लोकतंत्र और बहुमत / भीड़

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  लोकतंत्र में बहुमत कब भीड़ बन जाता है? जब संख्या तर्क से बड़ी, नारा तथ्य से बड़ा और बहुमत संविधान से ऊपर हो जाए... लोकतंत्र का सबसे सरल अर्थ है—जनता का शासन। लेकिन यहीं से एक कठिन सवाल पैदा होता है। अगर जनता की संख्या ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है, तो क्या बहुमत जो चाहे वह कर सकता है? क्या 51 प्रतिशत लोग 49 प्रतिशत लोगों के अधिकार तय कर सकते हैं? क्या बहुमत के पास यह अधिकार होना चाहिए कि वह अल्पमत की आवाज़ बंद कर दे? और अगर किसी दिन बहुमत तर्क के बजाय भावनाओं, कानून के बजाय आक्रोश और विवेक के बजाय भीड़ की मानसिकता से निर्णय लेने लगे, तो वह बहुमत लोकतंत्र रहता है या भीड़ बन जाता है? यही वह महीन रेखा है जहाँ लोकतंत्र और भीड़तंत्र, विवेक और उन्माद, सभ्यता और बर्बरता एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं। --- भीड़तंत्र क्या है? ग्रीक भाषा में Ochlocracy (ओक्लोक्रेसी) शब्द दो शब्दों से बना है—ochlos, जिसका अर्थ है भीड़, और kratos, जिसका अर्थ है शासन या सत्ता। अर्थात—भीड़ का शासन। लेकिन भीड़ का अर्थ केवल सड़क पर जमा हजारों लोगों से नहीं है। कभी-कभी संसद में बैठा बहुमत भी भीड़ जैसी म...

राजपथ / कर्तव्य पथ की चमक और यथार्थ


 झाँकियों का सच और सच्चाई की ठिठुरन


हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी आते हैं।


तिरंगा लहराता है। राष्ट्रगान गूंजता है। परेड निकलती है। राज्यों की रंग-बिरंगी झाँकियाँ निकलती हैं—कहीं विकास दिखाई देता है, कहीं संस्कृति, कहीं किसान, कहीं विज्ञान, कहीं उद्योग और कहीं “एकता में अनेकता” का संदेश।


मंचों से देश की उपलब्धियाँ गिनाई जाती हैं। भाषणों में लोकतंत्र की मजबूती का दावा होता है। “सत्यमेव जयते” लिखा दिखाई देता है।


कुछ घंटों के लिए लगता है कि देश ने बहुत लंबी दूरी तय कर ली है।


लेकिन उत्सव समाप्त होने के बाद एक सवाल फिर सामने खड़ा हो जाता है—


क्या झाँकियों में दिखाई जाने वाली तस्वीर ही गणतंत्र का पूरा सच है?


हरिशंकर परसाई ने अपने प्रसिद्ध व्यंग्य ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ में इसी विरोधाभास को अपनी विशिष्ट व्यंग्य-दृष्टि से पकड़ा था। उनके लिए गणतंत्र केवल परेड, भाषण और समारोह नहीं था; वह उस आम आदमी की जिंदगी में दिखाई देना चाहिए था, जिसके नाम पर लोकतंत्र की सारी उपलब्धियाँ गिनाई जाती हैं।


दशकों बाद भी उनका सवाल इसलिए प्रासंगिक लगता है क्योंकि हमारी झाँकियाँ आज पहले से कहीं अधिक चमकदार हैं, लेकिन झाँकियों के बाहर खड़ा आदमी आज भी कई तरह की ठंड से जूझ रहा है।


यह ठंड केवल मौसम की नहीं है।


यह न्याय की देरी की ठंड है।

यह बेरोजगारी की ठंड है।

यह भ्रष्टाचार की ठंड है।

यह सामाजिक विभाजन की ठंड है।

यह राजनीतिक झूठ और दुष्प्रचार की ठंड है।

और सबसे खतरनाक—यह संवेदनहीनता की ठंड है।


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झाँकियों का स्वप्न और जमीन की सच्चाई


