यम दरबार में चर्चा : भारत ने "चाँद, मंगल पर विजय प्राप्त किया पर छात्रों पर अन्याय कैसे और क्यों?"
यमराज:
चित्रगुप्त, जम्बूद्वीप की प्रगति का ब्यौरा प्रस्तुत करो। सुना है वहाँ के लोग अब चाँद पर पहुँच गए हैं, मंगल तक अपना परचम लहरा आए हैं। विश्व भर में उनकी प्रतिभा का डंका बज रहा है। बड़े-बड़े उद्योगों का नेतृत्व भी उनके लोग कर रहे हैं। लगता है अब वहाँ न्याय और व्यवस्था भी उतनी ही ऊँचाई पर पहुँच गई होगी?
चित्रगुप्त:
प्रभु, यही सबसे बड़ा भ्रम है।
जम्बूद्वीप ने चाँद और मंगल तक पहुँचने की क्षमता तो अर्जित कर ली, पर अपने ही छात्रों के भविष्य तक पहुँचने की जिम्मेदारी अभी भी अधूरी है। विज्ञान आकाश में उड़ रहा है, लेकिन लाखों विद्यार्थियों के सपने आज भी व्यवस्था की फाइलों में अटके पड़े हैं।
यमराज:
यह कैसे संभव है? जो राष्ट्र अंतरिक्ष को जीत सकता है, वह अपने छात्रों का भविष्य क्यों नहीं संभाल पा रहा?
चित्रगुप्त:
प्रभु, यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि रोज़ का यथार्थ है। जम्बूद्वीप में प्रतिभा की कमी नहीं, लेकिन व्यवस्था की कमजोरियाँ और भ्रष्टाचार इतने गहरे हैं कि हजारों योग्य छात्र उस मुकाम तक नहीं पहुँच पाते जिसके वे वास्तविक अधिकारी होते हैं। उनकी मेहनत हारती नहीं—उसे हराया जाता है।
यमराज:
अपराधियों के नाम बताओ।
चित्रगुप्त:
प्रभु, अपराधी कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरी अव्यवस्था है। उसके कुछ प्रमुख चेहरे हैं—
👉 पहला — पेपर लीक।
एक प्रश्नपत्र लाखों छात्रों के वर्षों के परिश्रम को कुछ मिनटों में नष्ट कर देता है। स्वयं आपके अभिलेखागार गवाह हैं, प्रभु — विश्लेषकों के अनुसार 2002 से 2025 के बीच जम्बूद्वीप में करीब पैंतालीस बड़े पेपर लीक दर्ज हुए, जबकि कुछ अन्य आकलनों के अनुसार 2019 से 2024 के बीच ही कम से कम पैंसठ बड़ी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक हुए है।
इनमें से भी एक और अध्ययन बताता है कि सात वर्षों में पंद्रह प्रांतों में सत्तर परीक्षाओं के पेपर लीक हुए — यानी आँकड़ा भले अलग-अलग गिना जाए, रोग एक ही है।
अकेले वर्ष 2024 को लीजिए। इसी वर्ष तीन बड़ी परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं — मेडिकल प्रवेश परीक्षा, जूनियर रिसर्च फेलोशिप की परीक्षा और मेडिकल स्नातकोत्तर परीक्षा — और तीनों में पेपर लीक ही मूल कारण बना।
मेडिकल प्रवेश परीक्षा तो जम्बूद्वीप के इतिहास की सबसे विवादित परीक्षाओं में गिनी जाने लगी; जाँच में पाया गया कि परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र की तस्वीर खींचकर कुछ चुनिंदा छात्रों तक पहुँचा दी गई थी।
इतना ही नहीं, परीक्षा संचालन संस्था ने बिना ठोस आधार पंद्रह सौ से अधिक छात्रों को अतिरिक्त कृपांक दे दिए, जिससे सड़सठ छात्र पूर्ण अंक पाकर संयुक्त रूप से प्रथम स्थान पर आ गए — और तब सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही यह कृपांक वापस लिए जा सके।
इसके विरोध में देश भर के कई बड़े नगरों में विद्यार्थियों ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया। संसद में भी यह मुद्दा गूँजा, जहाँ प्रतिपक्ष के एक वरिष्ठ सांसद ने दावा किया कि छह प्रांतों में पचासी लाख बच्चों का भविष्य पेपर लीक की भेंट चढ़ गया।
👉 दूसरा — आरक्षण और अवसरों की विसंगतियाँ।
जहाँ अनेक स्थानों पर योग्यता और अवसर के बीच टकराव की भावना पैदा होती है, जिससे असंतोष जन्म लेता है।
👉 तीसरा — सीटें खाली छोड़ देना।
लाखों विद्यार्थी प्रवेश के लिए भटकते रहते हैं, लेकिन अनेक सीटें विभिन्न कारणों से रिक्त रह जाती हैं। यह सिर्फ संस्थानों में ही नहीं, अपितु सेवा-चयन हेतु राज्य सरकारों द्वारा ली जाने वाली परीक्षाओं में भी होता है। तकनीकी शिक्षा को ही देख लीजिए।
प्रभु — शिक्षा मंत्रालय के अपने आँकड़े कहते हैं कि एक वर्ष में स्वीकृत साढ़े बारह लाख इंजीनियरिंग सीटों में से सवा चार लाख सीटों पर एक भी प्रवेश नहीं हुआ, यानी करीब तैंतीस प्रतिशत सीटें खाली रह गईं और यह कोई अपवाद वर्ष नहीं था; विश्लेषकों के अनुसार हर वर्ष स्वीकृत सीटों में से पैंतीस से चालीस प्रतिशत सीटें खाली छूट जाती हैं।
महामारी-पूर्व के वर्षों में तो यह आँकड़ा चवालीस प्रतिशत तक पहुँच गया था इस असंतुलन का परिणाम यह हुआ कि 2025-26 के सत्र में अट्ठावन इंजीनियरिंग और तकनीकी संस्थान बंद करने पड़े, जबकि कई प्रांतों में आज भी लाखों सीटें खाली पड़ी हैं।
एक ओर करोड़ों युवा प्रवेश और नौकरी के लिए धक्के खा रहे हैं, दूसरी ओर संस्थान सीटें न भरने के कारण ताले लगा रहे हैं — यह विरोधाभास ही व्यवस्था की सबसे बड़ी असफलता है।
👉 चौथा — परीक्षाओं और परिणामों में देरी।
छात्र की उम्र आगे बढ़ती रहती है, लेकिन उसका भविष्य किसी सरकारी फाइल की गति से चलता है।
👉 पाँचवाँ — उच्च शिक्षा में जातीय, क्षेत्रीय और आर्थिक भेदभाव।
जहाँ शिक्षा का मंदिर होना चाहिए, वहाँ कई बार वैमनस्य और असमानता का वातावरण दिखाई देता है।
और प्रभु, ये केवल उदाहरण हैं। ऐसे अनगिनत प्रसंग प्रतिदिन सामने आते हैं।
यमराज:
फिर छात्र क्या करते हैं? क्या वे अन्याय सह लेते हैं?
