आईटी सेल का युग: जब सत्य से अधिक महत्वपूर्ण हो जाए नैरेटिव
कहा जाता है कि लोकतंत्र विचारों के संघर्ष से मजबूत होता है। भिन्न मत, बहस, आलोचना और तर्क किसी भी जीवंत समाज के आवश्यक तत्व हैं। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब विचारों का स्थान प्रचार ले लेता है, तर्क का स्थान कुतर्क और सत्य का स्थान "अपने पक्ष के सत्य"।
आज का युग सूचना का युग कहा जाता है, परंतु विडम्बना यह है कि सूचना जितनी बढ़ी है, भ्रम भी उतना ही बढ़ा है। सोशल मीडिया ने प्रत्येक व्यक्ति को अपनी बात कहने का मंच दिया, पर साथ ही झूठ, आधे-सच और सुनियोजित प्रचार को भी अभूतपूर्व शक्ति प्रदान कर दी।
राजनीतिक दलों की आईटी सेलें इसी परिघटना की उपज हैं। उनका घोषित उद्देश्य अपने विचारों का प्रचार करना होता है, पर व्यवहार में अक्सर उनका कार्य अपने पक्ष की हर बात को सही और विरोधी की हर बात को गलत सिद्ध करना बन जाता है। परिणामस्वरूप समाज धीरे-धीरे तथ्यों की जगह खेमों में बंटने लगता है।
इसी स्थिति की कल्पना करते हुए एक व्यंग्य मन में आता है—
यमराज के दरबार में आईटी सेल
👉 यमराज ने चित्रगुप्त से पूछा —
"हे चित्रगुप्त! यह जम्बूद्वीप में 'आईटी सेल' क्या प्राणी है? प्रतिदिन हजारों लोगों के कर्मों का लेखा-जोखा देखता हूँ, पर इनके कर्म समझ में नहीं आते।"
👉 चित्रगुप्त बोले—
"प्रभु, ये आधुनिक युग के योद्धा हैं। पहले युद्ध तलवारों से लड़े जाते थे, अब फ़ॉरवर्ड, ट्वीट, पोस्ट और कमेंट से लड़े जाते हैं।"
👉 यमराज ने पूछा—
"इनकी विशेषता क्या है?"
👉 चित्रगुप्त बोले—
"प्रभु, एक वर्ग ऐसा है जो सूरज को भी विपक्षी घोषित कर सकता है यदि वह उनकी दिशा में न उगे। दूसरा वर्ग ऐसा है जो चंद्रमा में भी सरकार की साजिश खोज लेता है। इन दोनों की तुलना बड़ी आसानी से हो जाती है—एक हर बात पर देशविरोधी सिद्ध करता है, और दूसरा अपने से ज्यादा ज्ञानी किसी को नहीं मानता। और इसी कुचक्र में जम्बूद्वीप फँसा हुआ है।"
"इनके कारण सबसे बड़ी हानि यह है कि सामान्य जन सत्य और असत्य का भेद करने में असमर्थ हो जाते हैं। तथ्य पीछे छूट जाते हैं और शोर आगे निकल जाता है। लाभ केवल इतना है कि सत्ता, व्यवस्था और तमाशबीन लोग इन्हें आपस में लड़ते देखकर मनोरंजन करते रहते हैं।"
"दोनों का साझा गुण यह है कि तथ्य इनके लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना चुनाव के बाद घोषणापत्र।"
👉 यमराज आश्चर्यचकित हुए—
"तो सत्य का निर्धारण कैसे होता है?"
👉 चित्रगुप्त हँस पड़े—
"प्रभु, इनके लिए सत्य वही होता है जो इनके व्हाट्सऐप विश्वविद्यालय और एक्स (ट्विटर) गुरुकुल से प्रमाणित होकर आए।"
👉 यमराज ने पूछा—
"और जनता?"
