सड़क पर आए नारे: सिर्फ गुस्सा नहीं, टूटते भरोसे की चेतावनी।

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सड़क पर आए नारे: सिर्फ गुस्सा नहीं, एक चेतावनी है। दिल्ली में हाल ही में नारे लगे: "एक कचौड़ी दो समोसा, मर्द जात का क्या भरोसा", "मेरे सिर में दर्द है, उसका कारण मर्द है।" कुछ लोग कहेंगे कि यह गुस्से में निकले शब्द हैं, इन पर इतना क्यों सोचना? पर यह समझना अब नादानी होगी। जो बात कल तक मज़ाक, ताने और रील में थी, वह आज सड़क पर नारा बन गई है। जब कोई बात हँसी-मज़ाक से निकलकर सड़क पर आ जाए, तो समझिए वह लोगों के मन में बैठ चुकी है। यह चिंता सिर्फ मेरी नहीं है। समाजशास्त्री, कानूनविद् और मनोवैज्ञानिक, तीनों अपने-अपने तरीके से इस बदलाव को समझाते हैं। आइये सबसे पहले देखते है कि सामाजिक विचारक इस पर क्या कहते हैं। फ्रांस के समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम ने डेढ़ सौ साल पहले चेताया था कि जब समाज में साझा नियम और आपसी बंधन कमज़ोर पड़ते हैं, तो लोग दिशाहीन और अकेले हो जाते हैं।   उन्होंने इस हालत को "एनोमी" यानी मूल्यहीनता की स्थिति कहा। अमेरिकी विद्वान रॉबर्ट पुटनम ने अपनी किताब Bowling Alone में दिखाया कि जहाँ आपसी मेल-जोल और भरोसा घटता है, वहाँ समाज की ताकत घट...

परिवार का विखंडन



परिवार के विखंडन में
टेलीविजन, स्त्री और बाजार ( ( उपभोक्तावाद ) की भूमिका पर यह ब्लॉग किसी की निंदा और आलोचना नही कर रहा है अपितु जो विद्वानो , समाजशास्त्रीयों ने कहा है उसको बस साझा कर रहा है



👉 "जो सदियों में न टूटा, वह दशकों में बिखर गया यह इतिहास की विडम्बना नहीं, एक सोची-समझी रणनीति का परिणाम है।"



भारत को समझने के लिए पहले भारतीय परिवार को समझना होगा। यह केवल रक्त-सम्बन्धों की इकाई नहीं, यह एक जीवन-दर्शन है — एक ऐसा दर्शन जिसमें व्यक्ति का अस्तित्व समाज से पृथक नहीं, बल्कि उसमें गुँथा हुआ है। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का उद्घोष करने वाली इस सभ्यता ने परिवार को केवल सामाजिक संरचना नहीं, बल्कि आत्मिक साधना का केन्द्र माना।



वैदिक काल में गृहस्थाश्रम को चारों आश्रमों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना गया। मनुस्मृति से लेकर अर्थशास्त्र तक, कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तलम् से लेकर तुलसीदास के रामचरितमानस तक भारतीय साहित्य और दर्शन का केन्द्रबिन्दु सदैव परिवार रहा है। राम का वनवास हो या पाण्डवों का अज्ञातवास परिवार की टूटन ही महाकाव्यों की त्रासदी का मूल है।



इस परिवार-संस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह बाह्य आघातों से अविचलित रही। यूनानी आए, शक आए, हूण आए, मुगल आए, अंग्रेज आए — हर आक्रमण ने राजनीतिक सत्ता को हिलाया, कुछ ने धर्म को भी प्रभावित किया, परन्तु भारतीय पारिवारिक ढाँचे की जड़ें इतनी गहरी थीं कि वे अडिग रहीं।


"अंग्रेजों ने भारत पर दो सौ वर्ष राज किया, उन्होंने हमारी भाषा, वेशभूषा, शिक्षा-पद्धति सब बदली परन्तु भारतीय परिवार की मूल आत्मा को वे छू न सके।"