झाँकी का काम आदर्श दिखाना है। इसमें कोई बुराई नहीं।


समस्या तब पैदा होती है जब आदर्श को ही वास्तविकता का प्रमाणपत्र बना दिया जाए।


झाँकी में किसान समृद्ध दिखाई देता है, लेकिन वास्तविक किसान कर्ज, लागत, मौसम और बाजार की अनिश्चितताओं से जूझ सकता है।


झाँकी में डिजिटल भारत दिखाई देता है, लेकिन किसी गरीब या ग्रामीण नागरिक के लिए सरकारी कार्यालय में एक छोटी-सी प्रक्रिया आज भी कठिन हो सकती है।


झाँकी में विश्वस्तरीय शिक्षा दिखाई देती है, लेकिन देश के अनेक स्कूलों में आज भी बुनियादी सुविधाएँ, शिक्षक और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चुनौती बने हुए हैं।


झाँकी में आधुनिक अस्पताल दिखाई देते हैं, लेकिन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार के लिए गंभीर बीमारी आज भी आर्थिक संकट बन सकती है।


झाँकी में युवा हाथों में तकनीक दिखाई देती है, लेकिन लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं, बेरोजगारी और अनिश्चित भविष्य के बीच वर्षों निकाल देते हैं।


इस विरोधाभास को देखकर प्रश्न विकास के खिलाफ नहीं उठता।


प्रश्न यह है कि विकास की चमक का लाभ आखिर किसकी जिंदगी तक पहुँच रहा है?


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उपलब्धियों को स्वीकार करना भी जरूरी है


लेकिन यहाँ एक सावधानी भी जरूरी है।


भारत की उपलब्धियों को नकार देना भी उतना ही गलत होगा जितना उसकी कमियों को छिपाना।


विज्ञान, अंतरिक्ष, डिजिटल तकनीक, बुनियादी ढाँचे, संचार, उद्योग और अनेक दूसरे क्षेत्रों में देश ने उल्लेखनीय प्रगति की है। करोड़ों लोगों तक ऐसी सुविधाएँ पहुँची हैं जो कुछ दशक पहले कल्पना जैसी लगती थीं।


इन उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए।


लेकिन उपलब्धि पर गर्व करने का अर्थ यह नहीं कि सवाल पूछना बंद कर दिया जाए।


लोकतंत्र में दोनों बातें साथ चल सकती हैं—


देश की उपलब्धि पर गर्व और देश की कमी पर सवाल।


बल्कि सच्चा देशप्रेम शायद यही है कि हम अपनी उपलब्धियों को स्वीकार करें और अपनी कमियों को सुधारने का साहस भी रखें।


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गणतंत्र की सबसे लंबी ठंड—न्याय की प्रतीक्षा


गणतंत्र की सबसे गंभीर परीक्षा अदालतों में होती है।


किसी व्यक्ति का अधिकार छिन जाए, जमीन का विवाद हो, नौकरी का मामला हो, अपराध का मुकदमा हो या सरकार के किसी निर्णय को चुनौती देनी हो—आखिरकार नागरिक न्याय की ओर देखता है।


लेकिन जब न्याय वर्षों तक प्रतीक्षा में पड़ा रहे तो लोकतंत्र का भरोसा कमजोर होता है।


मार्च 2026 के सरकारी आँकड़ों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में 92,876 और हाईकोर्टों में 63,98,686 मामले लंबित थे। जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में 13 मार्च 2026 को लगभग 4.996 करोड़ मामले लंबित थे। यानी देश की निचली अदालतों में ही लंबित मामलों की संख्या लगभग पाँच करोड़ थी।


इन आँकड़ों में केवल फाइलें नहीं हैं।


इनमें किसी की जमीन है।


किसी की नौकरी है।


किसी का परिवार है।


किसी की संपत्ति है।


किसी की स्वतंत्रता है।


किसी पीड़ित का न्याय है।


और किसी आरोपी के लिए वर्षों तक लटका मुकदमा भी है।


जजों की कमी, अदालतों का बुनियादी ढाँचा, सरकारी मुकदमों की बड़ी संख्या, प्रक्रिया की जटिलता, जाँच और गवाहों से जुड़ी समस्याएँ—इन सबका असर न्याय की गति पर पड़ता है।


