सड़क पर आए नारे: सिर्फ गुस्सा नहीं, टूटते भरोसे की चेतावनी।

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सड़क पर आए नारे: सिर्फ गुस्सा नहीं, एक चेतावनी है। दिल्ली में हाल ही में नारे लगे: "एक कचौड़ी दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा", "मेरे सिर में दर्द है, उसका कारण मर्द है।" कुछ लोग कहेंगे कि यह गुस्से में निकले शब्द हैं, इन पर इतना क्यों सोचना? पर यह समझना अब नादानी होगी। जो बात कल तक मज़ाक, ताने और रील में थी, वह आज सड़क पर नारा बन गई है। जब कोई बात हँसी-मज़ाक से निकलकर सड़क पर आ जाए, तो समझिए वह लोगों के मन में बैठ चुकी है। यह चिंता सिर्फ मेरी नहीं है। समाजशास्त्री, कानूनविद् और मनोवैज्ञानिक, तीनों अपने-अपने तरीके से इस बदलाव को समझाते हैं। आइये सबसे पहले देखते है कि सामाजिक विचारक इस पर क्या कहते हैं। फ्रांस के समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम ने डेढ़ सौ साल पहले चेताया था कि जब समाज में साझा नियम और आपसी बंधन कमज़ोर पड़ते हैं, तो लोग दिशाहीन और अकेले हो जाते हैं।   उन्होंने इस हालत को "एनोमी" यानी मूल्यहीनता की स्थिति कहा। अमेरिकी विद्वान रॉबर्ट पुटनम ने अपनी किताब Bowling Alone में दिखाया कि जहाँ आपसी मेल-जोल और भरोसा घटता है, वहाँ समाज की ताकत घट...

बलिया बलिदान दिवस



 बलिया बलिदान दिवस: जब 'बागी बलिया' ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी
19 अगस्त 1942।


पूर्वी उत्तर प्रदेश की धरती पर उस दिन केवल एक आंदोलन नहीं हुआ था। एक जिले ने अंग्रेजी साम्राज्य को चुनौती देकर यह दिखा दिया था कि गुलाम भारत की जनता अब केवल आदेश मानने वाली प्रजा नहीं रही।


बलिया ने कुछ समय के लिए अंग्रेजी प्रशासन को पीछे धकेलकर अपना स्थानीय स्वराज स्थापित किया। चित्तू पांडेय के नेतृत्व में बनी इस लोकप्रिय व्यवस्था ने अंग्रेजी सत्ता के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया था कि जिस देश के लोग स्वयं शासन चलाने को तैयार हैं, उस पर विदेशी शासन आखिर कब तक टिकेगा?


इसी ऐतिहासिक स्मृति में प्रत्येक वर्ष 19 अगस्त को बलिया बलिदान दिवस मनाया जाता है।


लेकिन बलिया की कहानी केवल चित्तू पांडेय की कहानी नहीं है।


यह उन किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों, युवाओं, महिलाओं और सामान्य नागरिकों की कहानी है जिन्होंने अंग्रेजी शासन को चुनौती दी। इनमें दलित, पिछड़े और मेहनतकश समाज के अनेक ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने पुलिस की गोलियां खाईं और अपने प्राण न्योछावर किए।


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लेकिन 1942 में देश की हालत क्या थी?


बलिया की क्रांति अचानक पैदा नहीं हुई थी।


उसके पीछे वर्षों से जमा हो रहा राजनीतिक असंतोष था। 1942 आते-आते परिस्थितियां विस्फोटक हो चुकी थीं।


दुनिया उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध की आग में जल रही थी। ब्रिटेन युद्ध में फंसा हुआ था और भारत को भी भारतीय जनता की स्वतंत्र सहमति के बिना ब्रिटिश युद्ध-प्रयास में झोंक दिया गया था।


दक्षिण-पूर्व एशिया में जापान तेजी से आगे बढ़ रहा था। बर्मा तक युद्ध पहुंच चुका था और भारत पर भी खतरे की आशंका पैदा हो गई थी।


ब्रिटिश सरकार भारत से सैनिक, संसाधन और राजनीतिक सहयोग चाहती थी, लेकिन सत्ता भारतीयों को सौंपने के लिए तैयार नहीं थी।


भारतीयों का सवाल था—


जिस देश को अपनी रक्षा और शासन का अधिकार ही नहीं है, वह ब्रिटेन के युद्ध में अपना सब कुछ क्यों झोंके?


