भले डांट घर में तू बीबी की खाना
भले जैसे-तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी न जाना
कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है
कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है
अहलमद से भी कोरी यारी नहीं है
तिवारी था पहले तिवारी नहीं है
कचहरी की महिमा निराली है बेटे
कचहरी वकीलों की थाली है बेटे
पुलिस के लिए छोटी साली है बेटे
यहाँ पैरवी अब दलाली है बेटे
कचहरी ही गुंडों की खेती है बेटे
यही ज़िन्दगी उनको देती है बेटे
खुले आम कातिल यहाँ घूमते हैं
सिपाही दरोगा चरण चूमते है
कचहरी में सच की बड़ी दुर्दशा है
भला आदमी किस तरह से फँसा है
यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे
यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे
कचहरी का मारा कचहरी में भागे
कचहरी में सोये कचहरी में जागे
मर जी रहा है गवाही में ऐसे
है तांबे का हंडा सुराही में जैसे
लगाते-बुझाते सिखाते मिलेंगे
हथेली पर सरसों उगाते मिलेंगे
कचहरी तो बेवा का तन देखती है
कहाँ से खुलेगा बटन देखती है
कचहरी शरीफों की खातिर नहीं है
उसी की कसम लो जो हाज़िर नहीं है
है बासी मुँह घर से बुलाती कचहरी
बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी
मुकदमें की फाइल दबाती कचहरी
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी
कचहरी का पानी जहर से भरा है
कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है
मुकदमा बहुत पैसा खाता है बेटे
मेरे जैसा कैसे निभाता है बेटे
दलालों नें घेरा सुझाया-बुझाया
वकीलों नें हाकिम से सटकर दिखाया
धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ
मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूंठा नहीं हूँ
नहीं कर सका मैं मुकदमें का सौदा
जहाँ था करौदा वहीं है करौदा
कचहरी का पानी कचहरी का दाना
तुम्हे लग न जाये तू बचना बचाना
भले और कोई मुसीबत बुलाना
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना
कभी भूल कर भी न आँखें उठाना
न आँखें उठाना न गर्दन फँसाना
जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी
वहीं कौरवों को सरग है कचहरी। ।
" कचहरी न जाना " — एक कवि की चेतावनी और पाँच करोड़ मुकदमों का सच
कैलाश गौतम जी ने कहा था — भले जैसे-तैसे गिरस्ती चलाना, मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना। यह पंक्तियाँ कविता नहीं, एक बाप की वसीयत हैं।
जब कोई कवि अपने बेटे को यह सीख दे कि जंगल में जाकर धूनी रमा लेना मंजूर है, बीबी की डाँट खाना मंजूर है, लेकिन कचहरी का रुख मत करना — तो समझ लीजिए वह कविता नहीं लिख रहा, वह एक पूरी सभ्यता का दर्द उँडेल रहा है।
अवधी-भोजपुरी के महाकवि कैलाश गौतम ने "कचहरी न जाना" में जो कुछ कहा, वह किसी एक परिवार की कथा नहीं है। यह उस हर आदमी की कहानी है जो सच लेकर कचहरी गया, और झूठ लेकर लौटा — या लौटा ही नहीं।
संख्याएँ जब कविता से भी क्रूर हों
