लोकतंत्र और बहुमत / भीड़

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  लोकतंत्र में बहुमत कब भीड़ बन जाता है? जब संख्या तर्क से बड़ी, नारा तथ्य से बड़ा और बहुमत संविधान से ऊपर हो जाए... लोकतंत्र का सबसे सरल अर्थ है—जनता का शासन। लेकिन यहीं से एक कठिन सवाल पैदा होता है। अगर जनता की संख्या ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है, तो क्या बहुमत जो चाहे वह कर सकता है? क्या 51 प्रतिशत लोग 49 प्रतिशत लोगों के अधिकार तय कर सकते हैं? क्या बहुमत के पास यह अधिकार होना चाहिए कि वह अल्पमत की आवाज़ बंद कर दे? और अगर किसी दिन बहुमत तर्क के बजाय भावनाओं, कानून के बजाय आक्रोश और विवेक के बजाय भीड़ की मानसिकता से निर्णय लेने लगे, तो वह बहुमत लोकतंत्र रहता है या भीड़ बन जाता है? यही वह महीन रेखा है जहाँ लोकतंत्र और भीड़तंत्र, विवेक और उन्माद, सभ्यता और बर्बरता एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं। --- भीड़तंत्र क्या है? ग्रीक भाषा में Ochlocracy (ओक्लोक्रेसी) शब्द दो शब्दों से बना है—ochlos, जिसका अर्थ है भीड़, और kratos, जिसका अर्थ है शासन या सत्ता। अर्थात—भीड़ का शासन। लेकिन भीड़ का अर्थ केवल सड़क पर जमा हजारों लोगों से नहीं है। कभी-कभी संसद में बैठा बहुमत भी भीड़ जैसी म...

निष्पक्ष चेहरे : सुनियोजित पटकथा

निष्पक्ष चेहरे, सुनियोजित पटकथा : आंदोलन, आक्रोश और राजनीतिक रणनीति का त्रिकोण

भारतीय राजनीति में सत्ता परिवर्तन के लिए जनता के आक्रोश को संगठित करना कोई नई परिघटना नहीं है, परंतु पिछले एक दशक में इस आक्रोश को "गैर-राजनीतिक चेहरों" के माध्यम से व्यक्त कराने की प्रवृत्ति एक सुनियोजित रणनीति के रूप में उभरी है। 

लगभग एक दशक पहले जब तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भ्रष्टाचार, महंगाई और नीतिगत लकवे के आरोपों से घिरी थी, तब सिविल सोसाइटी से जुड़े कुछ चेहरे — जो पारंपरिक राजनीतिक पृष्ठभूमि से नहीं आते थे — जनता के गुस्से का प्रतीक बनकर सामने आए। "इंडिया अगेंस्ट करप्शन" जैसे आंदोलनों ने वह वैचारिक और भावनात्मक भूमि तैयार की, जिस पर बाद में सत्ता परिवर्तन की इमारत खड़ी हुई।

आज, वर्षों बाद, नीट पेपर लीक जैसे संवेदनशील मामले में एक बार फिर वही पटकथा दोहराई जाती प्रतीत होती है — नए, अपरिचित, "निष्पक्ष" प्रतीत होने वाले चेहरे अचानक राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ जाते हैं। 

प्रश्न स्वाभाविक है — क्या यह जनविश्वास का स्वतःस्फूर्त उभार है, या सत्ता-विरोधी लहर को नियंत्रित दिशा देने की सुनियोजित रणनीति?
नए चेहरों की राजनीतिक उपयोगिता।

राजनीति में "चेहरा" केवल व्यक्ति नहीं होता — वह एक ब्रांड, एक भावना और एक विचार का प्रतिनिधित्व करता है। पारंपरिक राजनेता पर जनता का अविश्वास जब गहराता है, तब एक ऐसा चेहरा जिसकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि न हो, स्वतः ही "शुद्धता" और "ईमानदारी" का प्रतीक बन जाता है। 

