सड़क पर आए नारे: सिर्फ गुस्सा नहीं, टूटते भरोसे की चेतावनी।

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सड़क पर आए नारे: सिर्फ गुस्सा नहीं, एक चेतावनी है। दिल्ली में हाल ही में नारे लगे: "एक कचौड़ी दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा", "मेरे सिर में दर्द है, उसका कारण मर्द है।" कुछ लोग कहेंगे कि यह गुस्से में निकले शब्द हैं, इन पर इतना क्यों सोचना? पर यह समझना अब नादानी होगी। जो बात कल तक मज़ाक, ताने और रील में थी, वह आज सड़क पर नारा बन गई है। जब कोई बात हँसी-मज़ाक से निकलकर सड़क पर आ जाए, तो समझिए वह लोगों के मन में बैठ चुकी है। यह चिंता सिर्फ मेरी नहीं है। समाजशास्त्री, कानूनविद् और मनोवैज्ञानिक, तीनों अपने-अपने तरीके से इस बदलाव को समझाते हैं। आइये सबसे पहले देखते है कि सामाजिक विचारक इस पर क्या कहते हैं। फ्रांस के समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम ने डेढ़ सौ साल पहले चेताया था कि जब समाज में साझा नियम और आपसी बंधन कमज़ोर पड़ते हैं, तो लोग दिशाहीन और अकेले हो जाते हैं।   उन्होंने इस हालत को "एनोमी" यानी मूल्यहीनता की स्थिति कहा। अमेरिकी विद्वान रॉबर्ट पुटनम ने अपनी किताब Bowling Alone में दिखाया कि जहाँ आपसी मेल-जोल और भरोसा घटता है, वहाँ समाज की ताकत घट...

गाली - संस्कृति का उदय — भाषा के गिरते मानक

हम भारतीयों को गाली, अपमान और बुरी बात बहुत जल्दी बुरी लगती है। कारण साफ है — हमारे यहाँ शुरू से सिखाया गया कि अच्छी भाषा और अच्छा बर्ताव इंसान की पहचान होती है। घर में, स्कूल में, समाज में  हर जगह यही सिखाया गया कि गाली देना, अपशब्द बोलना बुरी बात है।

लेकिन अब हालात बदल गए हैं। आजकल गाली सिर्फ गुस्से में नहीं निकलती, बल्कि मजाक में, दोस्ती में, यहाँ तक कि प्यार जताने के लिए भी बोली जाती है। घर में, दोस्तों के बीच, स्कूल-कॉलेज में, सोशल मीडिया पर — गाली इतनी आम हो गई है कि बहुत से लोग इसे भाषा का सामान्य हिस्सा ही मानने लगे हैं। मगर जैसे ही कोई सबके सामने गाली दे दे, तुरंत हंगामा शुरू हो जाता है। यही तो असली दोहरापन है — अंदर कुछ और, बाहर कुछ और।

किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक प्रगति, तकनीकी उपलब्धियों या ऊँची इमारतों से नहीं होती; उसकी वास्तविक पहचान उसकी भाषा, व्यवहार और सामाजिक मर्यादाओं से होती है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, संस्कार और सामूहिक चेतना का दर्पण है। इसलिए जब किसी समाज की भाषा बदलती है, तो उसके सामाजिक मानक भी बदलने लगते हैं।

भारतीय समाज ने सदियों तक शिष्टाचार,विनम्रता और सम्मानजनक संवाद को सामाजिक आदर्श माना। घरों में बच्चों को सिखाया जाता था कि "मीठे वचन" व्यक्ति के चरित्र का परिचय होते हैं। विद्यालयों में भाषा और आचरण, दोनों को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा माना जाता था। गाली-गलौज को केवल अशिष्टता नहीं, बल्कि संस्कारों की कमी समझा जाता था।