इस अविनाशिता का रहस्य क्या था? यह रहस्य था — परस्पर निर्भरता की वह संस्कृति जिसमें व्यक्ति का सुख परिवार के सुख में समाया हुआ था।


बुजुर्ग अनुभव देते थे, युवा शक्ति देते थे, स्त्रियाँ संस्कार देती थीं, बच्चे भविष्य देते थे। यह एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र था जिसमें सबकी भूमिका थी, सबका सम्मान था।




1959 में भारत में दूरदर्शन का प्रसारण आरम्भ हुआ, परन्तु यह केवल दिल्ली तक सीमित था। असली क्रान्ति आई 1982 में जब एशियाई खेलों के प्रसारण के बहाने रंगीन टेलीविजन का प्रसार हुआ। इन्दिरा गाँधी सरकार ने इसे 'विकास का माध्यम' बताया। परन्तु जो हुआ, वह विकास से कहीं अधिक एक मूल्यांतरण था।


1984 में भारत में केवल 28 लाख टेलीविजन सेट थे। 1990 तक यह संख्या 4 करोड़ को पार कर गई। 2000 तक 7 करोड़। और आज? लगभग 21 करोड़ से अधिक घरों में टेलीविजन है — अर्थात् भारत के लगभग 70% घर इस 'काले डिब्बे' की गिरफ्त में हैं। इस प्रसार की गति इतनी तीव्र थी कि समाज के पास सोचने का अवसर ही न था।



👉 माध्यम कभी तटस्थ नहीं होता मार्शल मैक्लुहान ने 1964 में अपनी कालजयी पुस्तक 'Understanding Media' में कहा था — 'The medium is the message' — अर्थात् माध्यम स्वयं ही सन्देश है। टेलीविजन केवल सूचना नहीं देता, वह एक विशेष प्रकार की चेतना का निर्माण करता है


निष्क्रिय,


एकाकी,


उपभोक्तावादी।


👉 फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारक थियोडोर अडोर्नो और मैक्स होर्खाइमर ने इसे 'संस्कृति उद्योग' कहा था। उनका तर्क था कि जनसंचार माध्यम मनोरंजन के आवरण में जनता को उपभोक्ता में परिवर्तित करते हैं और उनकी आलोचनात्मक चेतना को कुन्द करते हैं। भारत में यह प्रक्रिया अत्यन्त तीव्र गति से हुई।



"टेलीविजन ने भारतीय घर में प्रवेश किया एक अतिथि की तरह, परन्तु धीरे-धीरे वह गृहस्वामी बन बैठा।"




किसी भी सभ्यता को नष्ट करना हो तो उसके परिवार को तोड़ना होगा। और परिवार को तोड़ना हो तो स्त्री को उसके मूल स्थान से विचलित करना होगा — क्योंकि स्त्री ही परिवार की धुरी है, संस्कारों की वाहिका है, पीढ़ियों को जोड़ने वाली कड़ी है। यह कोई षड्यन्त्र-सिद्धान्त नहीं, यह सामाजिक अभियांत्रिकी का एक सुस्थापित सिद्धान्त है जिसे विज्ञापन और मनोरंजन उद्योग भली-भाँति जानते हैं।


1987 में आई 'रामायण' और 1988-89 में 'महाभारत' के बाद भारतीय दर्शक को टेलीविजन की आदत पड़ चुकी थी। परन्तु 1990 के दशक में उदारीकरण के साथ जो सीरियल संस्कृति आई, वह इन पौराणिक धारावाहिकों से सर्वथा भिन्न थी। 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी', 'कहानी घर घर की', 'बालिका वधू', 'ससुराल सिमर का' — इन धारावाहिकों ने एक विशेष कथ्य को बार-बार दोहराया।