यही मनोवैज्ञानिक शून्य नए चेहरों के प्रयोग को इतना प्रभावी बनाता है। एक दशक पहले का प्रयोग इसी सिद्धांत पर आधारित था — जनता को यह विश्वास दिलाना कि "व्यवस्था के भीतर से बदलाव संभव नहीं, बाहर से आया व्यक्ति ही व्यवस्था को शुद्ध कर सकता है।" यह नैरेटिव इतना सशक्त था कि उसने न केवल सत्तारूढ़ दल की विदाई सुनिश्चित की, बल्कि कई नए राजनीतिक दलों और नेताओं को भी जन्म दिया।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि यह कोई एक दल या विचारधारा विशेष की तकनीक नहीं है। सत्ता में बैठा हर पक्ष — चाहे वह किसी भी विचारधारा का हो — जनआक्रोश को अपने अनुकूल दिशा देने की कोशिश करता है। फर्क केवल इतना है कि कभी यह प्रयोग सफल होता है, कभी असफल।


नीट पेपर लीक मामला अपने आप में एक गंभीर शैक्षणिक और नैतिक संकट है, जिसने लाखों छात्रों के भविष्य को प्रभावित किया है। परंतु इस मुद्दे को जिस तरह से एक शब्द काक्रोच को पकड़कर सार्वजनिक विमर्श में उठाया गया, उसमें कुछ पैटर्न ध्यान देने योग्य लगते हैं —

पहला — आंदोलन का नेतृत्व उन चेहरों के हाथों में आता दिखा जो पहले से राजनीतिक रूप से स्थापित नहीं थे। 

दूसरा — मीडिया कवरेज में मुख्य विपक्षी दलों की भूमिका अपेक्षाकृत कम दिखी और इन नए चेहरों को अधिक तरजीह मिली। 

तीसरा — आंदोलन की भाषा और मांगें ऐसी रहीं जो व्यवस्थागत बदलाव की बजाय व्यक्तिगत जवाबदेही तक सीमित रहीं।
यह पैटर्न आवश्यक रूप से किसी सुनियोजित रणनीति का प्रमाण नहीं है, परंतु यह उन प्रश्नों को जन्म जरूर देता है जो एक सजग नागरिक को पूछने चाहिए।

आक्रोश का "डायवर्ज़न" : एक संभावित रणनीति का मर्म राजनीतिक रणनीतिकार भली-भाँति समझते हैं कि सत्ता के विरुद्ध बना जनाक्रोश यदि एकीकृत विपक्ष के हाथ में चला जाए, तो वह चुनावी परिणामों को पलट सकता है। इसलिए इस आक्रोश को खंडित, विकेंद्रित और गैर-दलीय बनाए रखना सत्तापक्ष के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है — यह किसी एक दल की विशेषता नहीं, बल्कि सत्ता में बैठे किसी भी पक्ष की स्वाभाविक प्रवृत्ति मानी जा सकती है।

नए चेहरे इस रणनीति में तीन प्रकार से भूमिका निभा सकते हैं —
प्रथम — आक्रोश का अवशोषण, जनता का गुस्सा किसी संगठित राजनीतिक शक्ति की ओर बहने के बजाय एक व्यक्ति-केंद्रित आंदोलन में सिमट जाता है, जो चुनावी दृष्टि से अपेक्षाकृत निष्प्रभावी होता है।

दूसरा — विपक्ष का हाशियाकरण,जब आंदोलन का चेहरा कोई "गैर-राजनीतिक" व्यक्ति होता है, तो मुख्य विपक्षी दलों को उस आंदोलन में सक्रिय भागीदारी करने पर "अवसरवादी" ठहरा दिया जाता है। परिणामस्वरूप विपक्ष या तो आंदोलन से दूर रहता है, या फिर उसमें शामिल होकर भी उसका श्रेय नहीं ले पाता।

तीसरा — विमर्श का पुनर्निर्धारण, मुद्दा वही रहता है, परंतु उसकी व्याख्या बदल जाती है। "व्यवस्थागत विफलता" का प्रश्न "व्यक्तिगत भ्रष्टाचार" में सिमट जाता है, और सत्ता की संरचनात्मक जवाबदेही से ध्यान हट जाता है।


