लोकतंत्र और बहुमत / भीड़

ऊपर का चित्र पहली नजर में बहुत साधारण लगता है।
मुसलाधार बारिश हो रही है। एक बूढ़ा किसान छतरी लेकर अपने पसंदीदा फूल के पौधे को पानी दे रहा है। और उससे कुछ ही कदम दूर एक टूटा हुआ मचान है, जिसके नीचे दूसरे पौधे बारिश और उपेक्षा के बीच मुरझा रहे हैं।
ऊपर लिखा है—
“पता है दिक्कत क्या है?
आप अपने पसंदीदा पौधे को बारिश में पानी दे रहे हैं।”
हम इसे देखकर मुस्कुरा सकते हैं और आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन जरा रुककर सोचिए तो यह छोटा-सा चित्र हमारी पूरी सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था का एक बड़ा सच सामने रख देता है।
समस्या यह नहीं है कि पानी नहीं है।
समस्या यह है कि पानी कहाँ दिया जा रहा है।
बारिश तो सबके लिए हो रही है, लेकिन इंसान अपना घड़ा लेकर उसी पौधे की तरफ जा रहा है जो उसे सबसे ज्यादा पसंद है।
यही बात हमारे परिवार, समाज, अर्थव्यवस्था, राजनीति और यहां तक कि हमारे अपने विचारों पर भी लागू होती है।
हम अक्सर वहाँ संसाधन, पैसा, समय और प्यार लगाते हैं जहाँ हमारी नजर पहले से लगी होती है। जहाँ हमें अपनापन महसूस होता है। जबकि जिस जगह जरूरत सबसे ज्यादा होती है, वह अक्सर हमारी नजर से बाहर रह जाती है।
इसे चार-पाँच स्तरों पर समझिए।
समाजशास्त्र में इसे “visibility bias”, यानी दिखाई देने वाली चीजों के पक्ष में झुकाव, कहा जा सकता है।
सरल भाषा में कहें तो—
जिसे हम देख पाते हैं, उसके लिए हमारा दिल जल्दी पसीजता है। जिसे देख ही नहीं पाते, उसकी तकलीफ हमारे लिए लगभग अदृश्य हो जाती है।
इसे “अपनेपन का भूगोल” भी कह सकते हैं।
मनुष्य अक्सर उसी को सींचता है जो उसकी अपनी परिधि में है। परिवार में अपने बच्चे, समाज में अपना समूह, राजनीति में अपना समर्थक वर्ग और व्यवस्था में वह व्यक्ति जिसकी पहुँच हमारे पास है।
लेकिन हमारी परिधि के बाहर जो पौधा सूख रहा है, वह अक्सर हमारे विवेक में भी दिखाई नहीं देता।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भारतीय समाज की इसी समस्या को बहुत गहराई से देखा था। उनका तर्क था कि जाति-व्यवस्था में व्यक्ति अपने समूह के भीतर तो गहरी सामाजिक एकजुटता और करुणा दिखा सकता है, लेकिन जाति की सीमा के बाहर वही करुणा बहुत कमजोर पड़ जाती है। यानी समस्या केवल व्यक्तिगत दुर्भावना की नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना की भी है।
NFHS-5 के आँकड़े भी हमारे सामने असमानता की ऐसी ही तस्वीर रखते हैं। सबसे वंचित 20 प्रतिशत परिवारों के बच्चों में स्टंटिंग यानी उम्र के हिसाब से कम लंबाई या अवरुद्ध शारीरिक वृद्धि की दर सबसे संपन्न 20 प्रतिशत परिवारों की तुलना में लगभग दोगुनी रही है।
यह केवल प्रकृति की मार नहीं है।
इसके पीछे गरीबी, पोषण, स्वास्थ्य सुविधाओं और अवसरों की असमानता भी है।
यानी बारिश तो सब पर हो रही है, लेकिन हर पौधे तक पानी बराबर नहीं पहुँच रहा।
हमारी दिक्कत यह भी है कि हमने करुणा को सार्वभौमिक रखने के बजाय उसे अपना-पराया देखकर बाँट लिया है।
बड़े शहरों के कॉर्पोरेट अस्पतालों को देखिए।
विशेषज्ञ डॉक्टर, आधुनिक मशीनें, महंगी सुविधाएँ और चमचमाते भवन—वहाँ निवेश और संसाधनों की बारिश दिखाई देती है।