👉 गौतम जी ने कहा है — "कचहरी का मारा कचहरी में भागे।"
अब ज़रा आँकड़े देखिए।
राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) और भारत न्याय रिपोर्ट के अनुसार, भारत के न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या 2024 में 5 करोड़ से अधिक हो गई।
पाँच करोड़। थोड़ा रुककर सोचिए — यह संख्या फ्रांस की कुल आबादी के बराबर है।
इस देश में बाप अपने बेटे को बहुत कुछ देकर जाते हैं — ज़मीन, कर्ज़, दुश्मनी, और संस्कार। कैलाश गौतम जी के पात्र ने कुछ अलग दिया। उन्होंने दिया — एक अनुभव।
"भले डाँट घर में तू बीबी की खाना,
मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना।"
यह वसीयत है। और वसीयत वही लिखता है जो ठोकर खा चुका हो।
पहले यह समझते है कि कचहरी है क्या
कचहरी न्याय का मंदिर है — ऐसा हमें पढ़ाया गया। लेकिन मंदिर में भगवान हों, यह ज़रूरी नहीं। मंदिर में पुजारी होते हैं, दलाल होते हैं, चढ़ावा होता है, और एक अँधेरा गर्भगृह होता है — जहाँ न्याय की मूर्ति है या नहीं, यह कोई नहीं जानता।
भारत के न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या 2024 में 5 करोड़ से अधिक हो गई। पाँच करोड़ — यह संख्या नहीं, एक राष्ट्रीय अपमान है। यह उन लोगों की संख्या है जो न्याय की लाइन में खड़े-खड़े बूढ़े हो गए।
लाइन आगे बढ़ती नहीं। टोकन नहीं मिलता। और काउंटर पर लिखा है — "अगली तारीख।"
👉 तीन मंजिला न्याय-महल और हर मंजिल पर ताला
इस देश में न्याय तीन मंजिलों में बँटा है — जिला अदालत, हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट। तीनों में एक बात समान है — भीड़।
👉पहली मंजिल - जिला न्यायालयों में लगभग 4.6 करोड़।
👉 दूसरी मंजिल - उच्च न्यायालयों में लगभग 63 लाख मामले लंबित हैं।
👉 सबसे ऊपरी मंजिल है सुप्रीम कोर्ट में 2025 के अंत तक 92,251 मामले लंबित थे, जिनमें 69,553 दीवानी और 18,864 आपराधिक मामले शामिल हैं।
मतलब ऊपर से नीचे तक — हर मंजिल पर भीड़ है, हर दरवाज़े पर ताला है, और हर खिड़की पर लिखा है — " समय खत्म हो गया है अगली डेट पर आइये। "
जिला अदालतों में 3.49 करोड़ से ज़्यादा मामले आपराधिक प्रकृति के हैं — 2 करोड़ मजिस्टीरियल, 56 लाख सिविल, 25 लाख सेशन केस, और 8 लाख से ज़्यादा मोटर दुर्घटना दावे।
मोटर दुर्घटना में जो मरा, उसका मुकदमा अभी अदालत में जीवित है। बस वह खुद नहीं है जो देख सके।
कवि ने कहा है — "कचहरी वकीलों की थाली है बेटे।"
थाली वकीलों की है, लेकिन खाना कौन पकाता है? वह एक थका हुआ जज — जिस पर हाई कोर्ट स्तर पर औसतन 1 हज़ार से ज़्यादा और जिला स्तर पर 500 से ज़्यादा केसों का बोझ है। उत्तर प्रदेश में तो हर जज पर 4,300 मामले लदे हैं।
सोचिए — एक आदमी, 4,300 मुकदमे। अगर वह रोज़ 10 केस भी निपटाए — बिना छुट्टी, बिना बीमारी, बिना त्योहार — तो एक केस की बारी 430 दिन बाद आएगी। और तब तक 4,300 नए केस और जुड़ चुके होंगे।
