सड़क पर आए नारे: सिर्फ गुस्सा नहीं, टूटते भरोसे की चेतावनी।

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सड़क पर आए नारे: सिर्फ गुस्सा नहीं, एक चेतावनी है। दिल्ली में हाल ही में नारे लगे: "एक कचौड़ी दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा", "मेरे सिर में दर्द है, उसका कारण मर्द है।" कुछ लोग कहेंगे कि यह गुस्से में निकले शब्द हैं, इन पर इतना क्यों सोचना? पर यह समझना अब नादानी होगी। जो बात कल तक मज़ाक, ताने और रील में थी, वह आज सड़क पर नारा बन गई है। जब कोई बात हँसी-मज़ाक से निकलकर सड़क पर आ जाए, तो समझिए वह लोगों के मन में बैठ चुकी है। यह चिंता सिर्फ मेरी नहीं है। समाजशास्त्री, कानूनविद् और मनोवैज्ञानिक, तीनों अपने-अपने तरीके से इस बदलाव को समझाते हैं। आइये सबसे पहले देखते है कि सामाजिक विचारक इस पर क्या कहते हैं। फ्रांस के समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम ने डेढ़ सौ साल पहले चेताया था कि जब समाज में साझा नियम और आपसी बंधन कमज़ोर पड़ते हैं, तो लोग दिशाहीन और अकेले हो जाते हैं।   उन्होंने इस हालत को "एनोमी" यानी मूल्यहीनता की स्थिति कहा। अमेरिकी विद्वान रॉबर्ट पुटनम ने अपनी किताब Bowling Alone में दिखाया कि जहाँ आपसी मेल-जोल और भरोसा घटता है, वहाँ समाज की ताकत घट...

समाजवाद शब्द का सफर

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'समाजवाद’ शब्द का सफर: गाली से विचार,

 विचार से क्रांति और क्रांति से संविधान तक


क्या किसी शब्द की भी एक जिंदगी होती है?

आमतौर पर हम शब्दों को निर्जीव समझते हैं। वे शब्दकोश में प

ड़े रहते हैं और हम उनका अर्थ पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं।

लेकिन कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनका अर्थ शब्दकोश नहीं, इतिहास तय करता है।

‘समाजवाद’ ऐसा ही एक शब्द है।

कभी यह किसी को चिढ़ाने या बदनाम करने के लिए इस्तेमाल हुआ।

फिर यह सामाजिक सुधार का नाम बना।

फिर मजदूरों के अधिकारों की आवाज बना।

फिर पूँजीवाद के खिलाफ क्रांति का नारा बना।

फिर कुछ देशों में पूरी राज्य-व्यवस्था का नाम बन गया।

और अंत में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के संविधान की प्रस्तावना में पहुँच गया।

लेकिन कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा शायद यह है कि ‘समाजवाद’ का कोई एक अर्थ कभी रहा ही नहीं।

रॉबर्ट ओवेन का समाजवाद मार्क्स के समाजवाद जैसा नहीं था।

मार्क्स का समाजवाद गांधी के आर्थिक चिंतन जैसा नहीं था।

गांधी का आर्थिक चिंतन नेहरू से अलग था।

और नेहरू का समाजवाद लोहिया से अलग था।


यानी एक ही शब्द, लेकिन उसके भीतर कई अलग-अलग विचार, कई रास्ते और कई मंजिलें।

किसी के लिए समाजवाद आर्थिक बराबरी था, किसी के लिए मजदूरों के अधिकार, किसी के लिए निजी संपत्ति की आलोचना, किसी के लिए कल्याणकारी राज्य और किसी के लिए सामाजिक न्याय।

इसलिए समाजवाद को केवल एक विचारधारा मानकर समझना पर्याप्त नहीं है।

यह एक ऐसा शब्द है जिसने लगभग दो सौ वर्षों की राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक उथल-पुथल के दौरान अपना अर्थ कई बार बदला।

तो आखिर यह शब्द पैदा कहाँ हुआ?

क्या सचमुच इसकी शुरुआत एक गाली के रूप में हुई थी?

कब यह सामाजिक सुधार का विचार बना, कब मजदूर आंदोलन से जुड़ा,

 कब क्रांति का नारा बना और कब संविधान की भाषा में पहुँचा?

और सबसे बड़ा सवाल—

भारत के संविधान में ‘समाजवादी’ शब्द आखिर 1976 में ही क्यों आया, जबकि संविधान 1950 में बन चुका था?