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क्रिप्स मिशन: आजादी अभी नहीं, भविष्य का वादा


मार्च 1942 में ब्रिटिश सरकार ने सर स्टैफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा।


उद्देश्य था भारतीय राजनीतिक नेतृत्व का सहयोग प्राप्त करना और ब्रिटिश युद्ध-प्रयास को मजबूत करना।


क्रिप्स प्रस्तावों में युद्ध के बाद भारत के संवैधानिक भविष्य की बात थी, लेकिन तत्काल सत्ता भारतीयों को सौंपने का प्रश्न अनसुलझा रहा।


वार्ता विफल हुई।


भारतीय जनता में यह भावना और गहरी हुई कि ब्रिटिश सरकार भारत से सहयोग तो चाहती है, लेकिन स्वतंत्रता देने को तैयार नहीं है।


कुछ ही महीनों बाद यही असंतोष भारत छोड़ो आंदोलन के रूप में विस्फोटित हुआ।


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युद्धकालीन महंगाई और आम आदमी


राजनीतिक असंतोष के साथ आर्थिक कठिनाइयां भी बढ़ रही थीं।


युद्धकाल में वस्तुओं की उपलब्धता, कीमतों और आपूर्ति को लेकर समस्याएं थीं। आम आदमी के लिए अंग्रेजी शासन अब केवल राजनीतिक गुलामी का प्रश्न नहीं था; उसकी रोजमर्रा की जिंदगी भी युद्ध और औपनिवेशिक नीतियों से प्रभावित हो रही थी।


इसलिए 1942 में आजादी की मांग के पीछे राजनीतिक स्वाभिमान के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक असंतोष भी जुड़ गया था।


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8 अगस्त 1942: 'करो या मरो'


8 अगस्त 1942 को बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया।


महात्मा गांधी ने देश को 'करो या मरो' का संदेश दिया।


ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को फैलने का अवसर नहीं दिया।


9 अगस्त की सुबह गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद और कांग्रेस के अनेक प्रमुख नेता गिरफ्तार कर लिए गए।


लेकिन अंग्रेजों की रणनीति का उलटा असर हुआ।


नेता जेल में चले गए और जनता आंदोलन की पहली पंक्ति में आ गई।


बलिया इस जन-नेतृत्व का सबसे प्रभावशाली उदाहरण बना।


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9 अगस्त: खबर बलिया पहुंची


9 अगस्त को नेताओं की गिरफ्तारी की खबर बलिया पहुंची।


बलिया के लोगों ने इसे सामान्य राजनीतिक समाचार की तरह नहीं लिया।


स्कूल बंद हुए। विद्यार्थी सड़कों पर आए। सभाएं और जुलूस शुरू हुए।


बलिया जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास के अनुसार 9 अगस्त के बाद आंदोलन तेजी से आगे बढ़ा। 11 अगस्त को प्रदर्शन हुए, 12 अगस्त को विद्यार्थियों ने अदालतें बंद कराने की मांग की और पुलिस ने लाठीचार्ज किया। 13 अगस्त को बिल्थरा रोड रेलवे स्टेशन पर हमला हुआ और आंदोलन और अधिक उग्र हो गया।


अब यह केवल विरोध नहीं था।


जनता और औपनिवेशिक प्रशासन आमने-सामने थे।


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बलिया में अंग्रेजी प्रशासन की पकड़ ढीली पड़ने लगी