इन सीरियलों में प्रायः तीन पात्र होते हैं — एक कुटिल सास जो बहू को प्रताड़ित करती है, एक कायर पति जो पत्नी की रक्षा नहीं कर सकता, और एक 'आधुनिक' नायिका जो इस सब से 'मुक्ति' चाहती है। परिवार को षड्यन्त्र के रूप में, सास-ससुर को शत्रु के रूप में, और एकल जीवन को स्वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया गया।



👉 मीडिया शोधकर्ता पार्थ चटर्जी और उर्वशी बुटालिया जैसे विद्वानों ने नोट किया कि 1990-2010 के दशक के भारतीय धारावाहिकों में स्त्री की पहचान को दो ध्रुवों में विभाजित कर दिया गया या तो 'बेचारी पीड़िता' या 'विद्रोही मुक्त नारी'।


संयुक्त परिवार में प्रेम, सेवा और सहकार के जो सुन्दर आयाम थे, उन्हें या तो अदृश्य कर दिया गया या उपहास का विषय बना दिया गया।



"जो नारी युगों से परिवार की शक्ति थी, उसे यह विश्वास दिलाया गया कि परिवार ही उसकी कमजोरी है।"




धारावाहिकों से भी अधिक प्रभावशाली थे विज्ञापन क्योंकि वे संक्षिप्त थे, बार-बार दोहराए जाते थे, और अवचेतन पर सीधा प्रहार करते थे। मनोवैज्ञानिक इसे 'mere exposure effect' कहते हैं जो बात जितनी बार सुनी जाए, वह उतनी ही सत्य लगने लगती है।


विज्ञापनों ने स्त्री की 'स्वतन्त्रता' को एक विशेष अर्थ दिया वह स्वतन्त्रता जो उत्पाद खरीदने में है, नौकरी करने में है, 'एकल' रहने में है। 'मेरी मर्जी', 'आई एम नॉट अ टोकन', 'व्हाट वुमन वान्ट' जैसे नारों ने उपभोक्तावाद को नारीवाद का मुखौटा पहना दिया। जो स्त्री अधिक उत्पाद खरीदती थी, वह अधिक 'आधुनिक' मानी जाती थी।




👉 नाओमी वोल्फ ने अपनी पुस्तक 'The Beauty Myth' में और नाओमी क्लेन ने 'No Logo' में इस प्रक्रिया को विस्तार से विश्लेषित किया है — कैसे बहुराष्ट्रीय निगम नारीवाद की भाषा को अपने उत्पाद बेचने के लिए उपयोग करते हैं। भारत में यह प्रक्रिया और भी तीव्र थी क्योंकि यहाँ उपभोक्तावाद एकदम नया था, इसका प्रतिरोध कमजोर था।



1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय बाजार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए खुल गया। इन कम्पनियों के लिए सबसे बड़ा अवरोध था संयुक्त परिवार की 'मितव्ययी संस्कृति'। जहाँ एक परिवार मिलकर एक वस्तु का उपयोग करे, वहाँ बिक्री कम होगी।


परन्तु यदि परिवार टूटे, एकल इकाइयाँ बनें तो हर व्यक्ति को अलग टीवी, अलग फ्रिज, अलग वाशिंग मशीन चाहिए। बाजार का विस्तार सीधे पारिवारिक विघटन से जुड़ा था।


"जब बाजार को पता चला कि टूटे हुए परिवार अधिक खरीदते हैं, तब से बाजार ने परिवार तोड़ने का काम शुरू कर दिया।"



इस पारिवारिक विखंडन को केवल भारतीय आँखों से नहीं, विश्व के तीन महान चिन्तकों की दृष्टि से भी देखना आवश्यक है क्योंकि उन्होंने इन प्रवृत्तियों को पश्चिम में बहुत पहले पहचान लिया था और उनकी चेतावनी हम तक पहुँची ही नहीं।


