निंदक नियरे रखिए: आलोचना, लोकतंत्र और सत्ता का आईना — एक व्यापक विमर्श
कबीर का यह दोहा क्या आज भी जीवित है
"निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।"
संत कबीरदास जी का यह दोहा केवल एक साहित्यिक रचना नहीं है — यह एक सामाजिक-राजनीतिक दर्शन का संक्षिप्त विवेचन है। कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति आपकी आलोचना करता है, जो आपकी कमियों को उजागर करता है, उसे दूर नहीं भगाना चाहिए, बल्कि अपने आँगन में, अपने समीप एक कुटिया बनाकर रखना चाहिए। क्यों?
क्योंकि वह आलोचक बिना किसी बाहरी साधन के — बिना पानी के, बिना साबुन के — आपके स्वभाव को, आपकी व्यवस्था को, आपके चरित्र को निर्मल कर देता है। वह एक ऐसा आईना है जो आपके चेहरे की हर दाग-धब्बे को दिखा देता है, चाहे आपको वह देखना अच्छा लगे या न लगे।
भक्तिमाला में इसका भावार्थ दिया गया है कि "निंदा करने वाले लोगों को अपने पास में ही रखिए। कुटिया बनाकर उन्हें रखें। जो कि आपके दोष को बताकर ज्ञात करा देता है और आप अपने को संभाल लेते हैं। अपनी गलतियों को सुधार लेते हैं।"
कबीर का यह विचार पंद्रहवीं सदी का है, पर इसकी प्रासंगिकता आज इसलिए और भी तीव्र हो गई है क्योंकि आज का दौर ठीक विपरीत दिशा में चल रहा है।
आज आलोचक को आँगन में नहीं, जेल में भेजा जा रहा है। आलोचना को आईना नहीं, अपराध समझा जा रहा है। और इसी विरोधाभास को समझना इस विमर्श का मूल उद्देश्य है।
1 👉 कबीर के दोहे का दार्शनिक आधार:
कबीर का विचार केवल व्यक्तिगत नैतिकता तक सीमित नहीं है। इसके भीतर एक गहरा राजनीतिक दर्शन निहित है। जब कबीर कहते हैं कि निंदक को पास रखो, तो वे वास्तव में एक सत्ता-विज्ञान (science of power) की बात कर रहे हैं। उनका तर्क है कि:
- सत्ता स्वभाव से अहंकारी होती है — जो व्यक्ति सत्ता पर आसीन होता है, उसे धीरे-धीरे यह भ्रम होने लगता है कि वह अचूक है, निर्दोष है, सर्वश्रेष्ठ है।
- आलोचक इस भ्रम को तोड़ता है — वह सत्ता के अहंकार को चुभाने वाला काँटा है, जो उसे याद दिलाता है कि तुम भी इंसान हो, तुमसे भी भूल हो सकती है।
- सुधार की प्रेरणा आलोचना से आती है — जब तक कोई तुम्हारी कमी नहीं बताएगा, तुम उसे दूर करने का प्रयास ही नहीं करोगे।
यह वही सिद्धांत है जिसे आधुनिक राजनीति शास्त्र में "अवरोध और संतुलन" (Checks and Balances) कहा जाता है। जैसे संविधान में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका एक-दूसरे पर नियंत्रण रखती हैं, वैसे ही कबीर कह रहे हैं कि सत्ता पर आलोचना का नियंत्रण अनिवार्य है।
जैसा कि डॉ. ए.के. वर्मा कहते हैं: "आलोचना लोकतंत्र की आत्मा है। यदि इस आत्मा का स्वरूप विकृत हो जाए तो लोकतंत्र भी विकृत हो जाएगा।" जागरण
कबीर जानते थे कि जो व्यक्ति या व्यवस्था आलोचना से डरता है, वह अंततः पतन की ओर बढ़ता है — क्योंकि आलोचना का अभाव सत्ता के असीमित विस्तार को जन्म देता है, और असीमित सत्ता स्वेच्छाचार में बदल जाती है।
2 👉 वैश्विक दार्शनिक परंपरा: कबीर के यह विचार कोई एकाकी आवाज़ नहीं है। विश्व की दार्शनिक परंपरा में आलोचना को सभ्य समाज की आधारशिला माना गया है इसके अनेकों उदाहरण मौजूद है।