अगस्त के मध्य तक आंदोलन गांवों और कस्बों में फैल चुका था।


थानों, तहसीलों, रेलवे स्टेशनों और सरकारी संस्थानों पर जनता का दबाव बढ़ता गया।


अंग्रेजी शासन के प्रतीक संस्थान जनता के निशाने पर आने लगे।


बलिया जिला प्रशासन के इतिहास के अनुसार बैरिया थाने और अन्य स्थानों पर पुलिस की गोलीबारी ने जनता को और उग्र कर दिया। प्रशासन की पकड़ तेजी से कमजोर होती जा रही थी।


यहीं से बलिया की कहानी भारत छोड़ो आंदोलन के सबसे असाधारण अध्यायों में बदलने लगी।


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16 अगस्त: बलिया शहर में भी बहा खून


16 अगस्त 1942 को बलिया नगर में जुलूस पर पुलिस गोलीबारी का उल्लेख स्थानीय ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है।


इस गोलीकांड में दुःखी कोइरी, ढेला दुसाध, रामसुभग राम, गनपति पांडेय, शिवमंगल राम, रघुनाथ अहीर और मोहित लाल आदि के शहीद होने का स्थानीय विवरण मिलता है।


इन नामों को याद करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ये बताते हैं कि बलिया की क्रांति केवल बड़े राजनीतिक परिवारों या प्रभावशाली लोगों की क्रांति नहीं थी।


साधारण किसान, मजदूर और पिछड़े-वंचित समुदाय के लोग भी अंग्रेजी सत्ता के सामने खड़े थे।


भारत सरकार के Dictionary of Martyrs of India's Freedom Struggle में महाबीर कोइरी, निवासी छाता, जिला बलिया, को भी अगस्त 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पुलिस गोलीबारी में शहीद बताया गया है।


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18 अगस्त: बैरिया में तिरंगे के लिए गोलियां


बलिया के द्वाबा क्षेत्र में 18 अगस्त 1942 को संघर्ष निर्णायक रूप ले चुका था।


बैरिया थाने पर बड़ी संख्या में लोग जमा हुए। उद्देश्य था अंग्रेजी सत्ता के प्रतीक को हटाकर तिरंगा फहराना।


पुलिस ने गोली चला दी।


स्थानीय स्रोतों में इस गोलीकांड में 19 क्रांतिकारियों के शहीद होने का उल्लेख मिलता है। अलग-अलग स्रोतों में संख्या और सूची में मामूली अंतर दिखाई देता है, इसलिए यहां सबसे सुरक्षित तरीका उपलब्ध स्थानीय शहीद-सूची को नाम सहित प्रस्तुत करना है।


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बैरिया के शहीद: आजादी किसी एक जाति की नहीं थी


बैरिया की शहीद-सूची पढ़ना अपने आप में उस समय के सामाजिक इतिहास को पढ़ना है।


शहीदों में—


निर्भय कुमार सिंह, देवबसन कोइरी, नरसिंह राय, रामजनम गोंड, विद्यापति गोंड, रामप्रसाद उपाध्याय, मैनेजर सिंह, रामदेव कुम्हार, रामबृक्ष राय, रामनगीना सोनार, छठू कमकर, देवकी सोनार, धर्मदेव मिश्र, श्रीराम तिवारी, मुक्तिनाथ तिवारी, विक्रम सोनार, विक्की राम और भीम अहीर जैसे नाम मिलते हैं।


इनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं—


देवबसन कोइरी


अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध खड़े होने वाले उन किसानों और मेहनतकश लोगों में से एक, जिन्होंने तिरंगे के लिए अपने प्राण दिए।


रामजनम गोंड और विद्यापति गोंड


बैरिया की शहादत में गोंड समाज की भागीदारी के प्रमाण।


रामदेव कुम्हार


एक मेहनतकश कारीगर समुदाय से आने वाला वह व्यक्ति जिसने अंग्रेजी शासन के सामने झुकने के बजाय बलिदान चुना।


छठू कमकर


श्रमजीवी समाज की उस भागीदारी का प्रतीक, जिसे स्वतंत्रता के लोकप्रिय इतिहास में अक्सर पर्याप्त जगह नहीं मिलती।