किन्तु पिछले कुछ वर्षों में यह स्थिति तेजी से बदली है। आज गाली केवल क्रोध की अभिव्यक्ति नहीं रह गई, बल्कि हास्य, मित्रता, लोकप्रियता और तथाकथित "कूल" संस्कृति का हिस्सा बना दी गई है। फिल्मों, वेब सीरीज़, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम्स और डिजिटल कंटेंट ने इसे सामान्य व्यवहार की तरह प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है। 

परिणाम यह है कि जो भाषा कभी सामाजिक रूप से अस्वीकार्य थी, वह अब अनेक युवाओं के दैनिक संवाद का हिस्सा बन चुकी है।
यह परिवर्तन केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं है; यह सामाजिक मानकों के परिवर्तन का संकेत है।
संस्कृति और सामाजिक मानकों की चुनौती
हर समाज कुछ अलिखित नियमों पर चलता है। इन्हीं नियमों से तय होता है कि क्या सम्मानजनक है, क्या अनुचित है और किन व्यवहारों को समाज स्वीकार करेगा। 

यदि लगातार अपमानजनक भाषा को सामान्य बताया जाए, तो धीरे-धीरे समाज की संवेदनशीलता कम होने लगती है।
समस्या यह नहीं कि कुछ लोग गाली देते हैं; समस्या यह है कि समाज उसे सामान्य मानने लगे। जब अपमानजनक भाषा मनोरंजन का साधन बन जाए, तब सम्मानजनक संवाद कमजोर पड़ने लगता है। इसका प्रभाव केवल व्यक्तिगत व्यवहार पर नहीं, बल्कि पारिवारिक संबंधों, विद्यालयों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक जीवन पर भी पड़ता है।

डिजिटल युग ने अभिव्यक्ति की अभूतपूर्व स्वतंत्रता दी है। यह लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन इसी के साथ एक चुनौती भी सामने आई है—ध्यान आकर्षित करने की प्रतिस्पर्धा।

एक सर्वे में (करीब 70,000 लोगों पर, 2014 से 2025 के बीच) पता चला कि भारत में हर दूसरे-तीसरे इंसान यानी करीब 55 प्रतिशत लोग रोज गाली बोलते हैं। दिल्ली में यह आंकड़ा 80 प्रतिशत तक पहुंच गया, पंजाब में 78 प्रतिशत, यूपी-बिहार में 74-74 प्रतिशत। दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के राज्यों में यह अपेक्षाकृत कम है। और चौंकाने वाली बात — करीब 30 प्रतिशत महिलाएं भी या तो खुद गाली बोलती हैं या इसे सहती हैं।

जब युवाओं से पूछा गया कि उन्होंने गाली कहां से सीखी, तो ज्यादातर का जवाब था — फिल्में, ओटीटी शो, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स। 

मुंबई के कॉलेजों में हुए एक सर्वे में 95 प्रतिशत टीचरों ने कहा कि वे कैंपस में अक्सर गाली सुनते हैं, और 80 प्रतिशत से ज्यादा मानते हैं कि पिछले कुछ सालों में यह बहुत बढ़ी है। इसकी सबसे बड़ी वजह उन्होंने बताई — पॉपुलर कल्चर और ओटीटी कंटेंट।


पहले फिल्मों और टीवी में भी गाली आती थी, लेकिन सेंसर और समाज के दबाव की वजह से वह सीमित रहती थी। मगर 2015-16 के बाद जब नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, हॉटस्टार जैसे प्लेटफॉर्म आए, तो मिर्जापुर, सेक्रेड गेम्स, पाताल लोक जैसी सीरीज ने गांव-कस्बों की भाषा के नाम पर खुलेआम भारी मात्रा में गालियां परोस दीं। "असली" और "रियलिस्टिक" दिखाने के चक्कर में गाली अब हर घर तक पहुंच गई। कई भाषा जानकार और टीचर कहते हैं कि इसका सीधा असर कॉलेज के बच्चों की बोलचाल पर दिख रहा है।

फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम (Émile Durkheim) ने समाज को जोड़कर रखने वाले तत्वों में सामाजिक मानकों (Social Norms) को सबसे महत्वपूर्ण माना। उनका मानना था कि जब समाज के साझा मानक कमजोर पड़ने लगते हैं, तो "एनॉमी (Anomie)" अर्थात् मानकहीनता की स्थिति उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति में लोग यह तय नहीं कर पाते कि कौन-सा व्यवहार स्वीकार्य है और कौन-सा नहीं। 

परिणामस्वरूप सामाजिक अनुशासन और पारस्परिक सम्मान दोनों कमजोर होने लगते हैं।
आज यदि गाली-गलौज को "सामान्य भाषा" कहा जाने लगे, तो यह केवल भाषाई परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक मानकों के बदलने का संकेत भी है।


प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बंडूरा (Albert Bandura) के सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory) के अनुसार मनुष्य केवल उपदेशों से नहीं, बल्कि देखकर सीखता है। बच्चे और युवा अपने परिवार, मित्रों, शिक्षकों, लोकप्रिय कलाकारों, खिलाड़ियों तथा डिजिटल मीडिया में दिखने वाले व्यवहार की नकल करते हैं। 

यदि बार-बार गाली-गलौज को हास्य, शक्ति, मित्रता या आधुनिकता के प्रतीक के रूप में दिखाया जाए, तो दर्शक भी उसे सामान्य व्यवहार मानने लगते हैं।

इसी प्रकार मनोविज्ञान की डिसेन्सिटाइजेशन (Desensitization) अवधारणा बताती है कि किसी नकारात्मक व्यवहार को बार-बार देखने और सुनने से उसके प्रति संवेदनशीलता कम होती जाती है। जो शब्द पहले अपमानजनक लगते थे, वे धीरे-धीरे सामान्य प्रतीत होने लगते हैं। यही कारण है कि कई बार लोग अनजाने में ऐसी भाषा बोलने लगते हैं जिसे वे कुछ वर्ष पहले स्वयं अनुचित मानते थे।


संचार वैज्ञानिक जॉर्ज गर्बनर (George Gerbner) की कल्टीवेशन थ्योरी (Cultivation Theory) बताती है कि यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक एक जैसी मीडिया सामग्री देखता है, तो वह उसे वास्तविक जीवन का सामान्य रूप मानने लगता है। इसलिए यदि मनोरंजन में लगातार अपमानजनक भाषा, आक्रामकता और अशिष्ट व्यवहार को सामान्य दिखाया जाएगा, तो उसका प्रभाव सामाजिक व्यवहार पर पड़ना स्वाभाविक है।

यह कहना उचित नहीं होगा कि मीडिया अकेला दोषी है। लेकिन यह भी उतना ही गलत होगा कि मीडिया का समाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वास्तविकता यह है कि मीडिया और समाज दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं।

संस्कृति परिवर्तनशील होती है, लेकिन हर परिवर्तन प्रगति नहीं होता। कुछ परिवर्तन समाज को अधिक मानवीय बनाते हैं, जबकि कुछ उसकी संवेदनशीलता और मर्यादा को कमजोर करते हैं।
प्रश्न यह नहीं कि गाली किसने शुरू की। प्रश्न यह है कि क्या हम उसे सामाजिक सामान्यता का दर्जा देना चाहते हैं?