👉 चित्रगुप्त बोले—
"जनता प्रतिदिन यह तय करने में लगी रहती है कि कौन सा झूठ कम खतरनाक है।"
👉 यमराज क्रोधित हो उठे—
"ऐसे लोगों को तुरंत नरक भेजो!"
👉 चित्रगुप्त ने हाथ जोड़ लिए—
"प्रभु, ऐसा अनर्थ मत कीजिए। यदि ये नरक पहुँच गए तो पहले दिन 'नरक बचाओ अभियान' चलाएँगे, दूसरे दिन 'यमराज इस्तीफा दो' ट्रेंड कराएँगे, तीसरे दिन नरक को स्वर्ग और स्वर्ग को नरक सिद्ध करने के लिए पाँच-पाँच घंटे की बहस कराएँगे। और चौथे दिन अपने-अपने समर्थकों को समझाएँगे कि असली नरक तो विरोधी खेमे में है।"
👉 यमराज ने माथा पकड़ लिया—
"तो फिर इनका क्या किया जाए?"
👉चित्रगुप्त बोले—
"प्रभु, ये निर्लज्ज होते हैं। इन्हें अपमान, तिरस्कार या दंड से कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि आपने दंड हेतु इन्हें नरक बुला लिया, तो ये यहाँ की संस्कृति को भी बिगाड़ देंगे।
इन्हें उसी जम्बूद्वीप में रहने दीजिए, वहाँ की जनता इनकी आदी हो चुकी है। प्रभु, इन्हें वहीं रहने दीजिए। ये एक-दूसरे को हराने में इतने व्यस्त हैं कि कभी-कभी अनजाने में जनता का मनोरंजन भी कर देते हैं।"
👉 यमराज ने गंभीर होकर कहा—
"कलियुग का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि लोग सत्य जानना नहीं चाहते, केवल अपने पक्ष का झूठ जीतते देखना चाहते हैं।"
👉 व्यंग्य हँसाने के लिए नहीं, सोचने के लिए भी होता है। समस्या केवल किसी एक दल, संगठन या विचारधारा की नहीं है। समस्या उस मानसिकता की है जिसमें व्यक्ति पहले पक्ष चुनता है और बाद में तथ्य खोजता है।
आज सोशल मीडिया पर अनेक लोग समाचार नहीं पढ़ते, केवल अपने विचारों की पुष्टि करने वाली सामग्री पढ़ते हैं। उन्हें सत्य से अधिक यह प्रिय होता है कि उनका पक्ष विजयी दिखाई दे।
ऐसे वातावरण में संवाद समाप्त होने लगता है और केवल शोर शेष रह जाता है। लोकतंत्र की शक्ति विरोधी विचार को सुनने में है, उसे गाली देने में नहीं। यदि हर असहमति देशद्रोह और हर उपलब्धि षड्यंत्र बन जाए, तो समाज धीरे-धीरे विवेक खो देता है।
इतिहास बताता है कि किसी भी सभ्यता का पतन बाहरी आक्रमण से पहले वैचारिक पतन से शुरू होता है। जब लोग प्रश्न पूछना छोड़ देते हैं, जब निष्ठा सत्य से बड़ी हो जाती है और जब प्रचार विवेक पर हावी हो जाता है, तब समाज अपनी दिशा खो देता है।
इसलिए आवश्यकता किसी नई आईटी सेल की नहीं, बल्कि ऐसे नागरिकों की है जो किसी भी सूचना को आँख मूँदकर स्वीकार न करें; जो अपने पक्ष से भी प्रश्न पूछ सकें और विरोधी पक्ष की सही बात को भी स्वीकार कर सकें।
क्योंकि अंततः लोकतंत्र का भविष्य आईटी सेल नहीं, जागरूक नागरिक तय करते हैं।
"सत्य का सबसे बड़ा शत्रु झूठ नहीं, बल्कि वह अंधभक्ति है जो झूठ को सत्य मान लेने पर अड़ी रहती है।"
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