इन सवालों के जवाब के लिए हमें लगभग ढाई सौ साल पीछे जाना होगा।

आइए, ‘समाजवाद’ शब्द की पूरी जिंदगी को क्रम से देखते हैं।

1753 — शब्द की सबसे पुरानी ज्ञात कड़ी

एक जरूरी बात शुरुआत में ही साफ कर लेना चाहिए।

अक्सर कहा जाता है कि ‘Socialism’ शब्द उन्नीसवीं शताब्दी में रॉबर्ट ओवेन या बाद में मार्क्स के साथ पैदा हुआ। लेकिन शब्द का इतिहास इससे पुराना है।

1753 में जर्मन बेनेडिक्टाइन विद्वान Anselm Desing की रचना में लैटिन शब्द socialistae का प्रयोग मिलने का उल्लेख है।

लेकिन यह आधुनिक आर्थिक अर्थ वाला समाजवाद नहीं था।

उस समय बहस इस बात पर थी कि मनुष्य की सामाजिकता, प्राकृतिक कानून और समाज की व्यवस्था को किस तरह समझा जाए। ‘Socialistae’ का प्रयोग भी इसी दार्शनिक बहस के संदर्भ में हुआ था।

यानी पहली महत्वपूर्ण बात—

शब्द पहले आया, उसकी आधुनिक विचारधारा बाद में बनी।

और यही ‘समाजवाद’ की पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है।

1764 — बेक्कारिया और बदलती दुनिया की चिंगारी

अब कहानी को समझने के लिए हमें अठारहवीं शताब्दी

 के यूरोप में जाना होगा।


1764 में मिलान के युवा विचारक चेज़ारे बेक्कारिया ने


 अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Dei delitti e delle pene —


 On Crimes and Punishments — प्रकाशित की।

उस समय यूरोप की न्याय-व्यवस्था आज जैसी नहीं थी। कई जगह अपराध स्वीकार करवाने के लिए यातना दी जाती थी। अपराध और सजा के बीच अनुपात का विचार कमजोर था और मृत्युदंड का इस्तेमाल भी काफी व्यापक था।

बेक्कारिया ने इस व्यवस्था को चुनौती दी।

उनका कहना था कि सजा का उद्देश्य बदला लेना नहीं, बल्कि अपराध को रोकना होना चाहिए। सजा अपराध के अनुपात में होनी चाहिए, यातना नहीं दी जानी चाहिए और कानून स्पष्ट तथा सबके लिए समान होना चाहिए।

उनकी सोच प्रबोधन युग की उस व्यापक बहस से जुड़ी थी जिसमें राजा और चर्च की निरंकुश सत्ता के बजाय तर्क, नागरिक अधिकार, कानून और सामाजिक अनुबंध पर जोर बढ़ रहा था।

यानी सवाल बदल रहा था—

क्या राज्य और कानून केवल राजा और चर्च की इच्छा से चलते हैं, या उनका उद्देश्य मनुष्य और समाज के हित की रक्षा करना भी है?

और इसी वैचारिक वातावरण में ‘socialista’ जैसे शब्द अलग-अलग अर्थों में दिखाई देने लगे।

1765 — ‘Socialisti’: जब शब्द आधुनिक समाजवाद नहीं, विरोध का हथियार था।


बेक्कारिया की पुस्तक के अगले ही वर्ष, 1765 में बेनेडिक्टाइन पादरी

 फर्डिनांडो फाकिनेई ने उनकी पुस्तक की आलोचना में Note ed 

 osservazioni sul libro intitolato Dei delitti e delle pene 

 नामक रचना प्रकाशित की।

फाकिनेई बेक्कारिया के विचारों से असहमत थे।

उन्होंने बेक्कारिया और रूसो से प्रभावित प्राकृतिक-कानून की सोच रखने वालों के लिए ‘socialisti’ शब्द का इस्तेमाल किया।

लेकिन ध्यान रहे—

यह आज वाला ‘समाजवाद’ नहीं था।

न यह मार्क्सवाद था, न मजदूर क्रांति, न सामूहिक उत्पादन की आधुनिक अवधारणा और न पूँजीवाद-विरोधी कोई व्यवस्थित आर्थिक कार्यक्रम।

यह मूलतः दार्शनिक और कानूनी विवाद का शब्द था।

यानी इतिहास की विडंबना देखिए—

जिस शब्द को आज हम आर्थिक बराबरी और सामाजिक न्याय से जोड़ते हैं, उसके शुरुआती प्रयोगों में वह उन विचारों पर हमला करने के लिए इस्तेमाल हुआ जो समाज, कानून और मानव अधिकारों को नए ढंग से समझने की कोशिश कर रहे थे।