👉 प्राचीन यूनान में सुकरात ने अपने समय की एथेनियन व्यवस्था की कड़ी आलोचना की। उन्होंने युवाओं को सिखाया कि सवाल पूछना, सत्ता को चुनौती देना एक नागरिक का कर्तव्य है। सुकरात का मानना था कि नागरिक का दायित्व है कि वह कानून के प्रति सम्मान रखते हुए भी "कानून को समझाए या राज़ी करे यदि वह कुछ अनुचित कर रहा हो" (persuade the laws if they are doing something improper)।
सुकरात को इसी आलोचना के कारण जहर पीने का दंड मिला — उन पर आरोप था कि वे "युवाओं को भ्रष्ट कर रहे हैं" और "राज्य के देवताओं की उपासना नहीं करते।" यह इस बात का प्राचीनतम उदाहरण है कि सत्ता आलोचना को अपराध कैसे बना देती है।
👉 जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपने ग्रंथ "On Liberty" में मिल ने तीन प्रमुख तर्क दिए:
1. यदि कोई मत गलत है, तो भी उसे दबाना गलत है — क्योंकि सत्य केवल विरोध से और बहस से ही प्रकाश में आता है।
2. यदि कोई मत सत्य है, तो उसे दबाना और भी खतरनाक है — क्योंकि सत्य का दमन समाज को अंधकार में धकेल देता है।
3. यदि कोई मत आधा-सत्य है, तो भी आलोचना जरूरी है — क्योंकि आधे-सच को पूरे सच तक पहुँचने के लिए बहस चाहिए।
मिल कहते हैं कि आलोचना का दमन "मानव जाति को लूटना" है — क्योंकि उस मत में जो भी सत्य हो, वह सभी के लिए हानिकारक है। FIRE में मिल के तर्कों को इस प्रकार संक्षेपित किया गया है कि "मिल सलाह देते हैं कि आलोचना और समीक्षा का स्वागत करें — अपने विचारों और कार्य को स्पष्ट करने या सुधारने के एक तरीके के रूप में।"
👉 भगत सिंह ने अपने लेख "Why I Am an Atheist" और अन्य लेखन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही:
"Merciless criticism and independent thinking are the two necessary traits of revolutionary thinking."
(निर्दयी आलोचना और स्वतंत्र चिंतन — क्रांतिकारी विचार के दो आवश्यक लक्षण हैं।)
भगत सिंह आगे कहते हैं कि "जाओ और प्रचलित आस्था का विरोध करो, किसी नायक की, किसी महान व्यक्ति की आलोचना करो..." JSTOR में दर्ज उनके विचारों के अनुसार, उनका मानना था कि बिना आलोचना के कोई भी व्यवस्था, कोई भी नेतृत्व, कोई भी विचारधारा प्रगति नहीं कर सकती।
भगत सिंह जानते थे कि जो सत्ता आलोचना से डरती है, वह अंततः जनता की सत्ता को अपनी निजी सत्ता बना लेती है। Monthly Review में इसे इस रूप में व्यक्त किया गया है: "Criticism and independent thinking are the two indispensable qualities of a revolutionary."
👉 नोआम चोम्स्की (Noam Chomsky)ने अपने प्रसिद्ध निबंध "The Responsibility of Intellectuals" में कहा है :
"बुद्धिजीवी उस स्थिति में होते हैं कि वे सरकारों के झूठ को उजागर कर सकते हैं, कार्यों का विश्लेषण उनके कारणों, उद्देश्यों और अक्सर छिपे हुए इरादों के आधार पर कर सकते हैं।"
चोम्स्की का तर्क है कि बुद्धिजीवी का दायित्व है कि वह सत्ता के सत्य को सामने लाए, उसके आडंबरों को तोड़े, और जनता को सच बताए।
chomsky.info पर उपलब्ध इस निबंध में वे स्पष्ट कहते हैं कि जो बुद्धिजीवी सत्ता के सामने झुक जाते हैं, वे लोकतंत्र के सबसे बड़े शत्रु हैं। चोम्स्की का यह तर्क कबीर के विचार से आश्चर्यजनक रूप से मिलता है — कबीर निंदक को पास रखने की बात कर रहे हैं, चोम्स्की आलोचक को बोलने की स्वतंत्रता देने की।
👉 जॉर्ज ऑर्वेल ने अपने अप्रकाशित प्रस्तावना "The Freedom of the Press" में लिखा :
"Freedom of the press, if it means anything at all, means the freedom to criticize and oppose."