चित्रगुप्त:
नहीं प्रभु। वे पहले सड़कों पर उतरते हैं। धरना देते हैं। प्रदर्शन करते हैं। ज्ञापन सौंपते हैं। और जब वहाँ भी सुनवाई नहीं होती, तब न्यायपालिका का दरवाज़ा खटखटाते हैं।
यमराज:
फिर न्याय मिल जाता होगा?
चित्रगुप्त : (गंभीर होकर)
प्रभु... उन्हें न्याय से पहले "समय" मिलता है। फिर अगली तारीख। फिर अगली सुनवाई। फिर नया आश्वासन। और इसी बीच—
उनकी आयु निकल जाती है। प्रतियोगिताओं की पात्रता समाप्त हो जाती है। परिवार कर्ज़ में डूब जाता है। और आत्मविश्वास धीरे-धीरे टूटने लगता है।
यमलोक के अभिलेख बताते हैं कि ऐसे असंख्य विद्यार्थी हैं जिनकी जवानी अदालतों और सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते बीत गई। जिस उम्र में उन्हें अपने करियर की ऊँचाइयाँ छूनी चाहिए थीं, उस उम्र में वे फाइलों के पीछे भागते रहे।
यमराज:
अर्थात वे केवल एक लड़ाई नहीं लड़ते?
चित्रगुप्त:
नहीं प्रभु। वे एक साथ तीन मोर्चों पर युद्ध लड़ते हैं।
👉 पहला युद्ध — सरकार और व्यवस्था से।
नीतिगत विफलताओं, प्रशासनिक उदासीनता और निर्णयों में देरी के विरुद्ध।
👉 दूसरा युद्ध — आर्थिक।
कोचिंग की फीस। बार-बार आवेदन शुल्क। मुकदमों का भारी-भरकम खर्च। यात्रा का खर्च। और परिवार पर बढ़ता आर्थिक बोझ।
👉 तीसरा युद्ध — अपने ही मन से।
हताशा। निराशा। अवसाद। टूटता आत्मविश्वास। और वह भयावह क्षण जब भीतर से आवाज़ आती है — "अब और नहीं..."
यमराज :(कुछ देर मौन रहने के बाद)
चित्रगुप्त... मुझे एक बात समझाओ। जो राष्ट्र चाँद पर तिरंगा फहरा सकता है... जो मंगल तक अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा का लोहा मनवा सकता है... क्या वह अपने छात्रों को समय पर परीक्षा, पारदर्शी परिणाम और समयबद्ध न्याय भी नहीं दे सकता?
चित्रगुप्त:
प्रभु... यही प्रश्न आज जम्बूद्वीप का सबसे बड़ा प्रश्न है। कहा जा रहा है कि 2026 में यह राष्ट्र विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज़ पर खड़ा है। परंतु किसी राष्ट्र की वास्तविक महानता केवल उसके रॉकेटों से नहीं मापी जाती। वह इस बात से मापी जाती है कि उसके सबसे प्रतिभाशाली, सबसे परिश्रमी और सबसे आशावान नागरिक — उसके छात्र — अपने अधिकार पाने के लिए कितनी ठोकरें खाते हैं।
जिस देश के विद्यार्थी न्याय पाने के लिए अपनी एड़ियाँ घिसते रहें, वहाँ विकास के आँकड़े भले चमकते दिखें, लेकिन राष्ट्र की आत्मा अधूरी ही रहती है।
👉 यमराज का निर्णय
" याद रखो चित्रगुप्त —
राष्ट्र केवल अंतरिक्ष में पहुँचने से महान नहीं होता।
राष्ट्र तब महान होता है जब उसके छात्र बिना भय, बिना भेदभाव, बिना भ्रष्टाचार और बिना अंतहीन प्रतीक्षा के अपनी प्रतिभा के अनुरूप अवसर और न्याय प्राप्त करें।
छात्र केवल देश का भविष्य नहीं, उसका वर्तमान भी हैं।
उनके साथ न्याय — राष्ट्र के साथ न्याय है।
और जो राष्ट्र अपने छात्रों के साथ न्याय नहीं करता है।
उसकी सबसे बड़ी पराजय किसी युद्ध में नहीं, अपने ही भविष्य के विरुद्ध होती है।"
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