डिजिटल कोर्ट, ई-फाइलिंग, फास्ट ट्रैक कोर्ट और मध्यस्थता जैसे प्रयास हुए हैं और आगे भी हो रहे हैं। लेकिन मूल सवाल अब भी वही है—


न्याय कब मिलेगा?


क्योंकि न्याय में देरी केवल कानूनी समस्या नहीं है।


यह नागरिक के विश्वास की समस्या है।


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छात्र और नौजवान: भविष्य की कतार में खड़े लोग


देश का सबसे बड़ा संसाधन उसके युवा हैं।


हम भाषणों में युवाओं को भारत का भविष्य कहते हैं।


लेकिन उस भविष्य की वास्तविक स्थिति क्या है?


कहीं भर्ती परीक्षा वर्षों तक पूरी नहीं होती।


कहीं पेपर लीक की शिकायत सामने आती है।


कहीं परीक्षा रद्द होती है।


कहीं परिणाम के लिए इंतजार होता है।


कहीं आरक्षण को लेकर विवाद होता है।


कहीं परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं।


एक युवा पाँच-दस साल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में लगा देता है। उम्र निकल जाती है। कई बार परीक्षा होती है तो विवाद हो जाता है। परिणाम आता है तो मामला अदालत में चला जाता है।


फिर वही युवा पूछता है—


“जिस देश का मैं भविष्य हूँ, क्या मेरे वर्तमान की कोई जिम्मेदारी भी किसी की है?”


यह सवाल किसी एक सरकार या किसी एक दल का नहीं है।


यह पूरी व्यवस्था का सवाल है।


परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, समयबद्ध भर्ती, पेपर सुरक्षा, निष्पक्ष जाँच और शिकायतों के शीघ्र निपटारे की व्यवस्था किसी भी राजनीतिक दल से ऊपर का विषय होना चाहिए।


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शिक्षा और चिकित्सा की दो तस्वीरें


शिक्षा के क्षेत्र में हम विश्वस्तरीय संस्थानों की उपलब्धियाँ गिनाते हैं।


गिनानी भी चाहिए।


लेकिन भारत केवल कुछ उत्कृष्ट संस्थानों से नहीं बनता।


भारत उन करोड़ों बच्चों से भी बनता है जो छोटे कस्बों और गाँवों के विद्यालयों में पढ़ते हैं।


इसी तरह चिकित्सा में हमारे पास विश्वस्तरीय अस्पताल और विशेषज्ञ हैं। लेकिन देश के गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार के लिए गंभीर बीमारी आज भी आर्थिक संकट बन सकती है।


एक तरफ उपलब्धि है, दूसरी तरफ पहुँच का प्रश्न।


गणतंत्र की सफलता केवल यह नहीं कि देश में कितनी शानदार सुविधाएँ मौजूद हैं।


सवाल यह भी है कि उन सुविधाओं तक सामान्य नागरिक की पहुँच कितनी है।


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किसान की झाँकी और खेत की हकीकत


गणतंत्र दिवस की झाँकी में किसान हमेशा मुस्कुराता हुआ दिखाई देता है।


लेकिन खेत में मौसम बदलते ही उसका हिसाब बदल जाता है।


बीज महँगा हो सकता है।


खाद महँगी हो सकती है।


डीजल महँगा हो सकता है।


फसल खराब हो सकती है।


बाजार भाव गिर सकता है।


कर्ज का दबाव बढ़ सकता है।


किसान को केवल सम्मानित करने से समस्या हल नहीं होगी।


उसे स्थिर आय, बेहतर बाजार, सिंचाई, भंडारण, तकनीक और जोखिम से सुरक्षा चाहिए।


किसान की तस्वीर से अधिक जरूरी किसान की आय है।


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राजनीति की वह ठंड, जिसे झाँकियाँ नहीं दिखातीं