(प्रेस की स्वतंत्रता, यदि इसका कोई अर्थ है भी, तो वह आलोचना और विरोध करने की स्वतंत्रता है।)
ऑर्वेल ने "Nineteen Eighty-Four" में उस दुनिया का चित्रण किया जहाँ आलोचना केवल अपराध नहीं, बल्कि 'विचार-अपराध' (thought-crime) बन गई है — जहाँ सोचना भी खतरनाक है, बोलना तो दूर की बात है।
Orwell Foundation पर उपलब्ध इस निबंध में ऑर्वेल चेतावनी देते हैं कि जब सत्ता यह तय करने लगे कि कौन-सी आलोचना 'न्यायोचित' है और कौन-सी 'अवमाननापूर्ण', तो स्वतंत्रता का अंत शुरू हो जाता है।
👉 रवींद्रनाथ ठाकुर ने "गीतांजलि" में लिखा:
"यहाँ चित्त जेथा भयशून्य, उच्च जेथा शिर..."
(Where the mind is without fear and the head is held high...)
ठाकुर का दृष्टिकोण था कि बिना निर्भीक मन के, बिना आलोचना की स्वतंत्रता के, कोई भी राष्ट्र सच्चे अर्थों में स्वतंत्र नहीं हो सकता।
Nobel Prize पर उपलब्ध लेख में दर्शाया गया है कि ठाकुर ने राष्ट्रवाद की आलोचना की थी क्योंकि उन्हें भय था कि राष्ट्रवाद, जब विचारधाना बन जाए, तो मानव आत्मा को संकुचित कर देता है।
Countercurrents पर उपलब्ध विश्लेषण के अनुसार: "He loved India deeply. Yet he feared that nationalism, when turned into an ideology, could narrow the human spirit."
👉 एडुआर्डो गेलेआनो कहते थे: "मैं दान में विश्वास नहीं करता। मैं एकजुटता में विश्वास करता हूँ। दान ऊर्ध्वाधर है — ऊपर से नीचे तक। एकजुटता क्षैतिज है — बराबर से बराबर।"
Goodreads — यह दृष्टिकोण इस बात को रेखांकित करता है कि आलोचना केवल निंदा नहीं, बल्कि एक नैतिक एकजुटता का अभिव्यक्ति है — आलोचक दुश्मन नहीं, साथी है।
कबीर दास का विचार और आज की वास्तविकता के बीच एक गहरी खाई अस्तित्व में आ गई है। आइए देखते हैं कि यह खाई कैसे बनी:
👉 The Messiah Complex आज के दौर में एक खतरनाक प्रवृत्ति दिखती है — सत्ता पर आसीन व्यक्ति स्वयं को केवल शासक नहीं, बल्कि मसीहा, सर्वश्रेष्ठ, अवतार, दूसरे चाणक्य आदि के रूप में प्रस्तुत करता है। यह मसीहा-संलक्षण (Messiah Complex) एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है जिसमें:
- व्यक्ति को लगता है कि वह अचूक है, अतुलनीय है, अपरिहार्य है।
- कोई भी आलोचना उसे व्यक्तिगत आघात लगती है, न कि व्यवस्थागत सुधार का अवसर।
- आलोचक को दुश्मन, राष्ट्रद्रोही, षड्यंत्रकारी या 'विदेशी शक्तियों का एजेंट' घोषित कर दिया जाता है।
इसका परिणाम यह होता है कि सत्ता सवालों से बचने लगती है। सवाल पूछना 'अशक्ति' का संकेत समझा जाने लगता है। और जब सत्ता सवालों से बचती है, तो व्यवस्था अपनी कमियों को स्वीकार करना बंद कर देती है।
आलोचना का आपराधीकरण किया जाता है, आज आलोचना को विभिन्न कानूनी हथकंडों से दबाया जा रहा है:
- राजद्रोह कानून (Sedition) — जो ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में बनाया गया था, आज वह अपने ही नागरिकों के खिलाफ प्रयोग हो रहा है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (UAPA, NSA) — 'राष्ट्रीय सुरक्षा' के नाम पर आलोचकों को वर्षों तक बिना आरोप-पत्र के जेल में रखा जा सकता है।