यह न्याय की व्यवस्था नहीं — यह सिसिफस का पत्थर है। रोज़ ऊपर चढ़ाओ, रात को फिर नीचे आ जाए।
👉 विडंबना कहें या कमजोरी भारत में प्रति दस लाख आबादी पर मात्र 21 न्यायाधीश हैं। विधि आयोग ने 50 की सिफारिश की थी।
सिफारिश फाइल में है। फाइल कहाँ है? शायद किसी अदालत में, लंबित।
👉 यहाँ एक और विडंबना है। सरकार स्वयं सबसे बड़ी वादी है — 50 प्रतिशत लंबित मामले सिर्फ राज्यों द्वारा प्रायोजित हैं।
यानी जो व्यवस्था न्याय देने का दावा करती है, वही सबसे ज़्यादा मुकदमे लड़ रही है। और वह मुकदमे जीतने के लिए नहीं लड़ती — खींचने के लिए लड़ती है। क्योंकि देरी उसके पक्ष में है। विरोधी पक्ष थक जाए, पैसे खत्म हों, मर जाए — तब फैसला अपने आप हो जाता है।
और इस सारे खेल पर सरकार खर्च करती है — न्यायपालिका पर प्रति व्यक्ति मात्र 182 रुपये। पुलिस पर 1,275 रुपये। और कानूनी सहायता के लिए — प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष केवल 6.46 रुपये।
6 रुपये 46 पैसे। इतने में एक चाय भी नहीं मिलती। लेकिन एक नागरिक का पूरे साल का न्याय-बजट यही है।
👉 "यहाँ झूठ की ही कमाई है बेटे, यहाँ झूठ का रेट हाई है बेटे।"
जेल — जहाँ बेगुनाह भी सज़ा काट रहे हैं
👉 कविता की सबसे सिहरा देने वाली पंक्ति है — "कचहरी के नल पर मुवक्किल मरा है।" यह सिर्फ रूपक नहीं है।
NCRB की जेल सांख्यिकी रिपोर्ट 2023 के अनुसार भारत की जेलों में कुल कैदियों में से 73.5% विचाराधीन कैदी हैं — यानी जिन पर अभी दोष भी सिद्ध नहीं हुआ।
तीन में से दो कैदी बेगुनाह हो सकते हैं — या नहीं भी हो सकते है। लेकिन यह तय नहीं हुआ। और जब तक तय नहीं होता — वे सलाखों के पीछे हैं। सड़ रहे हैं। परिवार बर्बाद हो रहा है। और अदालत में उनकी फाइल पर लिखा है — "अगली तारीख।"
2012 से 2022 के बीच 3 से 5 साल की अवधि के लिए जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई, जबकि 5 साल से अधिक समय तक बंद कैदियों की संख्या तीन गुनी हो गई।
और जेलों में जगह? राष्ट्रीय औसत अधिभोग दर 131% से अधिक है। उत्तर प्रदेश की कुछ जेलों में तो 250% से भी ज़्यादा।
जहाँ 100 के लिए जगह है, वहाँ 250 ठूँसे हैं। इसे जेल नहीं कहते — इसे कुनबा कहते हैं।
देश के सभी विचाराधीन कैदियों में से उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र मिलकर 42 प्रतिशत हैं। संयोग से यही तीन राज्य सबसे ज़्यादा "विकास" का दावा भी करते है।
यह कोई कोरी कल्पना नहीं है।अप्रैल 2022 में बिहार की एक अदालत ने एक व्यक्ति को 28 साल जेल में बिताने के बाद सबूतों के अभाव में हत्या के आरोप से बरी कर दिया। उसे 28 साल की उम्र में गिरफ्तार किया गया था, 58 साल की उम्र में रिहा किया गया।
28 साल। एक पूरी पीढ़ी।
जब वह अंदर गया था — उसकी माँ ज़िंदा थी। बच्चे छोटे थे। बाल काले थे। जब बाहर आया — माँ नहीं थी, बच्चे बूढ़े थे, बाल सफेद थे।
अदालत ने कहा — "सबूत नहीं मिले।"
किसी ने नहीं पूछा — उसके "28 साल कौन लौटाएगा?"
