👉 नास्तिकता : क्या भगवान पर विश्वास भी व्यवस्था से तय होता है?
👉 नास्तिकता : क्या केवल विचारधारा है , या इसमें व्यवस्था का भी योगदान है ?
नास्तिकता एक ऐसा शब्द है जिस पर बहस के अनेक कारण हो सकते हैं। सामान्यतः इसे केवल ईश्वर में विश्वास या अविश्वास के प्रश्न तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। व्यक्ति की आस्था केवल दर्शन का विषय नहीं होती; वह उसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अनुभवों से भी निर्मित होती है।
इन्हीं कारणों में एक महत्वपूर्ण कारण है— राज्य द्वारा अपने नागरिकों को दी जाने वाली सुरक्षा, सुविधाएँ और सामाजिक व्यवस्था। इस विषय पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है, जबकि यह किसी व्यक्ति की धार्मिक प्रवृत्ति या नास्तिकता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में से एक हो सकता है।
जब किसी समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, न्याय और अवसर अपेक्षाकृत सुलभ होते हैं, तब व्यक्ति जीवन की अनेक अनिश्चितताओं से कम जूझता है। वहीं जहाँ व्यवस्था कमजोर हो, भविष्य असुरक्षित लगे और मूलभूत आवश्यकताओं के लिए भी संघर्ष करना पड़े, वहाँ लोगों की आस्था, धार्मिकता या आध्यात्मिकता अलग-अलग दिशाओं में विकसित हो सकती है। कुछ लोग ईश्वर में और अधिक विश्वास करने लगते हैं, जबकि कुछ व्यवस्था और परंपराओं दोनों से मोहभंग होने के कारण नास्तिक दृष्टिकोण अपना लेते हैं।
यह कहना उचित नहीं होगा कि समृद्ध देश नास्तिक और गरीब देश आस्तिक होते हैं। दुनिया में इसके अनेक अपवाद मिलते हैं। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि राज्य और समाज की संरचना व्यक्ति के विश्वासों को प्रभावित करने वाले कारकों में से एक है। मनुष्य का विश्वास केवल धार्मिक शिक्षा से नहीं, बल्कि उसके जीवनानुभवों से भी आकार लेता है।
इसलिए नास्तिकता को केवल धर्म-विरोध या ईश्वर-विरोध के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। कई बार यह व्यवस्था से उपजा प्रश्न होता है, कई बार वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिणाम, कई बार व्यक्तिगत अनुभवों का निष्कर्ष और कई बार सामाजिक परिस्थितियों की प्रतिक्रिया।
👉 यदि हमें नास्तिकता को समझना है, तो केवल धर्मग्रंथों या दार्शनिक तर्कों की ओर नहीं, बल्कि समाज, राज्य, शिक्षा, न्याय व्यवस्था और नागरिक जीवन की वास्तविक परिस्थितियों की ओर भी देखना होगा। क्योंकि व्यक्ति की आस्था और अनास्था— दोनों का निर्माण केवल मंदिरों, मस्जिदों या चर्चों में नहीं, बल्कि उसके दैनिक जीवन के अनुभवों में भी होता है।
👉 "जब व्यवस्था साथ छोड़ देती है, तब सबसे पहले इंसान किसका हाथ पकड़ता है?"
अक्सर उत्तर होता है— भगवान का।
👉 लेकिन क्या कभी हमने इसका उल्टा प्रश्न पूछा है?
यदि व्यवस्था कभी साथ छोड़े ही नहीं, तब क्या भगवान की आवश्यकता पहले जैसी रहेगी?
यह प्रश्न किसी की आस्था का अपमान नहीं है। यह समाज और शासन की भूमिका को समझने का प्रयास है।
👉 दुनिया में नास्तिकता पर जितनी चर्चा दर्शन और धर्म के संदर्भ में हुई है, उतनी शायद शासन, सामाजिक सुरक्षा और नागरिक जीवन के संदर्भ में नहीं हुई। जबकि संभव है कि व्यक्ति की धार्मिकता केवल उसकी आत्मा का नहीं, बल्कि उसकी परिस्थितियों का भी प्रतिबिंब हो।
जब सरकार वही करने लगे, जिसकी उम्मीद भगवान से की जाती थी।
कल्पना कीजिए एक ऐसे देश की—
जहाँ बीमार होने पर इलाज के लिए घर गिरवी न रखना पड़े।
जहाँ बच्चे की पढ़ाई माता-पिता की आय पर निर्भर न हो।
जहाँ नौकरी छूटने पर परिवार भूख के डर से न काँपे।
जहाँ बुढ़ापा दूसरों की दया पर नहीं, सामाजिक सुरक्षा पर टिके।
जहाँ न्याय वर्षों नहीं, समय पर मिले।
ऐसी स्थिति में मनुष्य की सबसे बड़ी चिंता— "कल क्या होगा?"— काफी हद तक समाप्त हो जाती है।
👉 यही कारण है कि स्कैंडिनेवियाई देशों— स्वीडन, डेनमार्क और नॉर्वे— में अनेक लोग स्वयं को गैर-धार्मिक बताते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे नैतिक नहीं हैं, बल्कि यह कि जीवन की अनिश्चितताओं से लड़ने के लिए उन्हें धार्मिक सहारे की उतनी आवश्यकता महसूस नहीं होती।
👉और जहाँ व्यवस्था कमजोर होती है। अब दूसरी तस्वीर देखिए।