- अवमानना (Contempt) — न्यायालय या विधायिका की 'गरिमा' के नाम पर आलोचना को दंडनीय बनाया जा सकता है।
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं स्पष्ट किया है कि "अवमानना की शक्ति आलोचकों को चुप कराने की तलवार नहीं है" और कानून यह मानता है कि न्यायोचित आलोचना (fair criticism) अवमानना नहीं मानी जाती।
नवभारत टाइम्स में दर्ज विवरण के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अवमानना का अधिकार आलोचना को दबाने का साधन नहीं हो सकता।
फिर भी, व्यवहार में इन कानूनों का प्रयोग अक्सर आलोचना को दबाने के लिए किया जाता है। इसका कारण यह है कि 'न्यायोचित आलोचना' और 'अवमाननापूर्ण आलोचना' की सीमा अस्पष्ट है, और यह निर्णय अक्सर उसी सत्ता के हाथ में होता है जिसकी आलोचना की जा रही है।
डर का वातावरण बनाया जाता है जब आलोचना के परिणाम भयानक हो जाते हैं — जेल, बर्खास्तगी, सामाजिक बहिष्कार, ऑनलाइन उत्पीड़न, 'ट्रॉलिंग', तब एक डर का वातावरण बन जाता है। इस वातावरण में:
- लोग बोलना बंद कर देते हैं — न कहने को भी 'समझदारी' कहा जाने लगता है।
- मीडिया सत्ता की आलोचना के बजाय उसकी स्तुति में लग जाता है — 'फुट-स्टूल पत्रकारिता' का उदय।
- बुद्धिजीवी सन्नाटे में चले जाते हैं — या तो सत्ता के साथ चलते हैं, या पलायन कर जाते हैं।
ऑर्वेल ने इसी स्थिति का वर्णन किया था — जब लोग सच कहने की स्वतंत्रता खो देते हैं, तो वे अंततः सच को पहचानने की क्षमता भी खो देते हैं।
Oxford Academic में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, ऑर्वेल का मानना था कि स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अर्थ है — जो सच लगता है, उसे उसी रूप में कह पाना जिस रूप में वह अनुभव होता है।
कथनी और करनी में अंतर उत्पन्न होता है : हम ऋषि-महर्षियों की संतान होने का गर्व करते हैं, उनके नाम जोड़कर बात करते हैं, पर उनकी कही बातों को जीवन में उतारना भूल जाते हैं। यह कथनी और करनी का द्वंद्व है — हम जो कहते हैं, वह हम करते नहीं।
- हम कबीर को 'महान संत ' कहते हैं, कबीर-जयंती मनाते हैं, उनके दोहों को पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाते हैं — पर कबीर का सबसे अहम दोहा "निंदक नियरे रखिए" को जीवन में नहीं अपनाते।
- हम भगत सिंह को 'राष्ट्रीय वीर' कहते हैं, उनकी तस्वीरें लगाते हैं — पर भगत सिंह की सबसे मूल बात "क्रांतिकारी विचार के लिए आलोचना जरूरी है" को भूल जाते हैं।
- हम ठाकुर की "यहाँ चित्त जेथा भयशून्य" का गान करते हैं — पर भयशून्य चित्त के लिए आलोचना की स्वतंत्रता देना भूल जाते हैं।
- हम सुकरात को पश्चिमी दर्शन का पिता मानते हैं — पर सुकरात की विधि, सवाल पूछने की विधि, को 'विद्रोह' कहकर दबा देते हैं।
यह विभेद क्यों उत्पन्न हुआ है? इसके कई कारण हैं:
- अनुष्ठानवाद (Ritualism) — हम विचारकों को पूजने लगे, समझने के बजाय। पूजा से विचार नहीं आता, केवल प्रतिमा चढ़ती है।