रामनगीना सोनार, देवकी सोनार और विक्रम सोनार


सोनार समाज के वे लोग जिन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई में अपने प्राण दिए।


भीम अहीर


बैरिया की शहादत में अहीर समाज की उपस्थिति का महत्वपूर्ण नाम।


यह सूची बताती है कि—


आजादी की लड़ाई में केवल बड़े नेता नहीं लड़ रहे थे; समाज के निचले और मेहनतकश तबकों के लोग भी गोली के सामने खड़े थे।


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बैरिया की शहादत के बाद बलिया में ज्वाला और भड़की


बैरिया में हुई गोलीबारी ने जनता के भीतर अंग्रेजी शासन के प्रति आक्रोश को और तीखा कर दिया।


अब बलिया में प्रशासनिक संस्थाओं पर जनता का कब्जा बढ़ने लगा।


तहसीलों और थानों पर आंदोलनकारियों का प्रभाव बढ़ा।


अंग्रेजी प्रशासन के लिए स्थिति लगातार बिगड़ती गई।


और फिर आया—


19 अगस्त 1942


उस दिन लगभग 50,000 लोग जेल की ओर बढ़े।


बलिया जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास के अनुसार इतनी बड़ी भीड़ अपने नेताओं और आंदोलनकारियों को मुक्त कराने के लिए जेल की ओर गई। प्रशासनिक अधिकारियों को स्थिति संभालना कठिन हो गया। अंततः जेल में बंद नेताओं को रिहा किया गया।


यह घटना बलिया की अगस्त क्रांति की सबसे बड़ी जनशक्ति का प्रतीक बन गई।


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20 अगस्त: बलिया ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित किया


19 अगस्त की घटनाओं के बाद बलिया में अंग्रेजी प्रशासन लगभग निष्प्रभावी हो गया।


20 अगस्त 1942 को बलिया में स्वतंत्रता की घोषणा की गई और चित्तू पांडेय के नेतृत्व में लोकप्रिय सरकार बनी।


जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास के अनुसार जिले के दस में से सात थाने स्वतंत्रता सेनानियों के हाथ में थे। अलग-अलग क्षेत्रों के लिए पंचायतें बनाई गईं और कांग्रेस स्वयंसेवकों को शहर की रक्षा की जिम्मेदारी दी गई।


यह केवल प्रतीकात्मक घोषणा नहीं थी।


बलिया के लोगों ने वास्तव में स्थानीय प्रशासन चलाने की कोशिश की।


यही वह बात है जो बलिया की अगस्त क्रांति को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में विशिष्ट बनाती है।


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चित्तू पांडेय: 'शेर-ए-बलिया'


इस जनविद्रोह का सबसे प्रसिद्ध चेहरा थे चित्तू पांडेय।


लेकिन चित्तू पांडेय की कहानी अकेली नहीं थी।


उनके साथ अनेक स्थानीय नेता, स्वयंसेवक और ग्रामीण कार्यकर्ता थे।


और सबसे बड़ी शक्ति थी—


जनता।


चित्तू पांडेय ने स्वयं भीड़ को शांति बनाए रखने की अपील की, लेकिन पुलिस दमन से आक्रोशित जनता के एक हिस्से ने सरकारी प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई जारी रखी। जिला प्रशासन का आधिकारिक विवरण भी इस तनाव को दर्ज करता है।


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22–23 अगस्त: अंग्रेजी सेना की वापसी


बलिया का यह स्वराज लंबे समय तक नहीं चल सका।


22 अगस्त को चित्तू पांडेय ने जिलाधिकारी को बैठक में बुलाया, लेकिन वह नहीं आए।


22–23 अगस्त की रात सैन्य बल बलिया में प्रवेश कर गए।


लोकप्रिय सरकार को समाप्त कर दिया गया और इसके बाद दमन का दौर शुरू हुआ।


जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास में इस दमन के दौरान लूट, मारपीट, गोलीबारी, आगजनी और अन्य अत्याचारों का उल्लेख मिलता है।