👉 और यह कोई अपवाद नहीं है। जिला और उच्च न्यायालयों में 30 से भी अधिक वर्षों से लंबित 1,69,000 मामले हैं।
यानी डेढ़ लाख से ज़्यादा मामले हैं जो 1994 से पहले के हैं
👉 2018 में नीति आयोग ने अनुमान लगाया था कि तत्कालीन दर पर मामलों का निपटारा करने में 324 साल से अधिक का समय लगेगा। तब 2.9 करोड़ मामले थे। आज 5 करोड़ हैं।
तो अब कितने साल लगेंगे? — यह गणना करने की ज़रूरत नहीं। बस इतना जान लीजिए कि आपके पड़पोते के पड़पोते भी जब कचहरी जाएँगे, तो शायद उनका नंबर आए।
"धनुष हो गया हूँ मैं टूटा नहीं हूँ,
मैं मुट्ठी हूँ केवल अंगूँठा नहीं हूँ।"
कैलाश गौतम जी का वह बाप अभी भी खड़ा है। थका हुआ, झुका हुआ — लेकिन टूटा नहीं। वह जानता है कि लड़ाई बेकार है। लेकिन चुप रहना उससे भी बड़ी हार है।
👉 "जहाँ पांडवों को नरक है कचहरी, वहीं कौरवों को सरग है कचहरी"
यह पंक्ति कविता का सबसे तीखा नश्तर है। और यही इस पूरे लेख का सार है।
जिसके पास पैसा है — वह तारीखें खरीदता है। जिसके पास ताकत है — वह गवाह बदलता है। जिसके पास दलाल हैं — वह फाइलें दबवाता है। और जो सच लेकर आया है, जिसके पास सिर्फ न्याय की उम्मीद है — वह घर बेचता है, ज़मीन बेचता है, जवानी बेचता है। और अंत में खाली हाथ लौटता है। या लौटता ही नहीं है।
क्योंकि बैकलॉग सालाना 2 से 3 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, क्योंकि निपटारे की दर नए मामलों की संख्या से मुश्किल से मेल खाती है। मतलब यह नाव डूब नहीं रही — लेकिन पानी लगातार भर रहा है। और खेवनहार? वे तारीखें काट रहे हैं।
अब सवाल उठता है कैलाश गौतम जी ने यह कविता क्यों लिखी? इसलिए नहीं कि वे अदालत के दुश्मन थे। इसलिए कि वे उस आदमी के दोस्त थे जो अदालत की चाहत रखता था — लेकिन अदालत ने उसे पहचाना नहीं।
यह कविता एक चेतावनी है। लेकिन यह चेतावनी तब तक नहीं सुनी जाएगी — जब तक पाँच करोड़ मुकदमे लंबित हैं। जब तक 73% कैदी बिना फैसले के जेल में हैं। जब तक एक जज पर 4,300 केस हैं। जब तक न्याय का बजट एक कप चाय से भी सस्ता है।
क्योंकि जब न्याय का मंदिर ही बीमार हो, तो क्या कोई आस्तिक यह कह सकता है कि "मंदिर मत जाओ"? फिर जाओ भी कहाँ?
वर्ष 2022-23 से 2024-25 तक देश भर की विभिन्न लोक अदालतों में 23.5 करोड़ से अधिक मामलों का निपटारा किया जा चुका है यह एक उम्मीद की किरण ज़रूर है, लेकिन असली मर्ज का इलाज नहीं।
कैलाश गौतम जी ने यह कविता दशकों पहले लिखी। तब से कंप्यूटर आ गए, ई-कोर्ट बने, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग होने लगी। लेकिन पाँच करोड़ मुकदमे आज भी इंसाफ का इंतज़ार कर रहे हैं। और लाखों लोग जेलों में बंद हैं — बिना दोष सिद्ध हुए — जिनकी ज़िंदगी तारीखों की भेंट चढ़ रही है।
इसीलिए कहीं न कहीं आज भी कोई बाप अपने बेटे को यही समझा रहा है —
"भले और कोई मुसीबत बुलाना,
कचहरी की नौबत कभी घर न लाना।"
असली सवाल यह है कि जब तक न्याय व्यवस्था को तेज़, सस्ता और निष्पक्ष नहीं बनाया जाता — तब तक कैलाश गौतम की यह पंक्तियाँ हर पीढ़ी के बाप की ज़ुबान पर रहेंगी।
और तब तक हर पीढ़ी का बाप अपने बेटे से यही कहता रहेगा —
"बुलाकर के दिन भर रुलाती कचहरी,
हमेशा नया गुल खिलाती कचहरी।"
Comments
Post a Comment