1764-65 — एक ही समय में कई प्रयोग

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ‘socialista’ शब्द का इतिहास किसी एक

 व्यक्ति से नहीं जुड़ा।


ऐतिहासिक शब्द-स्रोतों में G. F. Finetti द्वारा 1764 में ‘socialista’ के

 प्रयोग और उसके बाद 1765 में Facchinei द्वारा ‘socialisti’ के प्रयोग

 का उल्लेख मिलता है।

इससे पता चलता है कि यह शब्द उस समय की दार्शनिक और धार्मिक बहसों में धीरे-धीरे आकार ले रहा था।

अर्थात—

यह शब्द किसी दिन अचानक पैदा नहीं हुआ था। वह बहसों के बीच धीरे-धीरे राजनीतिक भाषा में प्रवेश कर रहा था।

1780 का दशक — शब्द मौजूद था, लेकिन समाजवाद अभी पैदा नहीं हुआ था

अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में socialista और socialismo जैसे शब्दों के और प्रयोग दिखाई देते हैं।

लेकिन उनका अर्थ अभी भी आधुनिक आर्थिक समाजवाद जैसा नहीं था।

यहीं एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है—

‘Socialist’ शब्द का जन्म और ‘Socialism’ नाम की आधुनिक राजनीतिक-आर्थिक विचारधारा का जन्म एक ही घटना नहीं हैं।

पहले शब्द आया।

फिर उस शब्द को अलग-अलग विचारकों ने अलग अर्थ दिए।

और बहुत बाद में वह मजदूरों, संपत्ति, पूँजी और आर्थिक व्यवस्था से जुड़ा।

1790 का दशक — फ्रांसीसी क्रांति और शब्द की अस्थिर पहचान

फ्रांसीसी क्रांति ने यूरोप की राजनीतिक भाषा को हिला दिया।

स्वतंत्रता, समानता, नागरिक अधिकार, संपत्ति और राज्य की भूमिका पर बहस तेज हो गई।

इस दौर में socialiste जैसे शब्दों का प्रयोग भी अलग-अलग राजनीतिक

 संदर्भों में होने लगा।

यानी शब्द की पहचान अभी स्थिर नहीं थी।

कौन ‘समाजवादी’ है और कौन नहीं—इसकी कोई तय सीमा नहीं थी।

एक राजनीतिक खेमा जिस शब्द का इस्तेमाल विरोधी को बदनाम करने के लिए करता था, दूसरा

 खेमा उसी शब्द को किसी दूसरी अर्थ-छाया में इस्तेमाल कर सकता था।


यह शब्द अभी अपनी पहचान तलाश रहा था।

1803 — ‘Antisocialismo’: समाजवाद के खिलाफ बाकायदा बहस

1803 में पादुआ विश्वविद्यालय से जुड़े कानूनविद जियाकोमो ज्यूलियानी की L'antisocialismo confutato प्रकाशित हुई।

शीर्षक में ही antisocialismo यानी समाजवाद-विरोध की भाषा दिखाई देती है।

ज्यूलियानी की बहस रूसो और प्राकृतिक कानून की उन धारणाओं के विरुद्ध थी जिनमें मनुष्य की प्राकृतिक स्वतंत्रता और सामाजिक अनुबंध को महत्वपूर्ण माना जाता था।

उनका तर्क था कि मनुष्य की कोई काल्पनिक ‘प्राकृतिक अवस्था’ मानकर समाज और संपत्ति की पूरी व्यवस्था को समझना उचित नहीं है।

यहाँ कहानी का पहला बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है।

आज जिस शब्द को हम आर्थिक बराबरी, संपत्ति के पुनर्वितरण और कल्याणकारी राज्य से जोड़ते हैं, उसकी शुरुआती यात्रा में उसका इस्तेमाल उन्हीं विचारों की आलोचना के लिए भी हुआ था।

1827 — रॉबर्ट ओवेन और आधुनिक समाजवाद की दिशा

अब कहानी में बड़ा मोड़ आता है।

1827 में ब्रिटेन की Co-operative Magazine में ‘Communionists or Socialists’ जैसे शब्दों का प्रयोग सामूहिक स्वामित्व और सहकारी विचारों से जुड़े लोगों के लिए किया गया।