अंग्रेजों ने बलिया पर दोबारा नियंत्रण तो स्थापित कर लिया।


लेकिन जनता के मन से आजादी की भावना को वापस नहीं ले सके।


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हाँ, यह निर्विवाद है कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पूरे देश में व्यापक पुलिस और सैन्य दमन हुआ और बलिया स्वयं इस दमन का एक प्रमुख केंद्र था।


बलिया में कई स्थानों पर गोलीबारी हुई, अनेक लोग मारे गए, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां हुईं और बाद में अंग्रेजी पुलिस तथा सेना ने कठोर दमन किया।


इतिहास में संख्या से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि जिन लोगों ने बलिदान दिया, उनके नाम और उनकी कहानी सुरक्षित रहे।


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दलित-पिछड़े और मेहनतकश शहीदों को याद करना क्यों जरूरी है?


स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अक्सर बड़े नेताओं के नामों के आसपास लिखा गया।


लेकिन बलिया की कहानी हमें इतिहास का दूसरा चेहरा दिखाती है।


यहां—


कोइरी थे।

गोंड थे।

कुम्हार थे।

कमकर थे।

सोनार थे।

अहीर थे।

दुसाध थे।

किसान थे।

मजदूर थे।


और वे सब एक ही तिरंगे के नीचे खड़े थे।


इसलिए बलिया की क्रांति केवल राजनीतिक आंदोलन नहीं थी।


यह एक जन-आंदोलन था।


और इसके सामाजिक चरित्र को समझे बिना 1942 के बलिया को पूरी तरह समझना संभव नहीं है।


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अनाम शहीद: जिनका नाम इतिहास नहीं जानता


जिनका बड़े मंचों पर जिक्र नही होता है, जितने नाम हमारे पास हैं, उनसे कहीं अधिक वे लोग होंगे जिनका नाम किसी सूची में दर्ज नहीं हुआ।


किसी किसान ने आंदोलनकारियों को भोजन दिया होगा।


किसी महिला ने अपने घर में किसी क्रांतिकारी को छिपाया होगा।


किसी युवक ने अंग्रेजी पुलिस की गतिविधियों की सूचना आंदोलनकारियों को दी होगी।


किसी ने सरकारी कागज जलाए होंगे।


किसी ने तिरंगा लेकर जुलूस में कदम बढ़ाया होगा।


और किसी ने गोली खाकर वहीं दम तोड़ दिया होगा।


उनका नाम शायद किसी स्मारक पर नहीं है।


लेकिन आजादी के इतिहास में उनका हिस्सा किसी बड़े नेता से कम नहीं है।


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बलिया क्यों बना 'बागी बलिया'?


किसी जिले को 'बागी' कहे जाने के लिए केवल विरोध पर्याप्त नहीं होता।


उसमें यह विश्वास भी होना चाहिए कि—


अन्यायपूर्ण सत्ता को चुनौती दी जा सकती है।


बलिया के लोगों में यह विश्वास था।


उन्होंने अंग्रेजी सत्ता के प्रतीकों को चुनौती दी।


थानों और तहसीलों पर कब्जा किया।


जेल से आंदोलनकारियों को मुक्त कराया।


अपनी पंचायतें बनाईं।


और अंततः 20 अगस्त को अपने जिले को स्वतंत्र घोषित कर दिया।


इसीलिए 'बागी बलिया' केवल एक उपनाम नहीं है।


यह 1942 की उस सामूहिक चेतना की पहचान है जिसने अंग्रेजी शासन को उसके ही शासन-क्षेत्र में चुनौती दी थी।


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19 अगस्त हमें क्या याद दिलाता है?


