत यह है कि जिस दिन संसाधन इने-गिने हाथों में सिमटते चले जाएंगे, उस दिन बाकी बचे लोगों के लिए नैतिकता एक विलासिता बनकर रह जाएगी — जिसे ओढ़ने की गुंजाइश सिर्फ उन्हीं के पास होगी जिनके पास पहले से बहुत कुछ है।
गीता पढ़ाने से जेब नहीं भरती। रामायण के पाठ से बच्चे का पेट नहीं भरता। और जिस समाज में जीने के लिए ही रोज़ समझौता करना पड़े, वहां ईमानदारी की उम्मीद रखना क्रूरता है।
पूंजी का इकट्ठा होना ही असली अपराध है यहीं वह बिंदु आता है जिसे स्वीकार करने में हमारा तंत्र सबसे ज़्यादा हिचकिचाता है — कि सबसे बड़ी बेईमानी चोरी नहीं, शोषण है। और यह शोषण किसी एक व्यक्ति का पाप नहीं, एक पूरी व्यवस्था की बुनावट है, जो लगातार धन को एक दिशा में खींचती चली जाती है।
गांधीजी का हृदय-परिवर्तन वाला आदर्श भला था, पर भोला भी था। हर आदमी का हृदय गांधी जैसा नहीं होता, न ही होने वाला है। हृदय-परिवर्तन अपने आप नहीं होता — उसे करवाना पड़ता है, व्यवस्था के स्तर पर, निर्णय के स्तर पर। जिस तरह हम हत्या और चोरी को रोकने के लिए कानून बनाते हैं, उसी तरह शोषण को रोकने के लिए भी ठोस, संस्थागत निर्णय चाहिए — भावुक अपील से काम नहीं चलेगा।
पूंजीवाद के दो शिकार होते हैं — जिनके पास पूंजी नहीं, और जिनके पास बेतहाशा पूंजी है। यह सुनने में विरोधाभासी लगता है, पर गहराई से देखें तो साफ़ है — अत्यधिक धन भी उतना ही विकृत करता है जितना अत्यधिक अभाव। दोनों ही स्थितियां आदमी को सहज, मुक्त व्यक्तित्व बनने से रोकती हैं। एक तनाव गरीबी का तनाव है, दूसरा तनाव उस धन को बचाए रखने, बढ़ाते रहने का तनाव है। दोनों ही आदमी को आदमी नहीं रहने देते।
इसलिए पूंजीवाद-विरोध का मतलब पूंजीपति की दुश्मनी नहीं है, बल्कि उस ढांचे की समाप्ति है जो दोनों तरफ के लोगों को अमानवीय बनाए रखता है।
लाओत्से से हज़ारों मील दूर, यूनान में सुकरात भी लगभग इसी निष्कर्ष पर पहुंचे थे, हालांकि उनका रास्ता अलग था। सुकरात के लिए न्याय कोई बाहरी नियम-पालन नहीं था, बल्कि आत्मा की एक भीतरी अवस्था — जब आत्मा के अलग-अलग हिस्से अपनी-अपनी जगह पर, संतुलन में हों। अन्याय, उनकी दृष्टि में, हमेशा आत्मा की बीमारी है — चाहे वह अन्याय करने वाले में हो या सहने वाले में। और सबसे दिलचस्प बात यह कि सुकरात अन्याय करने वाले को अन्याय सहने वाले से भी ज़्यादा अभागा मानते थे, क्योंकि सहने वाले का शरीर या धन भले क्षतिग्रस्त हो, पर करने वाले की आत्मा ही सड़ जाती है।
इस कसौटी पर परखें तो साहूकार, जिसने पूरे गांव की संपत्ति एक कोने में समेट ली, चोर से कम अभागा नहीं ठहरता। बल्कि सुकराती तर्क से तो वह ज़्यादा अभागा है — क्योंकि जिस व्यवस्था ने उसे इतना इकट्ठा करने दिया, उसी व्यवस्था ने उसकी आत्मा को भी उतना ही विकृत किया है, भले उसकी तिजोरी भरी दिखे।