यहीं से ‘socialist’ शब्द आधुनिक आर्थिक अर्थ की दिशा में तेजी से बढ़ता दिखाई देता है।

और इसके केंद्र में थे रॉबर्ट ओवेन।

ओवेन खुद सफल उद्योगपति थे। लेकिन उनका मानना था कि मजदूरों को बेहतर परिस्थितियाँ देकर भी उत्पादन किया जा सकता है।

स्कॉटलैंड के New Lanark में उन्होंने बेहतर आवास, शिक्षा और काम की परिस्थितियों को बढ़ावा दिया।

ओवेन का समाजवाद क्रांतिकारी हिंसा से अधिक सहकारिता, सामूहिक हित और सामाजिक सुधार पर आधारित था।

यानी समाज को बदलने के लिए जरूरी नहीं कि पहले सत्ता पर कब्जा किया जाए।

समाज को बेहतर ढंग से संगठित करके भी परिवर्तन लाया जा सकता है।

1832-34 — फ्रांस में ‘Socialisme’ का राजनीतिक अर्थ मजबूत हुआ


इसके बाद फ्रांस में समाजवाद की भाषा तेजी से विकसित हुई।


1830 के दशक में socialisme शब्द का इस्तेमाल बढ़ा।


पियरे लेरू ने 1834 में De l'individualisme et du socialisme नामक लेख के माध्यम से

 ‘individualisme’ और ‘socialisme’ को आमने-सामने रखकर इस शब्द को फ्रांसीसी

 बौद्धिक बहस में महत्वपूर्ण जगह दी।


सेंट-सिमोनवादी और फूरियेवादी विचारधाराएँ भी इसी दौर में प्रभावशाली थीं।


यह समाजवाद अभी मार्क्स का समाजवाद नहीं था।


यहाँ जोर अधिक था—


सहयोग, सामाजिक संगठन और व्यक्ति तथा समाज के बीच संतुलन पर।


1848 — मार्क्स और एंगेल्स ने कहानी बदल दी


1848 में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स का Communist Manifesto प्रकाशित हुआ।


अब समाजवाद की एक नई धारा सामने आई।


मार्क्स ने समाज को वर्ग-संघर्ष के नजरिए से देखा।


उनके अनुसार पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपति और मजदूर वर्ग के बीच मूलभूत हित-संघर्ष मौजूद है।


अब समाजवाद केवल एक आदर्श समाज की कल्पना नहीं रहा।


वह इतिहास, अर्थव्यवस्था, वर्ग और क्रांति के सिद्धांत से जुड़ गया।


यहीं से समाजवाद की वह धारा मजबूत हुई जिसने आगे चलकर विश्व राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।


1864 — मजदूर आंदोलन अंतरराष्ट्रीय हुआ


1864 में International Workingmen's Association, जिसे बाद में First

 International कहा गया, की स्थापना हुई।


मजदूर आंदोलन अंतरराष्ट्रीय मंच पर आने लगा।


लेकिन समाजवादी आंदोलन के भीतर भी मतभेद थे।


मार्क्सवादी थे।


अराजकतावादी थे।


सहकारी समाजवादी थे।


सुधारवादी थे।


सबका लक्ष्य एक जैसा नहीं था।


सवाल था—


समाजवाद आए कैसे?


चुनाव और सुधार के रास्ते?


सहकारिता के रास्ते?


या क्रांति के रास्ते?


1871 — पेरिस कम्यून


1871 में Paris Commune का अनुभव समाजवादी और क्रांतिकारी राजनीति के इतिहास में

 एक महत्वपूर्ण घटना बना।


फ्रांस-प्रशा युद्ध के बाद पेरिस में एक अल्पकालिक क्रांतिकारी नगर-सरकार बनी।


यह केवल कुछ सप्ताह चली, लेकिन समाजवादी, अराजकतावादी और क्रांतिकारी विचारों के लिए

 यह एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उदाहरण बन गई।


बाद के समाजवादी विचारकों ने इसे अलग-अलग तरीके से देखा।


लेकिन एक बात स्पष्ट थी—


अब समाजवाद केवल किताबों का विचार नहीं था; वह सत्ता और शासन के प्रयोगों से भी जुड़ चुका था।