लोकतंत्र में राजनीति आवश्यक है।


राजनीतिक दल लोकतंत्र की बुराई नहीं हैं। सत्ता में परिवर्तन, विपक्ष, बहस और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र की ताकत हैं।


समस्या तब शुरू होती है जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा सत्ता के लिए समाज को ही प्रतिस्पर्धी खेमों में बाँटने लगे।


धर्म के नाम पर डर।


जाति के नाम पर नफरत।


क्षेत्र के नाम पर श्रेष्ठता।


भाषा के नाम पर विवाद।


और इन सबके ऊपर—


दुष्प्रचार।


राजनीतिक स्वार्थ के लिए झूठ, आधा-सच और भ्रामक सूचनाओं का इस्तेमाल लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।


राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं।


लेकिन मतभेद और दुश्मनी में अंतर है।


विपक्ष सरकार की आलोचना करे—यह लोकतंत्र है।


सरकार विपक्ष की आलोचना करे—यह भी लोकतंत्र है।


लेकिन यदि आलोचना का उत्तर तथ्य से नहीं, चरित्र-हनन से दिया जाए; सवाल का उत्तर तर्क से नहीं, भावनाएँ भड़काकर दिया जाए; और हर असहमति को देश-विरोध, धर्म-विरोध या समाज-विरोध की भाषा में बदल दिया जाए, तो लोकतांत्रिक संवाद कमजोर पड़ता है।


लोकतंत्र में झूठ केवल एक गलत सूचना नहीं होता; वह नागरिक के निर्णय लेने के अधिकार पर हमला भी बन सकता है।


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झूठ की ताकत अब नेता के माइक में नहीं, नागरिक के मोबाइल में भी है


कभी अखबार और समाचार चैनल सूचना के प्रमुख माध्यम थे।


आज हर मोबाइल फोन एक छोटा-सा प्रकाशन मंच बन चुका है।


इससे सूचना का लोकतंत्रीकरण हुआ है।


लेकिन एक दूसरी समस्या भी पैदा हुई है—


अब झूठ को फैलने के लिए किसी बड़े अखबार या टीवी चैनल की जरूरत नहीं।


एक पुराना वीडियो।


एक गलत फोटो।


एक अधूरा बयान।


एक मनगढ़ंत आँकड़ा।


एक भावनात्मक संदेश।


और कुछ ही मिनटों में वह हजारों-लाखों लोगों तक पहुँच सकता है।


समस्या केवल यह नहीं कि नेता झूठ बोलते हैं।


समस्या यह भी है कि हम वही झूठ जल्दी स्वीकार करते हैं जो हमारी राजनीतिक पसंद के अनुकूल होता है।


विरोधी के बारे में कोई खबर हो तो बिना प्रमाण के भी सही मान लेते हैं और अपने पसंदीदा नेता के बारे में प्रमाण सामने आ जाए तो भी उसे “दुष्प्रचार” कहकर खारिज कर देते हैं।


इस तरह राजनीतिक दुष्प्रचार की ताकत केवल नेता के भाषण में नहीं रहती—


वह हमारे हाथ में पकड़े मोबाइल में आ जाती है।


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अराजकता भी कभी-कभी राजनीति का हथियार बन जाती है


अराजकता हमेशा सड़क पर पत्थर चलने से पैदा नहीं होती।


कभी अफवाह अराजकता पैदा करती है।


कभी भीड़ की उत्तेजना।


कभी लगातार फैलाया गया अविश्वास।


कभी संस्थाओं के प्रति लोगों के विश्वास को कमजोर करने की कोशिश।


जब जनता को यह समझाया जाने लगे कि हर संस्था बिक चुकी है, हर पत्रकार झूठा है, हर अदालत पक्षपाती है, हर अधिकारी भ्रष्ट है और केवल हमारा नेता ही सच्चा है—तब लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।