दूसरी तरफ ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं, जहाँ विशेषज्ञ डॉक्टरों के बहुत से पद लंबे समय तक खाली पड़े रहते हैं।
यानी एक तरफ पसंदीदा पौधा है, जिसे लगातार पानी मिल रहा है।
दूसरी तरफ टूटा मचान है, जिसके नीचे पौधे सूख रहे हैं।
और सबसे बड़ी बात—सूखते हुए पौधे कैमरे के सामने नहीं आते।
प्रकृति की बारिश किसी से नहीं पूछती कि तुम अमीर हो या गरीब, ऊँची जाति के हो या पिछड़ी जाति के, शहर में रहते हो या गाँव में।
बारिश का अपना कोई वोट बैंक नहीं होता।
लेकिन जब पानी का घड़ा इंसान के हाथ में आता है, तो कहानी बदल जाती है।
वह तय करता है कि पानी कहाँ जाएगा।
अमर्त्य सेन ने 1943 के बंगाल के अकाल का अध्ययन करते हुए इसी तरह की एक महत्वपूर्ण बात समझाई थी। अकाल को केवल इस आधार पर नहीं समझा जा सकता कि देश या क्षेत्र में कुल कितना अनाज मौजूद था। सवाल यह भी था कि किसके पास उस अनाज को खरीदने या पाने की क्षमता थी।
यानी गोदामों में अनाज हो सकता है, लेकिन गरीब के घर में रोटी न हो।
यह बात आज भी हमें बहुत कुछ समझाती है।
भारत में कॉर्पोरेट टैक्स प्रोत्साहनों और ऋण-माफियों की राशि अक्सर हजारों करोड़ रुपये में होती है। दूसरी तरफ कृषि क्षेत्र, जो देश की लगभग आधी आबादी को रोजगार देता है, GDP में हिस्सेदारी के मामले में लंबे समय से अपेक्षाकृत कम होता गया है।
सवाल यह नहीं कि किसी एक वर्ग को सहायता क्यों दी गई।
सवाल यह है कि जिसे पहले से ज्यादा ताकत मिल रही है, क्या उसे लगातार और ज्यादा पानी देना जरूरी है, जबकि कोई दूसरा पौधा बुनियादी जरूरत के लिए भी तरस रहा है?
यही सवाल असंगठित मजदूरों, भूमिहीन किसानों और आदिवासी बहुल जिलों के संदर्भ में भी पूछा जा सकता है।
देश के IIT, IIM और केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों पर प्रति छात्र सरकारी खर्च और किसी दूर-दराज के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे पर होने वाले खर्च में बड़ा अंतर हो सकता है।
दोनों बच्चे शिक्षा के हकदार हैं।
दोनों पौधों को बारिश मिलनी चाहिए।
लेकिन एक पौधे के लिए नई छतरी तैयार है और दूसरे के ऊपर टूटा हुआ मचान भी नहीं है।
यहाँ चित्र हमें एक और मजेदार, लेकिन गंभीर बात बताता है।
बारिश में किसी पौधे को पानी देने से वह मजबूत नहीं होता; कई बार ज्यादा पानी उसकी जड़ों को सड़ा भी सकता है।
यानी जिसे हम सबसे ज्यादा प्यार करते हैं, उसे जरूरत से ज्यादा बचाने की कोशिश कभी-कभी उसे कमजोर भी कर देती है।
राजनीति में लगातार सब्सिडी, संरक्षण और विशेष सुविधा का सवाल भी इसी तरह देखा जा सकता है।
सहायता की जरूरत जहाँ है, वहाँ सहायता जरूरी है। लेकिन यदि ताकतवर को लगातार अतिरिक्त संरक्षण मिलता रहे और कमजोर को अवसर ही न मिले, तो बराबरी की जमीन कभी तैयार नहीं होगी।
इसलिए हर मदद न्याय नहीं होती।
कभी-कभी प्यार के नाम पर किया गया अति-संरक्षण भी नुकसान कर सकता है।
राजनीति में पसंदीदा पौधे की पहचान थोड़ी आसान है।
वह वर्ग या समूह जो चुनावी गणित में महत्वपूर्ण है।
वोट बैंक।
दबाव समूह।
प्रभावशाली समुदाय।
मीडिया में दिखाई देने वाला वर्ग।
जिसकी आवाज ज्यादा सुनाई देती है, उसकी समस्या भी जल्दी सुनाई देती है।
राज्य का घड़ा अक्सर उसी तरफ झुकता है जहाँ पहले से हरियाली दिखाई दे रही होती है।
क्यों?