1889 — दूसरा इंटरनेशनल


1889 में Second International की स्थापना हुई।


अब समाजवादी और मजदूर पार्टियाँ यूरोप की राजनीति

 में महत्वपूर्ण शक्ति बनने लगीं।


कई जगह समाजवाद ने लोकतांत्रिक राजनीति का रास्ता

 पकड़ा।


यहीं से समाजवाद की दो बड़ी दिशाएँ और स्पष्ट होने लगीं

—


एक तरफ क्रांतिकारी समाजवाद, दूसरी तरफ

 लोकतांत्रिक और संसदीय समाजवाद।


आगे चलकर यही विभाजन बीसवीं शताब्दी की राजनीति

 में बहुत बड़ा रूप लेने वाला था।

1917 — रूस में विचार सत्ता बन गया


1917 की रूसी क्रांति ने समाजवाद की कहानी को पूरी तरह बदल दिया।


लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक सत्ता में आए।


अब समाजवाद सिर्फ किताबों, भाषणों और मजदूर आंदोलनों का विचार नहीं था।


वह राज्य-व्यवस्था बन चुका था।
1922 में सोवियत संघ यानी USSR अस्तित्व में आया।



राज्य ने अर्थव्यवस्था पर व्यापक नियंत्रण स्थापित किया और निजी पूँजी तथा उत्पादन के साधनों के स्वामित्व को सीमित करने की दिशा अपनाई।



यहीं से दुनिया में समाजवाद का एक अर्थ राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था और कम्युनिस्ट राजनीतिक व्यवस्था से गहराई से जुड़ गया।
लेकिन साथ ही एक नया सवाल भी पैदा हुआ—
क्या आर्थिक समानता के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता छोड़ी जा सकती है?


द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद — समाजवाद दुनिया भर में फैला
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद पूर्वी यूरोप के कई देशों में समाजवादी सरकारें बनीं।
1949 में चीन में कम्युनिस्ट क्रांति सफल हुई।


बाद में क्यूबा और कई अन्य देशों ने भी समाजवादी या कम्युनिस्ट मॉडल अपनाए।
लेकिन इनमें से प्रत्येक देश का अनुभव एक जैसा नहीं था।


कहीं समाजवाद राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन से जुड़ा था।
कहीं वह वर्ग-संघर्ष से।
कहीं औपनिवेशिक शासन के विरोध से।
और कहीं वह सीधे सोवियत प्रभाव के साथ आया।


वियतनाम — समाजवाद और राष्ट्रीय मुक्ति का अनोखा मेल
वियतनाम की कहानी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।



हो ची मिन्ह के नेतृत्व में कम्युनिस्ट आंदोलन ने पहले फ्रांसीसी औपनिवेशिक शासन के खिलाफ संघर्ष किया और बाद में वियतनाम युद्ध में दक्षिण वियतनाम तथा उसके अमेरिकी समर्थकों के विरुद्ध लड़ाई लड़ी।
1975 में युद्ध समाप्त हुआ।


उत्तर और दक्षिण वियतनाम के एकीकरण के बाद 2 जुलाई 1976 को देश का आधिकारिक नाम ‘Socialist Republic of Vietnam’ यानी ‘समाजवादी गणराज्य वियतनाम’ रखा गया।


वियतनाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ समाजवाद केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं था।
वह राष्ट्रीय स्वतंत्रता, औपनिवेशिक विरोध और राजनीतिक सत्ता के साथ भी जुड़ा हुआ था।


फिर 1980 के दशक के उत्तरार्ध में वियतनाम ने Đổi Mới आर्थिक सुधार शुरू किए।
बाजार को अधिक स्वतंत्रता मिली, निजी आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ीं और विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया गया।


लेकिन राजनीतिक व्यवस्था की समाजवादी पहचान बनी रही।
यानी यहाँ भी वही कहानी सामने आती है—


अर्थव्यवस्था बदल सकती है, लेकिन विचारधारा का संवैधानिक नाम बना रह सकता है।
भारत में समाजवाद की दस्तक


भारत में समाजवादी विचारों की गूँज 1920 के दशक में रूसी क्रांति के प्रभाव के साथ पहुँची।
लेकिन भारत ने सोवियत मॉडल को हूबहू स्वीकार नहीं किया।


भारतीय समाजवाद की अपनी कई धाराएँ बनीं।


जवाहरलाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और दूसरे नेताओं ने अलग-अलग रूपों में समाजवादी विचारों को भारतीय राजनीति से जोड़ा।
1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनी।