व्यक्ति मजबूत होता है, संस्थाएँ कमजोर होती हैं।


और जिस दिन संस्थाएँ कमजोर हो जाती हैं, उस दिन लोकतंत्र की सबसे बड़ी सुरक्षा कमजोर हो जाती है।


राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र का उद्देश्य सत्ता को जवाबदेह रखना है।


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जाति, धर्म और क्षेत्र की दीवारें


हमारी झाँकियों में भारत की विविधता खूबसूरत लगती है।


लेकिन जमीन पर यही विविधता कई बार राजनीतिक गणित बन जाती है।


जाति वोट बैंक बनती है।


धर्म चुनावी मुद्दा बनता है।


क्षेत्र राजनीतिक पहचान बनता है।


भाषा संघर्ष का कारण बनती है।


पहचान अपने आप में समस्या नहीं है।


समस्या तब है जब पहचान को नागरिकता से ऊपर रख दिया जाए।


भारत की ताकत यह नहीं कि यहाँ सभी लोग एक जैसे हैं।


भारत की ताकत यह है कि अलग-अलग होने के बावजूद हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में साथ रह सकते हैं।


इसलिए गणतंत्र की असली परीक्षा झाँकी में दिखाई देने वाली एकता नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन में असहमति के बावजूद साथ रहने की क्षमता है।


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भ्रष्टाचार और लालफीताशाही की पुरानी ठंड


डिजिटल युग में फाइलें भले कंप्यूटर पर चली गई हों, लेकिन व्यवस्था की मानसिकता हर जगह डिजिटल नहीं हुई है।


कई नागरिकों के लिए आज भी सरकारी कार्यालय जाना मतलब—


एक आवेदन।


फिर दूसरा कागज।


फिर सत्यापन।


फिर किसी अधिकारी की प्रतीक्षा।


और अंत में वही सवाल—


“काम कब होगा?”


भ्रष्टाचार केवल रिश्वत लेने का नाम नहीं है।


जब किसी का वैध काम अनावश्यक रूप से रोका जाता है, तब भी नागरिक से कीमत वसूली जाती है—कभी पैसे में, कभी समय में, कभी सम्मान में।


इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ वास्तविक लड़ाई केवल भाषणों से नहीं होगी।


सरकारी प्रक्रिया जितनी सरल और पारदर्शी होगी, भ्रष्टाचार की गुंजाइश उतनी कम होगी।


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संविधान केवल किताब नहीं, नागरिक का सुरक्षा-कवच है


हम गणतंत्र दिवस पर संविधान को याद करते हैं।


लेकिन संविधान की असली परीक्षा समारोह में नहीं, नागरिक के अधिकारों के सामने होती है।


क्या गरीब और अमीर के अधिकार बराबर हैं?


क्या कमजोर और शक्तिशाली के लिए कानून की कसौटी समान है?


क्या असहमति रखने वाले को भी सम्मानपूर्वक अपनी बात कहने की जगह है?


क्या नागरिक अपने अधिकारों के लिए संस्थाओं तक पहुँच सकता है?


क्या सत्ता से सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता है?


यदि संविधान केवल सरकारी समारोहों में पढ़ा जाए और नागरिक के जीवन में दिखाई न दे, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है।


संविधान सत्ता को अधिकार देता है, लेकिन उसी सत्ता पर सीमाएँ भी लगाता है।


यही गणतंत्र की खूबसूरती है।


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लेकिन नागरिक भी पूरी तरह निर्दोष नहीं है


गणतंत्र की सारी जिम्मेदारी नेताओं पर डाल देना आसान है।


लेकिन क्या नागरिक की कोई जिम्मेदारी नहीं?