- सत्ता-सम्मान (Power-worship) — हमारी सांस्कृतिक आदत बन गई है कि जो सत्ता पर है, उसे सम्मान दो, चाहे वह योग्य हो या नहीं। 'बड़े बूढ़े की बात मानो' वाली परंपरा आलोचना को असभ्यता समझती है।
- गौरव-व्यापार (Heritage-commerce) — अतीत के गौरव को वर्तमान की राजनीतिक फायदे के लिए प्रयोग किया जाता है, बिना उस गौरव के वास्तविक आत्म-तत्व को अपनाए।
कथनी और करनी के इस अंतर का परिणाम घातक होता है:
- विश्वसनीयता का पतन — जब हम कहते एक हैं और करते दूसरे हैं, तो हमारी बातों पर कोई विश्वास नहीं करता।
- अनुकरण का अभाव — आने वाली पीढ़ी देखती है कि बड़े कहते एक हैं, करते दूसरे हैं — तो वे भी यही सीखते हैं।
- व्यवस्था का शोथ (systemic rot) — जब व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे लोग कथनी और करनी में अंतर रखते हैं, तो यह संस्कृति नीचे तक फैल जाती है।
"मनुष्य की करनी और कथनी में अंतर नहीं होना चाहिए। व्यक्ति जो कहता है, उसे वही करना चाहिए। व्यक्ति का गौरव उसकी कथनी से है।"
आलोचना स्वस्थ लोकतंत्र का सजग प्रहरी है
आलोचना और तुलना लोकतान्त्रिक मूल्यों की आत्मा होती है।
आलोचना और तुलना लोकतान्त्रिक मूल्यों के लिए नितांत जरूरी हैं। क्यों इसे समझते है।
- तुलना के बिना विकल्प नहीं — लोकतंत्र का मूल तर्क है कि नागरिक तुलना करके चुनाव करें। बिना तुलना के चुनाव अर्थहीन है।
- आलोचना के बिना सुधार नहीं — यदि कोई व्यवस्था अपनी कमियों को नहीं जानेगी, तो वह उन्हें कैसे दूर करेगी?
- प्रहरी के बिना शोषण — आलोचक ही वह सजग प्रहरी है जो सत्ता के शोषण को रोकता है। बिना प्रहरी के, सत्ता अनियंत्रित हो जाती है।
PolSci Institute में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार: "Dissent is the act of saying 'no' to authority, and far from being a threat to democracy, it may be one of its most essential features." PolSci Institute — यानी असहमति लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं, बल्कि उसका सबसे आवश्यक तत्व है।
फिर इससे डर और दूरी क्यों? इसके कारण गहरे हैं:
- अहंकार (Ego) — सत्ता पर आसीन व्यक्ति को लगता है कि आलोचना उसकी 'इज्जत' पर आघात है, जबकि वास्तव में आलोचना उसके 'कार्य' पर प्रतिक्रिया है।
- असुरक्षा (Insecurity) — जो व्यक्ति स्वयं में सुरक्षित महसूस नहीं करता, वह आलोचना को खतरा समझता है। आत्मविश्वासी व्यक्ति आलोचना का स्वागत करता है।
- सत्ता-लोलुपता (Power-addiction) — सत्ता एक व्यसन है। जो व्यक्ति सत्ता के व्यसन में है, वह हर उस आवाज़ से डरता है जो उसकी सत्ता पर सवाल उठाती है।
- विचारधानात्मक कट्टरता (Ideological Fundamentalism) — जब कोई व्यवस्था एक विचारधारा को 'सत्य' मान लेती है, तो हर आलोचना उसे 'धर्मद्रोह' लगती है।
निंदक अपराधी नहीं, आईना है — इस सत्य को स्वीकारना होगा।