नेहरू आर्थिक योजना, औद्योगिकीकरण और सामाजिक-आर्थिक समानता के विचारों से प्रभावित थे।
लेकिन लोहिया का समाजवाद अलग था।
गांधी का आर्थिक चिंतन भी अलग था।
इसलिए भारतीय समाजवाद को एक ही रंग में रंगना सही नहीं होगा।
1950 — संविधान बना, लेकिन ‘समाजवादी’ शब्द नहीं था
यहाँ भारतीय कहानी का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ आता है।


जब संविधान 1950 में लागू हुआ, उसकी प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द नहीं था।
संविधान सभा में के.टी. शाह ने प्रस्तावना में समाजवादी दिशा की भाषा जोड़ने का प्रस्ताव रखा था।



लेकिन डॉ. भीमराव अंबेडकर किसी एक आर्थिक विचारधारा को संविधान में स्थायी रूप से बाँधने के पक्ष में नहीं थे।


उनका मूल तर्क था—
जनता को भविष्य में अपनी आर्थिक और सामाजिक नीतियाँ चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।
संविधान जनता को शासन करने का अधिकार देता है; वह जनता को हमेशा के लिए किसी एक आर्थिक नीति का कैदी नहीं बनाता।


यही कारण है कि अंबेडकर का रुख समझना बहुत महत्वपूर्ण है।


उन्होंने सामाजिक और आर्थिक न्याय का विरोध नहीं किया था; वे संविधान को किसी एक निश्चित आर्थिक मॉडल में बंद करने के विरोधी थे।


आज जो विचारधारा सत्ता में है, जरूरी नहीं कि आने वाली पीढ़ियाँ भी उसी को चुनें।
इसलिए संविधान किसी एक विचारधारा का मंदिर नहीं, बल्कि जनता को अपना रास्ता चुनने की स्वतंत्रता देने वाला लोकतांत्रिक चौराहा होना चाहिए।


1955 — नेहरू और ‘समाजवादी प्रतिमान’
1955 के आवाड़ी अधिवेशन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने ‘समाजवादी प्रतिमान वाले समाज’ की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लिया।
भारत ने मिश्रित अर्थव्यवस्था का रास्ता चुना।
न पूरी तरह निजी पूँजी पर निर्भरता।
न सोवियत शैली का पूर्ण राज्य स्वामित्व।
बड़े उद्योगों में सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी भूमिका रही।
योजना आयोग और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से राज्य ने आर्थिक विकास की दिशा तय करने की कोशिश की।
भारतीय समाजवाद इसलिए शुरू से ही लोकतंत्र + मिश्रित अर्थव्यवस्था + सामाजिक न्याय का मिश्रण था।
1976 — संविधान में ‘समाजवाद’ का प्रवेश
फिर आया 1976।

भारत आपातकाल से गुजर रहा था।

विपक्ष के अनेक नेता जेल में थे। प्रेस पर सेंसरशिप थी और नागरिक स्वतंत्रताएँ गंभीर रूप से सीमित थीं।


इसी दौर में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़े गए।


अब भारत को कहा गया—
“सम्प्रभु समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य।”
42वाँ संशोधन भारतीय संवैधानिक इतिहास के सबसे व्यापक संशोधनों में था।


1977 में जनता पार्टी की सरकार आई और 42वें संशोधन के कई हिस्सों को बदला गया।


लेकिन ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द प्रस्तावना में बने रहे।


यह इतिहास का ऐसा विरोधाभास है जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।
जिस दौर में देश में नागरिक स्वतंत्रताएँ गंभीर रूप से सीमित थीं, उसी दौर में संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द जोड़ा गया।


यह विडंबना इतिहास के सामने आज भी खड़ी है।
1991 — अर्थव्यवस्था ने करवट ली
फिर आया 1991।
भारत गंभीर आर्थिक संकट में था।
सरकार ने आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में बड़े कदम उठाए।
लाइसेंस-परमिट व्यवस्था कमजोर हुई।
निजी क्षेत्र के लिए रास्ते खुले।
भारतीय अर्थव्यवस्था अधिक बाजारोन्मुख होने लगी।
अब सवाल उठा—
अगर अर्थव्यवस्था बाजार की ओर जा रही है तो संविधान में समाजवाद क्यों है?
यही भारतीय समाजवाद का बड़ा विरोधाभास है।


अर्थव्यवस्था ने अपना रास्ता बदल लिया, लेकिन संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ शब्द वहीं बना रहा—मानो घर की पूरी व्यवस्था बदल गई हो, लेकिन दरवाजे पर लगी पुरानी नेमप्लेट आज भी वही हो।