जब हम जाति देखकर वोट देते हैं।


जब धर्म देखकर खबर को सही या गलत मानते हैं।


जब अपने नेता की गलती को भी सही ठहराते हैं।


जब विरोधी की हर बात को झूठ मान लेते हैं।


जब बिना तथ्य जाँचे संदेश आगे बढ़ाते हैं।


जब रिश्वत देकर अपना काम निकलवाने को “व्यवहारिक बुद्धिमानी” समझते हैं।


जब कानून केवल अपने पक्ष में लागू होना चाहते हैं—


तब हम भी लोकतंत्र को कमजोर करते हैं।


गणतंत्र केवल नेताओं से नहीं बनता। नागरिक भी गणतंत्र का सह-निर्माता है।


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योजनाएँ बहुत हैं, लेकिन क्या रणनीति भी है?


सरकारें योजनाएँ बनाती हैं।


समितियाँ बनती हैं।


रिपोर्टें आती हैं।


नई घोषणाएँ होती हैं।


डिजिटल अदालतें, ई-फाइलिंग, फास्ट ट्रैक अदालतें और तकनीकी सुधार जैसे प्रयास हुए हैं।


लेकिन सवाल यह है—


क्या हम समस्या के लक्षणों का इलाज कर रहे हैं या बीमारी का?


यदि अदालतें लंबित मामलों से भरी हैं तो केवल डिजिटल फाइल पर्याप्त नहीं।


यदि युवा परीक्षा व्यवस्था से परेशान हैं तो केवल नई वेबसाइट पर्याप्त नहीं।


यदि किसान संकट में है तो केवल नई योजना पर्याप्त नहीं।


यदि नागरिक भ्रष्टाचार से परेशान है तो केवल नया पोर्टल पर्याप्त नहीं।


जरूरत है—


स्पष्ट लक्ष्य की, समयबद्ध क्रियान्वयन की, जवाबदेही की और परिणाम की।


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असली गणतंत्र कहाँ मिलेगा?


गणतंत्र उस दिन मजबूत नहीं होगा जब हमारी झाँकियाँ और अधिक शानदार हो जाएँगी।


गणतंत्र उस दिन मजबूत होगा जब—


किसान अपनी फसल का उचित मूल्य पाएगा।


युवा परीक्षा देकर समय पर परिणाम पाएगा।


गरीब इलाज के लिए अपना घर नहीं बेचेगा।


साधारण नागरिक बिना सिफारिश के सरकारी काम करा सकेगा।


पीड़ित को वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।


विरोध करने वाले को दुश्मन नहीं माना जाएगा।


सत्ता से सवाल पूछना अपराध नहीं समझा जाएगा।


विपक्ष को देश का शत्रु नहीं कहा जाएगा।


और राजनीतिक दल जनता को बाँटकर नहीं, जोड़कर वोट माँगेंगे।


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परसाई आज होते तो शायद क्या देखते?


शायद वे आज की झाँकियों को देखकर मुस्कुराते।


आज की झाँकियाँ पहले से कहीं अधिक भव्य हैं।


डिजिटल स्क्रीन हैं।


ड्रोन हैं।


तकनीक है।


अंतरिक्ष की उपलब्धियाँ हैं।


तेजी से बदलता भारत है।


लेकिन शायद उनकी व्यंग्य-दृष्टि फिर वही सवाल पूछती—


“यह सब ठीक है, लेकिन उस आदमी का क्या हुआ जो झाँकी देखकर तालियाँ तो बजा रहा है, पर उसकी अपनी जिंदगी अभी भी ठिठुर रही है?”


क्योंकि गणतंत्र केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं है।


गणतंत्र उपलब्धियों और असफलताओं—दोनों को स्वीकार करने का साहस है।


झाँकी में केवल उपलब्धि दिखाई जाए और असफलता छिपा दी जाए तो वह प्रचार हो सकता है, लोकतंत्र नहीं।


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ठिठुरन खत्म कैसे होगी?