👉 एरिक फ्रॉम ने कहा प्रेम एक कला है, बाजार उसे वस्तु बनाता है जर्मन-अमेरिकी मनोविश्लेषक एरिक फ्रॉम ने 1956 में अपनी कालजयी पुस्तक 'The Art of Loving' में एक ऐसी बात कही जो आज भारत पर अक्षरशः लागू होती है।


फ्रॉम ने कहा कि आधुनिक पूँजीवादी समाज में प्रेम को भी एक 'बाजारी विनिमय' में बदल दिया जाता है जहाँ व्यक्ति यह पूछता है कि 'मुझे इस सम्बन्ध से क्या मिलेगा?' न कि 'मैं क्या दे सकता हूँ?'


"आधुनिक मनुष्य ने प्रेम करना नहीं सीखा उसने केवल 'प्रेम में पड़ना' सीखा है। जो पड़ता है, वह उठता भी है।



परिवार प्रेम की कला माँगता है, बाजार उस कला को नष्ट करता है।"



👉 एरिक फ्रॉम, 'The Art of Loving', 1956 की दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक 'Escape from Freedom' (1941) में उन्होंने यह विश्लेषण किया कि आधुनिक मनुष्य स्वतन्त्रता का बोझ नहीं उठा पाता और इसीलिए वह या तो अधिनायकवाद की शरण लेता है या उपभोक्तावाद में डूब जाता है।



भारत में यह 'escape' टेलीविजन और उसके बाद स्मार्टफोन के रूप में आया एकाकीपन से भाग रहे लोगों ने परिवार छोड़ा और स्क्रीन को अपना परिवार बना लिया।



👉 फ्रॉम ने यह भी कहा था कि 'having' और 'being' में मूलभूत अन्तर है — 'होना' और 'रखना' दो अलग जीवन-दर्शन हैं। भारतीय परिवार-संस्था 'being' पर आधारित थी अर्थात् सम्बन्धों में होना, परिवार में होना।


टेलीविजन और बाजार ने उसे 'having' में बदल दिया अधिक से अधिक रखने की होड़।



👉 पोलिश समाजशास्त्री ज़िगमुण्ट बॉमन ने 2000 में 'Liquid Modernity' की अवधारणा दी — एक ऐसा समाज जहाँ हर चीज 'तरल' हो गई है, कुछ भी स्थायी नहीं। परिवार, विवाह, मित्रता, नौकरी, पहचान सब कुछ अस्थायी, बदलने योग्य, 'अपग्रेडेबल'।


"हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ सम्बन्ध उपभोग की वस्तु बन गए हैं।


जब तक उपयोगी हों, रखो; जब नया मॉडल आए, बदल दो।


यही 'Liquid Love' है — जो बहती है, ठहरती नहीं।"



👉 ज़िगमुण्ट बॉमन ने अपनी पुस्तक 'Liquid Love' में विवाह-संस्था के क्षरण का विश्लेषण करते हुए कहा कि आधुनिक सम्बन्ध 'pocket relationships' बन गए हैं जिन्हें जेब में रखो, जब चाहो निकालो, जब चाहो वापस रख दो या फेंक दो। डेटिंग ऐप्स इसी 'liquid love' का तकनीकी प्रकटीकरण हैं।


बॉमन के इस सिद्धान्त को भारतीय संदर्भ में देखें 'तुम्हें जो अच्छा लगे वो करो', 'रिश्ते निभाने की जिम्मेदारी नहीं', 'toxic relationship छोड़ो' ये सब 'liquid modernity' के नारे हैं।


जो टेलीविजन और सोशल मीडिया ने भारत के घर-घर में पहुँचाए परिवार की 'ठोस' नींव को 'तरल' बना दिया गया। और जो तरल है वह आकार नहीं रख सकता।


👉 नील पोस्टमैन ने मनोरंजन में मरती हुई सभ्यता का जिक्र किया अमेरिकी मीडिया-आलोचक नील पोस्टमैन ने 1985 में 'Amusing Ourselves to Death' लिखी — एक ऐसी पुस्तक जो आज भारत पर भविष्यवाणी की तरह सटीक बैठती है।