लेकिन इसका अर्थ यह नहीं था कि भारत ने सामाजिक न्याय या कल्याणकारी राज्य की भूमिका छोड़ दी।
शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और कमजोर वर्गों के लिए सरकारी योजनाओं में राज्य की भूमिका बनी रही।
इसलिए 1991 के बाद भारत ने समाजवाद को पूरी तरह छोड़ा नहीं।
उसने समाजवाद का अर्थ बदल दिया।



2024 — सुप्रीम कोर्ट और भारतीय समाजवाद
2024 में सर्वोच्च न्यायालय के सामने प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्दों को चुनौती देने वाली याचिकाएँ आईं।
सर्वोच्च न्यायालय ने इन्हें खारिज कर दिया।


अदालत ने स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान में ‘समाजवाद’ का अर्थ सोवियत संघ जैसी राज्य-स्वामित्व वाली अर्थव्यवस्था अपनाना नहीं है।
भारतीय संदर्भ में इसका संबंध सामाजिक और आर्थिक न्याय, समान अवसर तथा कल्याणकारी राज्य से है।


यानी भारतीय समाजवाद का अर्थ यह नहीं कि देश में निजी संपत्ति या निजी व्यवसाय समाप्त कर दिए जाएँ।


सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र साथ-साथ रह सकते हैं।


यानी 2024 तक आते-आते भारतीय संविधान का समाजवाद सोवियत मॉडल वाले समाजवाद से बहुत अलग अर्थ ले चुका था।
शब्द वही रहा, लेकिन उसका अर्थ बदल गया।

आज दुनिया में समाजवाद कहाँ है?

आज भी समाजवाद अलग-अलग रूपों में कई देशों की संवैधानिक या राजनीतिक पहचान का हिस्सा है।

मार्क्सवादी-लेनिनवादी समाजवादी राज्य

चीन

क्यूबा

लाओस

उत्तर कोरिया

वियतनाम

वियतनाम को भूलना इसलिए भी महत्वपूर्ण चूक होगी क्योंकि उसका

 आधिकारिक नाम ही Socialist Republic of Vietnam है।

इसके अलावा लोकतांत्रिक देशों में समाजवाद का अर्थ अलग हो सकता है।

श्रीलंका का आधिकारिक नाम Democratic Socialist Republic of Sri Lanka है।

नेपाल के संविधान में ‘समाजवाद-उन्मुख राज्य’ की अवधारणा है।

पुर्तगाल के संविधान में भी समाजवाद की दिशा में संक्रमण का ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है।

इसलिए दुनिया में समाजवाद का कोई एक मॉडल नहीं है।

कहीं यह राज्य-स्वामित्व है।

कहीं कल्याणकारी राज्य।

कहीं सामाजिक न्याय।

कहीं राष्ट्रीय मुक्ति की विचारधारा।

और कहीं आर्थिक बराबरी का लक्ष्य।

तो आखिर समाजवाद है क्या?

यदि समाजवाद का अर्थ केवल निजी संपत्ति समाप्त करना है, तो भारत समाजवादी नहीं है।

यदि समाजवाद का अर्थ हर चीज पर सरकार का नियंत्रण है, तो आज का भारत समाजवादी नहीं है।

लेकिन यदि समाजवाद का अर्थ है—

कमजोर व्यक्ति को अवसर देना, सामाजिक और आर्थिक असमानता कम करना, शिक्षा और

 स्वास्थ्य जैसी मूल सुविधाओं तक पहुँच सुनिश्चित करना और राज्य को केवल शक्तिशाली लोगों का

 नहीं, बल्कि पूरे समाज का संरक्षक बनाना—तो भारतीय व्यवस्था में समाजवादी तत्व आज भी मौजूद हैं।

इसलिए समाजवाद को केवल मार्क्स, लेनिन या सोवियत संघ के चश्मे से देखना भारतीय संदर्भ को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है।

सबसे बड़ा सवाल — बराबरी या स्वतंत्रता?

समाजवाद की पूरी यात्रा आखिरकार हमें उसी सवाल पर वापस लाती है—

क्या आर्थिक बराबरी के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता छोड़ी जा सकती है?

सोवियत संघ और दूसरे अधिनायकवादी समाजवादी प्रयोगों ने यह सवाल खड़ा किया कि यदि राज्य आर्थिक समानता के नाम पर अत्यधिक शक्तिशाली हो जाए तो नागरिक स्वतंत्रता का क्या होगा?