सनद रहे "चुनाव लड़ना और जीतना दोनों अलग बातें हैं"  राजनीति में चुनाव जीतने के लिए विचारधारा, संगठन और जनसंपर्क पर्याप्त माने जाते थे। परंतु आज का चुनावी परिदृश्य कहीं अधिक जटिल है — इसमें नैरेटिव मैनेजमेंट, डेटा एनालिटिक्स, सोशल मीडिया इंजीनियरिंग, और परसेप्शन कंट्रोल जैसे अनेक तत्व जुड़ चुके हैं। यह तकनीकें किसी एक दल तक सीमित नहीं — आज लगभग हर बड़ा राजनीतिक दल इन्हीं औजारों का सहारा लेता है।

इन्हीं हथकंडों में एक परिष्कृत तकनीक है — एंटी-इन्कम्बेंसी का प्रबंधन। सत्ता के विरुद्ध बनी नाराज़गी को समाप्त करना कठिन है, परंतु उसकी दिशा बदलना अपेक्षाकृत सरल। नए चेहरे इसी दिशा-परिवर्तन के उपकरण बन सकते हैं। वे जनता को यह अनुभूति देते हैं कि उनका आक्रोश व्यक्त हो रहा है, परंतु वास्तव में वह आक्रोश किसी ऐसे मंच पर व्यक्त होता है जो चुनावी गणित को प्रभावित करने में असमर्थ रहता ह

 एक द्वंद्व यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि सभी नए चेहरे रणनीति के मोहरे नहीं होते। कई बार सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता, ईमानदार पत्रकार, और निष्ठावान छात्र नेता भी जन-आंदोलनों के अग्रदूत बनते हैं। परंतु सवाल तब उठता है जब इन चेहरों को चयनात्मक मीडिया प्रचार, संगठित सोशल मीडिया समर्थन, और असामान्य ढंग से संसाधन अचानक प्राप्त होने लगते हैं।

एक स्वतःस्फूर्त आंदोलन और एक प्रायोजित आंदोलन में यही मूलभूत अंतर होता है — पहला संसाधनों के अभाव में भी टिकता है, दूसरा संसाधनों की उपस्थिति के बल पर उभरता है। जब जनता किसी नए चेहरे पर विश्वास करती है, तो वह विश्वास पवित्र होता है। परंतु जब वही विश्वास किसी की राजनीतिक फसल काटने का साधन बन जाए, तो यह लोकतंत्र के साथ छल है — चाहे यह छल किसी भी दल या विचारधारा की ओर से क्यों न हो।


यह सवाल ऐसे ही नहीं खड़ा हुआ है। एक दशक पहले का प्रयोग सफल हुआ क्योंकि वह जनता की वास्तविक पीड़ा से जुड़ा था, चाहे उसके पीछे की रणनीति कुछ भी रही हो। उस प्रयोग की सफलता ने हर राजनीतिक पक्ष को यह पाठ सिखाया कि "आक्रोश को नियंत्रित दिशा देकर सत्ता संचालित की जा सकती है।" नीट पेपर लीक मामले में नए चेहरों का उभार संभवतः इसी पाठ का व्यावहारिक अनुप्रयोग है — हालाँकि निश्चितता से यह कहना कठिन है।

लोकतंत्र में जनआंदोलनों की भूमिका अपरिहार्य है, परंतु उतनी ही अपरिहार्य है आलोचनात्मक विवेक की भूमिका। नागरिकों को यह प्रश्न पूछना चाहिए —
यह चेहरा कहाँ से आया? 
इसे मंच किसने दिया? 
इसकी माँगें व्यवस्थागत हैं या व्यक्तिगत? 
इसके आंदोलन का चुनावी लाभ किसे मिल रहा है?
जब तक जनता इन प्रश्नों को पूछती रहेगी, तब तक नए चेहरों का प्रयोग जनतंत्र को सशक्त करेगा। परंतु जिस दिन जनता केवल चेहरे देखकर विश्वास करने लगेगी, उस दिन लोकतंत्र चेहरों की राजनीति में बदल जाएगा — जहाँ मुखौटे बदलते रहेंगे, परंतु सत्ता का चरित्र वही रहेगा।
अंततः, प्रश्न चेहरों का नहीं, चरित्र का है; रणनीति का नहीं, नीयत का है; और सबसे बढ़कर — जनता की जागरूकता का है।

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