इसी बात को आगे बढ़ाते हुए सुकरात के शिष्य प्लेटो ने अपनी कृति "रिपब्लिक" में एक बेहद तीखी बात कही थी — कि जिस नगर में असमानता बहुत बढ़ जाती है, वह नगर असल में एक नहीं, दो नगर बन जाता है: एक अमीरों का, एक गरीबों का — और ये दोनों आपस में लगातार युद्धरत रहते हैं, भले ऊपर से एक ही झंडे के नीचे खड़े दिखें।
प्लेटो के लिए यह विभाजन ही राज्य के पतन की जड़ थी। इसीलिए उन्होंने अपने आदर्श राज्य के संरक्षक वर्ग के लिए निजी संपत्ति के संचय को ही वर्जित कर दिया था — उनका मानना था कि जिनके हाथ में सत्ता या ज़िम्मेदारी हो, उन्हें धन-संचय से जान-बूझकर दूर रखना होगा, वरना निजी लाभ सार्वजनिक न्याय को निगल जाएगा।
आज के भारत में यह दो-नगरों वाली तस्वीर किसी रूपक जैसी नहीं, सीधी यथार्थवादी तस्वीर लगती है — एक भारत जो चमकते मॉल और गगनचुंबी इमारतों में रहता है, और एक भारत जो उसी शहर की झुग्गियों से रोज़ मज़दूरी ढूंढ़ने निकलता है। दोनों एक ही नक्शे पर हैं, पर मानो दो अलग सभ्यताएं हों।
अरस्तु ने इस पूरी बहस को और बारीक कर दिया। अपनी पुस्तक "राजनीति" में उन्होंने धन-अर्जन के दो रूपों में फ़र्क़ किया — एक वह जिसे उन्होंने 'ओइकोनोमिया' कहा, यानी घर-परिवार और समुदाय की वास्तविक ज़रूरतों के लिए संसाधन जुटाना, जिसकी एक स्वाभाविक सीमा होती है; और दूसरा वह जिसे उन्होंने 'खरेमातिस्तिके' कहा — यानी धन के लिए धन कमाना, मुनाफ़े के लिए मुनाफ़ा, जिसकी कोई स्वाभाविक सीमा ही नहीं होती।
अरस्तु की चेतावनी थी कि जब कोई समाज दूसरे रास्ते को ही सामान्य मान लेता है, तो धन-संचय एक असीमित, आत्मघाती जुनून बन जाता है — क्योंकि जिसकी कोई प्राकृतिक सीमा नहीं, वह कभी तृप्त नहीं होता।
यही वह बिंदु है जहां लाओत्से के साहूकार, प्लेटो के दो-नगर और अरस्तु का असीम मुनाफ़ा — तीनों एक ही जगह मिलते हैं। साहूकार की चोरी कानून की किताब में कहीं दर्ज नहीं होती, क्योंकि वह चोरी नहीं, "व्यापार" कहलाती है। पर अरस्तु के हिसाब से वही असीम, बे-लगाम संचय असली अनीति की जड़ है — चोर की छोटी, दृश्य चोरी नहीं।
अरस्तु ने यह भी कहा था कि न्याय का सार 'बराबर को बराबर और असमान को असमान' व्यवहार में है — यानी सामान वितरण नहीं, बल्कि आनुपातिक, समुचित वितरण। पर जब वितरण की शुरुआत ही इतनी तिरछी हो कि एक तरफ अकूत संपत्ति जमा हो और दूसरी तरफ रोटी के लाले हों, तो 'समुचित अनुपात' की बात एक क्रूर मज़ाक बनकर रह जाती है।
तो सवाल यह नहीं...
कि चोर को सज़ा मिले या न मिले। सवाल यह है कि हम कब तक सिर्फ चोर को कठघरे में खड़ा करते रहेंगे और उस साहूकार को नज़रअंदाज़ करते रहेंगे जिसने पूरे गांव की संपत्ति अपने एक कोने में समेट रखी है। जब तक यह सवाल नहीं पूछा जाएगा, नैतिकता के भाषण सिर्फ भाषण रह जाएंगे — और चोरी, अनीति व भ्रष्टाचार का ग्राफ वैसे ही ऊपर चढ़ता रहेगा जैसे बीते दशकों में चढ़ता आया है।
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