क्योंकि हरा पौधा तस्वीर में अच्छा लगता है।
मुरझाया हुआ पौधा फोटो-ऑप के लिए उतना आकर्षक नहीं होता।
मुरझाते पौधे को ठीक करने में समय लगता है। उसकी समस्या जटिल होती है। उसमें तुरंत राजनीतिक लाभ भी नहीं दिखाई देता।
इसलिए कई बार व्यवस्था उसी जगह पानी डालती रहती है जहाँ पहले से पौधा हरा है।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य के कर्तव्य और राजधर्म की जो कल्पना मिलती है, उसमें शासन का उद्देश्य केवल किसी खास व्यक्ति या समूह पर कृपा करना नहीं, बल्कि राज्य और समाज के व्यापक हित को देखना है।
सरल भाषा में—
राज्य को जरूरत और योग्यता देखकर निर्णय लेना चाहिए, केवल कृपा या सिफारिश देखकर नहीं।
जब राज्य “प्रसाद” बाँटने लगे, यानी सहायता या सुविधा को कृपा की तरह देने लगे, तब समस्या पैदा होती है।
क्योंकि फिर नागरिक अधिकार की जगह एहसान लेने लगता है।
और व्यवस्था निष्पक्ष होने के बजाय किसी के पक्ष में झुकने लगती है।
किसी बाढ़ या भूस्खलन को राष्ट्रीय मीडिया में खूब जगह मिल जाए तो अचानक पूरा देश उसकी तरफ देखने लगता है।
मुख्यमंत्री का हवाई दौरा होता है।
केंद्रीय राहत पैकेज की घोषणा होती है।
सोशल मीडिया पर संवेदनाएँ आती हैं।
लेकिन उससे कुछ दूर किसी दूसरे इलाके में उतनी ही बड़ी या उससे भी बड़ी तबाही हो जाए और कैमरा वहाँ न पहुँचे, तो संभव है कि उसकी आवाज बहुत कम सुनाई दे।
क्यों?
क्योंकि वहाँ न कैमरा है, न बड़ी खबर, न तत्काल राजनीतिक गणित।
यही समस्या सरकारी दफ्तरों की फाइलों में भी दिखाई दे सकती है।
जिस फाइल के पीछे कोई प्रभावशाली व्यक्ति खड़ा है, वह कई बार एक मेज से दूसरी मेज तक जल्दी पहुँच जाती है।
जिसके पीछे कोई नहीं है, वह वर्षों तक “विचाराधीन” रह सकती है।
इसलिए कई बार राज्य की प्राथमिकता जरूरत से नहीं, बल्कि दृश्यता, पहुँच और सिफारिश से तय होती दिखाई देती है।
अब बात थोड़ी गहरी हो जाती है।
अमेरिकी दार्शनिक जॉन रॉल्स ने न्याय को समझाने के लिए “veil of ignorance” यानी “अनभिज्ञता का आवरण” का विचार दिया।
कल्पना कीजिए कि आपको समाज के नियम बनाने हैं, लेकिन आपको यह नहीं पता कि इस समाज में आप अमीर पैदा होंगे या गरीब, शहर में पैदा होंगे या गाँव में, ताकतवर होंगे या कमजोर, सुविधासंपन्न परिवार में पैदा होंगे या ऐसे परिवार में जहाँ दो वक्त की रोटी भी मुश्किल है।
तब आप कैसी व्यवस्था बनाएँगे?