आज जब हम बलिया बलिदान दिवस मनाते हैं तो केवल माल्यार्पण करना पर्याप्त नहीं है।


हमें शहीदों के नाम पढ़ने चाहिए।


उनके गांवों को याद करना चाहिए।


उनके परिवारों की कल्पना करनी चाहिए।


और यह स्वीकार करना चाहिए कि स्वतंत्रता का इतिहास केवल कुछ प्रसिद्ध नेताओं की कहानी नहीं है।


दुःखी कोइरी से महाबीर कोइरी तक, देवबसन कोइरी से रामजनम गोंड तक, विद्यापति गोंड से रामदेव कुम्हार तक, छठू कमकर से रामनगीना सोनार तक और भीम अहीर तक—इन नामों में उस भारत की आवाज है जो इतिहास की मुख्यधारा में अक्सर दब जाती है।


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इतिहास केवल चित्तू पांडेय का नहीं, जनता का है


चित्तू पांडेय इतिहास के नायक हैं।


लेकिन उनके पीछे खड़े हजारों सामान्य लोग भी इतिहास के नायक हैं।


बैरिया में गोली खाने वाला किसान नायक है।


तिरंगा लेकर चलने वाला मजदूर नायक है।


आंदोलन में उतरने वाला विद्यार्थी नायक है।


क्रांतिकारी को भोजन देने वाली महिला नायिका है।


अंग्रेजी पुलिस के सामने सूचना देने से इनकार करने वाला ग्रामीण नायक है।


और वह अनाम व्यक्ति भी नायक है जिसका नाम आज हमें पता नहीं।


आजादी किसी एक व्यक्ति की देन नहीं थी।


वह करोड़ों भारतीयों के संघर्ष, त्याग और बलिदान का परिणाम थी।


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बलिया की मिट्टी से आज भी एक सवाल


19 अगस्त 1942 को बलिया ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी थी।


आज वह हमसे एक दूसरा सवाल पूछता है—


क्या हम उन लोगों को याद रखते हैं जिन्होंने हमारे लिए आजादी की कीमत चुकाई थी?


क्या हमें चित्तू पांडेय याद हैं?


क्या हमें बैरिया के शहीद याद हैं?


क्या हमें देवबसन कोइरी याद हैं?


क्या हमें रामजनम गोंड और विद्यापति गोंड याद हैं?


क्या हमें रामदेव कुम्हार, छठू कमकर, रामनगीना सोनार और भीम अहीर याद हैं?


क्या हमें दुःखी कोइरी, ढेला दुसाध और रघुनाथ अहीर याद हैं?


और क्या हमें उन अनाम लोगों की याद है जिनके नाम इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं हो सके?


यदि नहीं, तो बलिया बलिदान दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन बनकर रह जाएगा।


लेकिन यदि हम इन नामों और उनकी कहानियों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाते हैं, तभी यह दिवस वास्तव में शहीदों की स्मृति का दिवस बनेगा।


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अमर रहे बागी बलिया


आज हम उस बलिया को नमन करते हैं—


जिसने अंग्रेजी शासन को चुनौती दी।


जिसने कुछ समय के लिए अपना स्थानीय शासन खड़ा किया।


जिसने तिरंगे के लिए गोलियां खाईं।


जिसने किसानों, मजदूरों, विद्यार्थियों और समाज के वंचित एवं पिछड़े वर्गों को एक संघर्ष में खड़ा किया।


जिसकी धरती ने अनेक बलिदानों की कीमत चुकाई।


और जिसने 1942 में ही अंग्रेजी शासन को यह संदेश दे दिया था कि—


भारत अब गुलाम रहना नहीं चाहता।


देवबसन कोइरी, रामजनम गोंड, विद्यापति गोंड, रामदेव कुम्हार, छठू कमकर, रामनगीना सोनार, देवकी सोनार, विक्रम सोनार, भीम अहीर, दुःखी कोइरी, ढेला दुसाध, रघुनाथ अहीर, महाबीर कोइरी और उन सभी ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों को कोटि-कोटि नमन।


चित्तू पांडेय और उनके सभी साथियों को नमन।


बैरिया की शहादत को नमन।


बागी बलिया की मिट्टी को नमन।


बलिया बलिदान दिवस अमर रहे।


अमर शहीद अमर रहें।


बागी बलिया अमर रहे।


जय हिंद!

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