दूसरी तरफ बाजार आधारित अर्थव्यवस्थाओं के सामने भी सवाल है—

यदि आर्थिक असमानता इतनी बढ़ जाए कि कुछ लोगों के पास संसाधनों का असाधारण संकेंद्रण हो जाए, तो क्या केवल राजनीतिक समानता पर्याप्त रह जाती है?

इसलिए असली सवाल केवल समाजवाद बनाम पूँजीवाद नहीं है।

असल सवाल शायद यह है—

कितनी आर्थिक समानता जरूरी है ताकि स्वतंत्रता केवल अमीरों का विशेषाधिकार न बन जाए,

 और कितनी राजनीतिक स्वतंत्रता जरूरी है ताकि समानता के नाम पर राज्य स्वयं नागरिकों का मालिक न बन बैठे?

अंत में — शब्द वही, चोला हर बार नया

‘समाजवाद’ की यात्रा को एक बार फिर देखिए।

1753 में socialistae जैसा शब्द दार्शनिक बहस में दिखाई देता है।

1764-65 में बेक्कारिया और उनके आलोचकों के विवाद के बीच ‘socialista/socialisti’ शब्द सामने आता है।

1803 में ‘antisocialismo’ यानी समाजवाद-विरोध की भाषा दिखाई देती है।

1827 में रॉबर्ट ओवेन और सहकारी आंदोलन के साथ यह आधुनिक आर्थिक अर्थ की ओर बढ़ता है।

1830 के दशक में फ्रांस में यह सामाजिक और राजनीतिक विचारधारा का नाम बनने लगता है।

1848 में मार्क्स और एंगेल्स इसे वर्ग-संघर्ष और क्रांतिकारी राजनीति से जोड़ते हैं।

1864 में मजदूर आंदोलन अंतरराष्ट्रीय मंच पर आता है।

1871 का पेरिस कम्यून क्रांतिकारी प्रयोग का प्रतीक बनता है।

1889 में समाजवादी आंदोलन का अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संगठन मजबूत होता है।

1917 में लेनिन के नेतृत्व में समाजवादी क्रांति सत्ता तक पहुँचती है।

1922 में USSR अस्तित्व में आता है।

1949 में चीन और बाद में वियतनाम, क्यूबा, लाओस तथा अन्य देशों में समाजवादी राजनीतिक व्यवस्थाएँ स्थापित होती हैं।

भारत में यह नेहरू, लोहिया, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव और अनेक अलग-अलग धाराओं से होकर गुजरता है।

1950 में यह संविधान की प्रस्तावना में नहीं था।

1955 में कांग्रेस ‘समाजवादी प्रतिमान’ की दिशा में आगे बढ़ती है।

1976 में आपातकाल के दौरान यह संविधान की प्रस्तावना में पहुँचता है।

1991 में भारत की अर्थव्यवस्था बाजार की ओर बड़ा कदम उठाती है।

और 2024 में सर्वोच्च न्यायालय भारतीय समाजवाद को लोकतंत्र, सामाजिक-आर्थिक न्याय और कल्याणकारी राज्य के संदर्भ में समझता है।


यानी—
शब्द वही रहा, लेकिन उसका चोला बार-बार बदलता रहा।
कभी वह गाली था।
फिर विचार बना।
फिर सामाजिक सुधार का रास्ता बना।
फिर मजदूरों की आवाज बना।


फिर क्रांति का नारा बना।

फिर राज्य-व्यवस्था बना।

और अंततः संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा बन गया।

शायद यही भाषा और सत्ता के रिश्ते की सबसे दिलचस्प सच्चाई है—

शब्द जनता के बीच जन्म लेते हैं, विचारधाराएँ उन्हें अर्थ देती हैं, सत्ता उन्हें अपने ढंग से इस्तेमाल करती है और इतिहास बाद में पूछता है—असल अर्थ क्या था?

और शायद ‘समाजवाद’ की कहानी का सबसे बड़ा सबक भी यही है—

किसी शब्द को समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि वह क्या कहता है; यह भी देखना पड़ता है कि उसे किसने, कब, किसके खिलाफ और किस उद्देश्य से कहा था।

आखिर में सवाल आज भी वहीं खड़ा है—

“बराबरी चाहिए तो कितनी स्वतंत्रता छोड़ेंगे,

और स्वतंत्रता बचानी हो तो कितनी असमानता सहेंगे?”

शायद समाजवाद की पूरी कहानी इसी दोराहे पर खड़ी है।

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