इसका उत्तर किसी एक नेता, किसी एक सरकार या किसी एक राजनीतिक दल के पास नहीं है।


न्याय व्यवस्था को तेज और सुलभ करना होगा।


शिक्षा और परीक्षा प्रणाली को पारदर्शी बनाना होगा।


स्वास्थ्य व्यवस्था को आम आदमी की पहुँच में लाना होगा।


किसान की आय और बाजार सुरक्षा पर गंभीरता से काम करना होगा।


सरकारी प्रक्रियाओं को सरल करना होगा।


भ्रष्टाचार पर वास्तविक कार्रवाई करनी होगी।


राजनीतिक दुष्प्रचार को तथ्य और तर्क से चुनौती देनी होगी।


और सबसे महत्वपूर्ण—


राजनीति को झूठ, नफरत और भय की भाषा से ऊपर उठना होगा।


सत्ता किसी भी दल की हो, सवाल पूछने का अधिकार नागरिक का रहना चाहिए।


विपक्ष किसी भी दल का हो, उसकी आलोचना का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए।


मीडिया किसी के पक्ष में हो या विपक्ष में—तथ्य और सत्य की कसौटी नहीं छोड़नी चाहिए।


और नागरिक को भी वही खबर स्वीकार करने की आदत छोड़नी होगी जो उसकी अपनी राजनीतिक पसंद के अनुकूल हो।


क्योंकि लोकतंत्र की रक्षा केवल नेता नहीं करते।


सच बोलने वाला नागरिक भी लोकतंत्र का प्रहरी होता है।


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आखिर गणतंत्र किसके लिए है?


हर 26 जनवरी को हम गणतंत्र मनाते हैं।


हर 15 अगस्त को स्वतंत्रता का उत्सव मनाते हैं।


झाँकियाँ निकलती हैं।


तिरंगा लहराता है।


हम गर्व करते हैं—और करना भी चाहिए।


लेकिन उत्सव के बीच एक सवाल बचा रहना चाहिए—


आखिर गणतंत्र किसके लिए है—उस झाँकी के लिए जिसे हम कुछ मिनट देखते हैं, या उस नागरिक के लिए जो साल के 365 दिन उस गणतंत्र में जीता है?


यदि जिस भारत को हम झाँकी में दिखा रहे हैं, वह भारत आम आदमी की जिंदगी में भी दिखाई दे रहा है, तो हमारी उपलब्धि वास्तविक है।


यदि नहीं, तो झाँकी अभी अधूरी है।


क्योंकि गणतंत्र की असली खूबसूरती संसद की इमारत में नहीं, संविधान की किताब में नहीं, परेड की भव्यता में भी नहीं—


उस नागरिक की जिंदगी में है जिसे अपने अधिकार के लिए किसी सत्ता, जाति, धर्म, सिफारिश या भीड़ का सहारा न लेना पड़े।


जिस दिन किसान को अपने खेत में भविष्य दिखाई देगा,


युवा को अपनी मेहनत का परिणाम दिखाई देगा,


गरीब को अस्पताल में सम्मान दिखाई देगा,


पीड़ित को अदालत में समय पर न्याय दिखाई देगा,


नागरिक को सत्ता से सवाल पूछते हुए डर नहीं लगेगा,


और राजनीतिक दल जनता को बाँटने के बजाय जोड़ने में अपना राजनीतिक भविष्य देखने लगेंगे—


उस दिन हमारी झाँकियाँ केवल तस्वीर नहीं होंगी।


वे सच्चाई होंगी।


तब गणतंत्र ठिठुरेगा नहीं।


वह सचमुच गर्म साँस लेता हुआ, जीवंत और जागता हुआ गणतंत्र होगा।


और तब शायद हरिशंकर परसाई का व्यंग्य इतिहास की किताब में सुरक्षित रह जाएगा—क्योंकि जिस ठिठुरन पर उन्होंने व्यंग्य किया था, हमने आखिरकार उसे खत्म कर दिया होगा।


गणतंत्र की असली झाँकी सड़क पर नहीं, नागरिक के जीवन में दिखाई देती है।


यह लेख हरिशंकर परसाई के व्यंग्य की भावना से प्रेरित वर्तमान भारतीय लोकतंत्र का स्वतंत्र विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार लेखक के हैं। आँकड़ों और समकालीन मुद्दों का उल्लेख उपलब्ध सार्वजनिक/सरकारी स्रोतों के आधार पर किया गया है।

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