शायद ऐसी व्यवस्था जिसमें आपके अपने लिए ही नहीं, उस व्यक्ति के लिए भी सुरक्षा हो जिसे आप अभी नहीं जानते।
यही इस चित्र की सबसे बड़ी परीक्षा है।
हमें यह तय नहीं करना चाहिए कि “मेरा पौधा कौन है?”
हमें यह पूछना चाहिए—
“जिस पौधे को सबसे ज्यादा पानी की जरूरत है, वह कौन है?”
गांधी ने इसी सोच को “अंत्योदय” की भावना में रखा—समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति के बारे में सोचो।
निर्णय लेते समय यह देखो कि उसका लाभ उस व्यक्ति तक भी पहुँच रहा है या नहीं जो सबसे पीछे खड़ा है।
इस चित्र में टूटा मचान और उसके नीचे मुरझाता पौधा उसी “अंतिम व्यक्ति” का प्रतीक माना जा सकता है।
मार्क्सवादी दृष्टि से देखें तो तस्वीर का अर्थ और भी सीधा हो जाता है।
पूँजी अक्सर वहीं जमा होती जाती है जहाँ पहले से पूँजी होती है।
जिसके पास पैसा है, उसके पास बेहतर अवसर हैं। अवसर से और पैसा आता है। पैसा फिर और अवसर खरीदता है।
जिसके पास शुरुआत में कुछ नहीं है, उसके पास न छतरी होती है, न घड़ा।
उसके पास केवल बारिश का इंतजार होता है।
अब इस चित्र को केवल सरकार, राजनीति या समाज की आलोचना समझना सबसे आसान रास्ता होगा।
असल में चित्र हमसे ज्यादा कठिन सवाल पूछता है—
क्या हमारे भीतर भी वही किसान बैठा है?
क्या हम भी वही नहीं करते?
अपने बच्चे को जरूरत से ज्यादा बचाते हैं।
अपने पसंदीदा व्यक्ति की हर गलती को माफ कर देते हैं।
अपने विचार को सही साबित करने वाली बातें ही सुनते हैं।
अपने समूह के लोगों की गलती में भी मजबूरी खोज लेते हैं।
लेकिन दूसरे समूह के व्यक्ति की छोटी-सी गलती को चरित्र का प्रमाण बना देते हैं।
यानी हम अपने पसंदीदा पौधे को केवल पानी ही नहीं देते, बल्कि उसके लिए बारिश में छतरी भी तान देते हैं।
दूसरे पौधे के लिए कहते हैं—
“अरे, अगर मजबूत होगा तो खुद बच जाएगा।”
हम अपने विचारों के साथ भी यही करते हैं।
जो बात हमें पसंद है, उसके समर्थन में दस तर्क खोज लेते हैं।
जो बात हमें असहज करती है, उसे सुनना ही बंद कर देते हैं।
इस तरह हमारे भीतर भी एक छोटा-सा “पसंदीदा पौधा” बन जाता है।
हम उसे लगातार पानी देते रहते हैं।
और दूसरी तरफ कोई असुविधाजनक सत्य धीरे-धीरे सूखता रहता है।
निएत्शे की नैतिकता संबंधी आलोचनाओं को इस संदर्भ में देखें तो सवाल उठता है कि कहीं हम अपनी सुविधा और अपनी कमजोरी को ही नैतिकता का नाम तो नहीं दे रहे?
और ओशो की भाषा में कहें तो असली करुणा वही होगी जो सामने वाले की वास्तविक जरूरत को देख सके; केवल अपने पसंदीदा व्यक्ति को प्यार देना करुणा नहीं, कई बार आत्म-संतुष्टि भी हो सकती है।
यह चित्र बागवानी के बारे में नहीं है।
यह ध्यान, पैसा, अवसर, सत्ता और प्रेम के बँटवारे के बारे में है।
हमारी सबसे बड़ी समस्या हमेशा संसाधनों की कमी नहीं होती।
कई बार समस्या यह होती है कि संसाधन वहाँ पहुँच रहे हैं जहाँ पहले से हमारी पसंद मौजूद है।
हम पूछते हैं—
“मैं किसे पसंद करता हूँ?”