आईना क्या करता है? वह आपको वैसा ही दिखाता है जैसे आप हैं — न बढ़ा-चढ़ाकर, न घटा-घटाकर। यदि आपके चेहरे पर दाग है, तो आईना उसे दिखाएगा। यदि आप आईने को तोड़ दें, तो दाग गायब नहीं होता — केवल आपको दिखना बंद हो जाता है।
👉 कबीर का निंदक वही आईना है। वह सत्ता के चेहरे के दाग दिखाता है। यदि सत्ता उस आईने को तोड़ देती है — आलोचक को जेल में डाल देती है, उसे चुप करा देती है — तो सत्ता के दाग गायब नहीं होते, केवल उन्हें देखने वाला आईना टूट जाता है। और टूटे हुए आईने के टुकड़े अक्सर उसी को घायल करते हैं जो उसे तोड़ता है।
👉 जवाबदेही तय करनी होंगी — चाहे वह कोई हो यह लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है — कोई भी व्यक्ति, कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सवालों के दायरे से ऊपर नहीं है।
👉 संविधान सवालों के लिए बना है, सत्ता की रक्षा के लिए नहीं — संविधान का मूल उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा है, न कि सत्ता की।
- सत्ता का स्रोत जनता है, ईश्वर नहीं — लोकतंत्र में सत्ता जनता से आती है, और जनता का हर प्रतिनिधि जनता के सवालों का जवाबदेह है।
- कोई 'सर्वश्रेष्ठ' नहीं, केवल 'जवाबदेह' है — लोकतंत्र किसी को 'सर्वश्रेष्ठ' या 'मसीहा' नहीं मानता। यह हर व्यक्ति को 'जवाबदेह' मानता है। 'सर्वश्रेष्ठ' बनाने की परंपरा राजतंत्र की है, लोकतंत्र की नहीं।
भारत और विश्व के कई हिस्सों में एक खतरनाक प्रवृत्ति है — किसी एक व्यक्ति को 'सर्वश्रेष्ठ', 'मसीहा', 'देवता', 'अवतार' घोषित कर देना। इसके भयानक परिणाम होते हैं:
- व्यक्ति-पूजा (personality cult) लोकतंत्र की जड़ काट देती है — क्योंकि जब एक व्यक्ति 'परम' हो जाता है, तो उसकी आलोचना 'पाप' बन जाती है।
- व्यवस्था व्यक्ति पर आश्रित हो जाती है — और जब वह व्यक्ति गलत करता है, तो व्यवस्था उसे रोक नहीं पाती।
- विकल्प की संभावना समाप्त हो जाती है — 'मसीहा' के सामने कोई विकल्प नहीं हो सकता, क्योंकि विकल्प 'द्रोह' है।
इस परंपरा को रोकना होगा। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी योग्य हो, सत्ता के पद पर आसीन होने के बाद 'सर्वश्रेष्ठ' नहीं बन जाता। वह जनता का सेवक है, जनता का मालिक नहीं।
👉 "मानवीय जीवन समन्वय की नीति पर आधारित है।" यह सत्य है। मानव समाज का विकास संघर्ष और समन्वय दोनों से हुआ है। पर समन्वय अधिक महत्वपूर्ण है। समन्वय का अर्थ है:
- सत्ता और आलोचना के बीच संवाद — सत्ता आलोचना से भागे नहीं, बल्कि उससे संवाद करे।
- अधिकार और दायित्व का संतुलन — सत्ता के अधिकार उतने ही हैं जितने उसके दायित्व।
- विविधता और एकता का सामंजस्य — आलोचना विविधता का अभिव्यक्ति है, और विविधता लोकतंत्र की शक्ति है।
- सवाल और जवाब का निरंतर चक्र — स्वस्थ लोकतंत्र सवालों और जवाबों के निरंतर चक्र से जीवित रहता है, मौन से नहीं।
जब यह समन्वय टूटता है — जब सत्ता आलोचना से इनकार कर देती है — तो समाज में विघटन शुरू हो जाता है। सत्ता एकतरफा हो जाती है, और एकतरफा सत्ता अंततः स्वेच्छाचार में बदल जाती है।
कबीर दास जी का यह विचार आज प्रासंगिक है?