एक बीमारी पूरी जमा-पूँजी समाप्त कर सकती है।
एक दुर्घटना पूरे परिवार को कर्ज़ में डुबो सकती है।
रोज़गार का कोई भरोसा नहीं।
न्याय वर्षों तक प्रतीक्षा करवाता है।
ऐसी स्थिति में इंसान केवल अस्पताल नहीं खोजता— वह आशा भी खोजता है।
वह मंदिर जाता है, मस्जिद जाता है, गुरुद्वारे जाता है, किसी संत, किसी बाबा, किसी पीर, किसी प्रार्थना की ओर जाता है।
👉 यह केवल धर्म नहीं है। यह असुरक्षा से जन्मी मनोवैज्ञानिक आवश्यकता भी हो सकती है।
👉 अमेरिकी समाजशास्त्री फिल ज़करमैन, जो Pitzer College में पढ़ाते हैं, खुद डेनमार्क और स्वीडन गए और वहाँ डेढ़ सौ से ज़्यादा लोगों से बात की। इस पर उन्होंने एक किताब लिखी — "Society Without God" (2008, दूसरा संस्करण 2020) — जिसका मतलब है "भगवान के बिना समाज"।
उनकी बातें बहुत सीधी हैं:
भगवान के बिना समाज बिगड़ता नहीं — डेनमार्क और स्वीडन में सबसे कम लोग भगवान को मानते हैं, फिर भी यहाँ अपराध कम है, स्वास्थ्य अच्छा है, बराबरी है, और लोकतंत्र मज़बूत है।
जब ज़िंदगी सुरक्षित हो, तो धर्म की ज़रूरत कम हो जाती है — भूख, बीमारी, बेरोज़गारी और बुढ़ापे से जब समाज सुरक्षा दे देता है, तो धर्म की व्यावहारिक ज़रूरत खत्म हो जाती है।
धर्म असल में तकलीफ और अनिश्चितता के वक्त ही सबसे ज़्यादा सहारा बनता है।
धर्म रस्म बन जाता है, आस्था नहीं — लोग अनेकों त्योहारों को मनाते रहते हैं, बिना भगवान में सच में विश्वास किए तब धर्म एक आदत बन जाता है, दिल का विश्वास नहीं।
अच्छे इंसान बनने के लिए भगवान ज़रूरी नहीं — यह डर गलत है कि "भगवान के बिना लोग बुरे हो जाएंगे।" स्कैंडिनेविया के लोग इसका जवाब हैं — वे कम धार्मिक हैं, पर उतने ही अच्छे इंसान हैं।
उनकी सबसे सीधी बात यही है: भगवान के बिना भी समाज न सिर्फ चल सकता है, बल्कि अच्छे से चल सकता है।
उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि इन देशों में लोगो के कम धार्मिक होने के बावजूद वहाँ अपराध कम हैं, सामाजिक विश्वास अधिक है और नागरिक जीवन अधिक संतुलित है।
इसी प्रकार पिप्पा नॉरिस और रोनाल्ड इंगलहार्ट ने Existential Security Theory प्रस्तुत करते हुए तर्क दिया कि जब समाज अपने नागरिकों को पर्याप्त सुरक्षा देता है, तब धार्मिक निर्भरता घटने की प्रवृत्ति देखी जा सकती है।
👉 ध्यान रहे— यह कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। यह एक सामाजिक प्रवृत्ति है, अंतिम सत्य नहीं।
अपवाद भी हैं...
यदि केवल समृद्धि से नास्तिकता आती, तो अमेरिका दुनिया का सबसे नास्तिक देश होता।
लेकिन ऐसा नहीं है।
यदि केवल गरीबी से धार्मिकता आती, तो हर गरीब समाज समान रूप से धार्मिक होता।
ऐसा भी नहीं है।
यानी संस्कृति, इतिहास, परिवार, परंपरा और व्यक्तिगत अनुभव— सभी मिलकर आस्था का निर्माण करते हैं।
भारत के संदर्भ में सबसे बड़ा प्रश्न
भारत में लाखों परिवार आज भी स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा की चुनौतियों से जूझ रहे हैं।
ऐसी परिस्थितियों में धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं रहता; वह मानसिक संबल भी बन जाता है।
इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है।
लेकिन प्रश्न यह भी है—
यदि नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, समय पर न्याय और सामाजिक सुरक्षा मिले, तो क्या उनके जीवन का भय कम होगा?
यदि उत्तर "हाँ" है, तो शासन और आस्था के संबंध पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए।
नास्तिकता किसी की श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं।
आस्तिकता किसी की कमज़ोरी का प्रमाण नहीं।
दोनों ही मनुष्य के अनुभवों, संस्कारों, परिस्थितियों और चिंतन से निर्मित होते हैं।
👉 किसी समाज की प्रगति का सही पैमाना केवल यह नहीं कि वहाँ कितने मंदिर, मस्जिद या चर्च हैं; बल्कि यह भी है कि वहाँ कितने नागरिक बिना भय, बिना असुरक्षा और बिना निराशा के जीवन जी पा रहे हैं।
क्योंकि जब राज्य अपने नागरिकों को न्याय, सुरक्षा और सम्मान देता है, तब आस्था अधिक स्वतंत्र होती है— और अनास्था भी।
और शायद तभी मनुष्य पहली बार सचमुच स्वतंत्र होकर यह तय कर पाता है कि उसे भगवान में विश्वास करना है या नहीं।
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