जबकि हमें पूछना चाहिए—
“किसे मेरी मदद की सबसे ज्यादा जरूरत है?”
हम पूछते हैं—
“मेरे अपने लोगों को क्या मिलेगा?”
जबकि व्यवस्था को पूछना चाहिए—
“जो सबसे पीछे है, वह कब आगे आएगा?”
हम पूछते हैं—
“मैंने कितना पानी दिया?”
जबकि असली सवाल होना चाहिए—
“पानी सही जड़ तक पहुँचा या नहीं?”
बारिश तो प्रकृति पहले से कर रही है।
वह किसी से भेदभाव नहीं करती।
वह अमीर और गरीब, अपने और पराए, ताकतवर और कमजोर—सबके ऊपर गिरती है।
लेकिन सभ्यता की असली परीक्षा बारिश में नहीं है।
असली परीक्षा हमारे हाथ में पकड़े घड़े की है।
घड़ा किस तरफ झुकता है?
छतरी किसे ढकती है?
संसाधन किस तक पहुँचते हैं?
और सबसे जरूरी—
जिस पौधे को हम पसंद नहीं करते, लेकिन जिसे सबसे ज्यादा पानी की जरूरत है, क्या हम उसके पास भी कभी अपना घड़ा लेकर जाएँगे?
शायद जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि हम बारिश को दोष देते रहते हैं, जबकि असली समस्या हमारे हाथ का घड़ा है।
हम कहते हैं—संसाधन कम हैं, अवसर कम हैं, व्यवस्था कमजोर है, समय नहीं है।
लेकिन कई बार कमी संसाधनों की नहीं, न्यायपूर्ण दृष्टि की होती है।
हम अपने हिस्से की छतरी अपने लोगों के लिए तान देते हैं, अपने पौधों की जड़ों तक पानी पहुँचा देते हैं और फिर सूखते हुए पौधों को देखकर कह देते हैं—
“शायद इसकी किस्मत ही खराब थी।”
लेकिन हर सूखा पौधा बदकिस्मत नहीं होता।
कई पौधे इसलिए सूखते हैं क्योंकि किसी ने पानी होते हुए भी उनका रास्ता नहीं देखा।
इसलिए अगली बार जब हम किसी की मदद करें, किसी नीति का समर्थन करें, किसी के लिए आवाज उठाएँ या किसी को अपना समझकर उसके पक्ष में खड़े हों, तो एक पल के लिए यह जरूर पूछें—
“मैं इसे इसलिए तो नहीं सींच रहा क्योंकि यह मेरा पसंदीदा पौधा है?”
और फिर उससे भी कठिन सवाल—
“जिस पौधे को मैं पसंद नहीं करता, लेकिन जिसे पानी की सबसे ज्यादा जरूरत है… क्या मैं उसके लिए भी अपना घड़ा उठा सकता हूँ?”
शायद न्याय वहीं से शुरू होता है।
क्योंकि सभ्यता की पहचान यह नहीं कि उसने अपने पसंदीदा पौधों को कितना हरा रखा।
सभ्यता की पहचान यह है कि उसने उन पौधों को सूखने से कितना बचाया, जिनसे उसे कोई निजी प्रेम नहीं था।
बारिश ईश्वर की देन है,
लेकिन घड़ा मनुष्य के हाथ में है।
और इतिहास हमेशा यह नहीं पूछेगा कि तुम्हारे पास कितना पानी था।
वह यह पूछेगा—
“जब पानी तुम्हारे हाथ में था,
तब तुमने किसे सींचा था?”
और शायद उससे भी बड़ा सवाल यह होगा—
“जिसे तुम अपना नहीं मानते थे,
क्या उसके सूखने से तुम्हें कभी फर्क पड़ा था?”
क्योंकि आखिरकार,
बारिश सबके लिए है।
पानी सबके लिए होना चाहिए।
और न्याय की शुरुआत वहीं से होती है,
जहाँ हमारा घड़ा अपनी पसंद की दिशा छोड़कर
जरूरत की दिशा में झुकता है।
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