पोस्टमैन का केन्द्रीय तर्क था कि टेलीविजन हर गम्भीर विमर्श को मनोरंजन में बदल देता है राजनीति, धर्म, शिक्षा, परिवार सब कुछ एक 'शो' बन जाता है।


"टेलीविजन ने हमें यह नहीं सिखाया कि क्या सोचना है।



1- उसने हमें यह सिखाया कि सोचना ही नहीं है।


2- मनोरंजन सर्वोच्च मूल्य बन गया और इस प्रक्रिया में हम एक ऐसी सभ्यता बन गए जो हँसते-हँसते मर रही है।"



👉 नील पोस्टमैन, 'Amusing Ourselves to Death', 1985 अपनी रचना में कहा कि टेलीविजन 'now this' की संस्कृति बनाता है हर बात क्षणिक है, कोई सन्दर्भ नहीं, कोई गहराई नहीं, कोई निरन्तरता नहीं।


ठीक यही भारतीय परिवार के साथ हुआ। पीढ़ियों की स्मृति, पूर्वजों की कहानियाँ, परम्पराओं की जड़ें सब 'now this' के युग में अप्रासंगिक हो गईं।


पोस्टमैन ने यह भी कहा कि टेलीविजन बच्चे और वयस्क के बीच की सीमा मिटा देता है। परम्परागत समाज में बच्चे को धीरे-धीरे 'adult world' में प्रवेश मिलता था।


पहले परिवार के माध्यम से, फिर समाज के माध्यम से टेलीविजन ने यह क्रमिकता नष्ट कर दी भारत में इसका परिणाम यह हुआ कि बच्चे 'परिपक्व' तो जल्दी हो गए, परन्तु 'संस्कारित' नहीं हो सके।


"जब परिवार की पाठशाला बन्द हो जाती है,

तो टेलीविजन और बाजार की पाठशाला खुल जाती है

और उस पाठशाला में केवल एक पाठ पढ़ाया जाता है : उपभोग।"





यह सब केवल वैचारिक विश्लेषण नहीं है आँकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं और वे चीखते हैं :



👉 1961 में संयुक्त परिवारों का प्रतिशत : 31.1% (जनगणना 1961)



👉 2011 में संयुक्त परिवारों का प्रतिशत : 19.8% (जनगणना 2011)


👉 औसत परिवार का आकार 1961 में : 5.6 सदस्य



👉 औसत परिवार का आकार 2011 में : 4.4 सदस्य



👉एकल-व्यक्ति परिवारों में वृद्धि 1991-2011 : लगभग 65% की वृद्धि



👉 वृद्धाश्रमों की संख्या 2000 से 2020 तक : 1,000 से बढ़कर 1,800+ (Ministry of Social Justice)


👉 बच्चों में अवसाद (NIMHANS 2023) : 6-13 वर्ष के 7.3% बच्चे मानसिक विकार से ग्रस्त



👉तलाक के ये आंकड़े टूटते परिवारों का दर्पण है



भारत में तलाक की दर अभी भी वैश्विक औसत से कम है, परन्तु जो गति से यह बढ़ रही है वह चिन्ताजनक है :



👉1990 में तलाक के मामले (राष्ट्रीय) : लगभग 1 लाख प्रतिवर्ष


👉2022 में तलाक के मामले : लगभग 13.6 लाख (Family Courts रिपोर्ट)


👉मुम्बई में तलाक वृद्धि (2010-2022) : लगभग 100% की वृद्धि


👉दिल्ली में औसत विवाह अवधि (तलाक से पूर्व) : 3-5 वर्ष (Family Court Delhi 2022)


👉तलाक माँगने वालों में महिलाओं का प्रतिशत : 67% (Law Commission Report)