यदि उत्तर "नहीं" है, तो परिवर्तन किसी कानून से पहले अपने घर, अपने विद्यालय, अपने डिजिटल व्यवहार और अपनी भाषा से शुरू करना होगा। क्योंकि शब्द केवल बोले नहीं जाते—वे समाज का चरित्र गढ़ते हैं। जिस समाज की भाषा सम्मान खो देती है, वहाँ धीरे-धीरे संबंध, विश्वास और लोकतांत्रिक संस्कृति भी कमजोर पड़ने लगती है।


  बबूल का पेड़ लगाकर आम की उम्मीद करना बेवकूफी है। जब रोज लाखों बच्चे और बड़े फोन, टीवी और सोशल मीडिया पर गाली-गलौच और फूहड़ता देख-सुन रहे हैं, तो उनके बर्ताव पर उसका असर पड़ना ही है।

इस समस्या को कमतर किया जा सकता है इसके लिए कुछ कदम उठाने होंगे —


1 — मनोरंजन के धंधे पर निगरानी हो जितना विवादित, गंदा और भड़काऊ कंटेंट, उतने ज्यादा व्यूज। इसलिए हर कोई यही परोस रहा है।


2 — सोशल मीडिया का पैसा कमाने वाला खेल,एल्गोरिद्म ऐसा ही कंटेंट आगे बढ़ाता है जो लोगों को स्क्रीन पर ज्यादा देर रोके रखे। कई क्रिएटर गाली-गलौच और विवाद से ही कमाई करते हैं। प्लेटफॉर्म को भी इससे फायदा है, इसलिए कोई सख्ती नहीं होती है।


3 — कई घरों में खुद बड़े-बुजुर्ग गाली बोलते हैं। स्कूल-कॉलेज में नैतिक शिक्षा अब सिर्फ किताबी बात रह गई है, असली जिंदगी में उसका कोई मतलब नहीं रहा।


4 — जो अकाउंट गाली, नफरत और गंदी बातों से पैसा कमा रहे हैं, उनकी कमाई बंद हो। जो कंटेंट बच्चों के लायक नहीं, उसे बढ़ावा न मिले।

5 — ओटीटी पर सख्ती,आईटी नियम 2021 के तहत जो नियम बने हैं, उन्हें सख्ती से लागू किया जाए। उम्र के हिसाब से कंटेंट बांटना सिर्फ कागज पर न रहे, असल में लागू हो। बच्चों तक पहुंचने वाले कंटेंट पर खास नजर रहे।

6 — स्कूलों में भाषा और बर्ताव पर बातचीत हो। "गाली मुक्त घर" जैसी मुहिमों को सरकार का साथ मिले। पेरेंट्स को भी डिजिटल जागरूकता सिखाई जाए।

7 — जो क्रिएटर अच्छी भाषा और अच्छे मूल्य दिखाते हैं, उन्हें इनाम और छूट देकर आगे बढ़ाया जाए।

8 — खुद घर में संयमित भाषा बोलें और बच्चों के फोन-स्क्रीन टाइम पर नजर रखें।

9 — भाषा, मीडिया और बर्ताव के रिश्ते पर सही मायने में गहरी रिसर्च हो, और उसी के आधार पर नीति बने।


इतने बड़े और विविधता वाले देश में साफ-सुथरा माहौल बनाए रखना आसान नहीं, लेकिन नामुमकिन भी नहीं। अगर व्यवस्था बस खानापूर्ति करती रही और बाजार के दबाव में नैतिकता को छोड़ती रही, तो आने वाले सालों में सिर्फ भाषा नहीं, आपसी सम्मान और समाज का ताना-बाना भी बिगड़ जाएगा। बिना सोचे-समझे जो परोसा जा रहा है उसे चुपचाप स्वीकार कर लेना — इस जॉम्बी कल्चर को रोकना जरूरी है। वरना सार्वजनिक जीवन में शुचिता की बात करना खुद के साथ धोखा होगा।

संस्कृति बदलती रहती है, लेकिन दिशा चुनना हमारे हाथ में है। अगर हम चाहते हैं कि अगली पीढ़ी इज्जत और संयम से बात करे, तो कदम आज से ही उठाने होंगे।
शब्दों का पतन अक्सर सभ्यता के पतन की पहली आहट होता है। इसलिए भाषा की रक्षा केवल व्याकरण की नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति की रक्षा भी है।

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