न केवल प्रासंगिक, बल्कि आज इसकी आवश्यकता पंद्रहवीं सदी से अधिक है। उस दौर में सत्ता राजतंत्रीय थी, और आलोचना का दमन प्रत्यक्ष था। आज सत्ता लोकतांत्रिक होने का दावा करती है, पर आलोचना के दमन के साधन अधिक परिष्कृत और व्यापक हैं — कानून, संस्थाएँ, मीडिया, टेक्नोलॉजी सब इस दमन के साधन बन सकते हैं।
सत्ता सवालों से क्यों बच रही है? क्योंकि सत्ता ने स्वयं को 'सर्वश्रेष्ठ' और 'मसीहा' मान लिया है। जो व्यक्ति स्वयं को अचूक समझता है, वह सवालों को अपनी 'अचूकता' पर आघात समझता है। और जब अहंकार बढ़ता है, तो सवाल से बचना स्वभाव हो जाता है।
आलोचना अपराध क्यों बन गई?
क्योंकि सत्ता ने 'राष्ट्रहित', 'सुरक्षा', 'गरिमा', 'अपराध' जैसे शब्दों को इस तरह परिभाषित कर दिया है कि उनमें सत्ता की आलोचना समा जाती है। 'राष्ट्र' को 'सत्ता' के समानार्थी बना दिया गया है — इसलिए सत्ता की आलोचना 'राष्ट्रद्रोह' बन जाती है।
व्यवस्था अपनी कमी क्यों स्वीकार नहीं करती?
क्योंकि कमी स्वीकार करने का अर्थ है सुधार की आवश्यकता स्वीकार करना, और सुधार का अर्थ है बदलाव, और बदलाव का अर्थ है वर्तमान व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न।
जो व्यवस्था स्वयं को 'सर्वश्रेष्ठ' घोषित कर चुकी है, वह कमी स्वीकार नहीं कर सकती — क्योंकि कमी स्वीकार करने का अर्थ है 'सर्वश्रेष्ठता' के दावे को छोड़ना।
कथनी और करनी का विभेद कब थमेगा? यह विभेद तब थमेगा जब:
- हम अपने विचारकों को पूजना बंद करेंगे और उन्हें समझना शुरू करेंगे।
- हम अपने दावों के अनुरूप आचरण करना शुरू करेंगे।
- हम सत्ता को 'सर्वश्रेष्ठ' बनाने की परंपरा को छोड़ेंगे।
- हम आलोचना को 'अपराध' नहीं, 'आईना' समझेंगे।
- हम जवाबदेही तय करेंगे — चाहे वह कोई हो।
कबीर का वह आँगन आज भी बसाना होगा
कबीरदास जी ने पाँच सौ वर्ष पूर्व जो आँगन बसाने की बात कही थी, वह आँगन आज भी बसाना होगा — आलोचकों के लिए, सवाल पूछने वालों के लिए, सत्ता को आईना दिखाने वालों के लिए। यह आँगन केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज का होना चाहिए — एक ऐसा समाज जो आलोचना को स्वीकार करता है, जो सवालों से नहीं डरता, जो अपनी कमियों को देखने का साहस रखता है।
भगत सिंह का वह विचार, सुकरात का वह साहस, मिल की वह तर्कशीलता, चोम्स्की का वह दायित्व, ऑर्वेल की वह चेतावनी, ठाकुर का वह निर्भीक मन, गेलेआनो की वह एकजुटता — सब कबीर के उसी दोहे के विभिन्न पहलू हैं। सब एक ही सत्य की ओर इशारा करते हैं:
निंदक अपराधी नहीं, आईना है। उनकी बातों को सुनना होगा और उन्हें सुनना — स्वस्थ लोकतंत्र, स्वस्थ समाज, और स्वस्थ मानवता की पहली शर्त है।
जब तक हम कबीर के उस आँगन को नहीं बसाते, तब तक हमारे ऋषि-महर्षियों के नाम जोड़ने का गर्व केवल एक खोखला दावा रहेगा — कथनी में जीवंत, करनी में शव।
"निंदक नियरे राखिए" — यह केवल एक दोहा नहीं, एक सभ्यता का सूत्र है। इसे भूलना — अपनी जड़ों को काटना है। इसे याद रखना — अपने भविष्य को सुरक्षित करना है।
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