कारण — 'क्रूरता' और 'परित्याग' : 80% से अधिक मामलों में यही कारण है


'विवाह न करने' का निर्णय लेने वाले युवा (18-30) : शहरी युवाओं में 23% (CSDS Survey 2022) आंकड़े है।


👉 इन आँकड़ों को देखते हुए एरिक फ्रॉम की बात याद आती है जब प्रेम एक कला नहीं रहती, जब विवाह एक 'commitment' नहीं बल्कि एक 'contract' बन जाता है तब तलाक अपरिहार्य हो जाता है। और यह 'contract-culture' टेलीविजन के धारावाहिकों ने ही भारतीय मन में बोई।


👉आत्महत्या और एकाकीपन मौन महामारी बन गई है  ए  विचलित करने वाले आँकड़े हैं जो जीवन और मृत्यु के बीच की पतली रेखा पर खड़े हैं :



👉 भारत में वार्षिक आत्महत्याएँ (NCRB 2022) : 1,70,924 — प्रतिदिन 468 मौतें


👉 15-29 आयु वर्ग में आत्महत्या : मृत्यु का सबसे बड़ा कारण (WHO India Report)


👉 'पारिवारिक समस्याएँ' — कारण : 33.2% आत्महत्याओं का कारण (NCRB 2022)


👉अकेले रहने वाले युवाओं में आत्महत्या दर : संयुक्त परिवार की तुलना में 2.7 गुना अधिक


👉अवसाद के रोगी जो परिवार से कटे हैं : 72% (NIMHANS Study 2021)


👉 भारत में अकेलेपन की व्यापकता : 26% वयस्क 'अत्यधिक एकाकी' महसूस करते हैं (Cigna Survey 2023)


👉महानगरों में युवाओं की mental health helpline calls : 2019-2023 में 400% की वृद्धि (iCall TISS)


ये संख्याएँ केवल सांख्यिकी नहीं हैं — ये 1,70,924 जीवन हैं जो प्रतिवर्ष समाप्त हो जाते हैं। और इनमें से एक तिहाई का सम्बन्ध सीधे पारिवारिक विखंडन से है।


👉 जब ज़िगमुण्ट बॉमन ने 'Liquid Love' में कहा था कि तरल सम्बन्ध मनुष्य को असुरक्षित और निराधार बना देते हैं तो यही उस असुरक्षा का परिणाम है।


👉"एक पीढ़ी जो परिवार में पली होती, वह टूटती नहीं है परिवार उसका सहारा होता है।


👉एक पीढ़ी जो स्क्रीन में पली है, वह 'likes' के लिए जीती है और 'dislikes' से मर जाती है।"


" नील पोस्टमैन " ने कहा था कि जिस समाज में गम्भीर विमर्श मनोरंजन में बदल जाए, वहाँ के नागरिक अपने दर्द को भी 'रील' बनाने लगते हैं। भारत में यह हो रहा है युवा अपनी पीड़ा Instagram पर डालते हैं, 'mental health awareness' की रील बनाते हैं परन्तु असली सहारे के लिए जब देखते हैं, तो घर में कोई नहीं होता।


ये आँकड़े केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं दर्शाते ये एक सभ्यतागत संकट की झलक हैं। जो परिवार सदियों की आँधी में अडिग रहा, वह कुछ दशकों के टेलीविजन और उपभोक्तावाद की आँधी में डगमगा गया।



👉  परिवार के टूटने की कीमत



कोई पूछ सकता है परिवार टूटे तो क्या हुआ? व्यक्ति स्वतन्त्र हुआ, स्त्रियाँ आगे बढ़ीं, समाज आधुनिक हुआ। परन्तु यह प्रश्न उतना सरल नहीं है जितना प्रतीत होता है।


👉 मानसिक स्वास्थ्य का संकट


विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में 2023 तक अवसाद के रोगियों की संख्या 5.6 करोड़ से अधिक हो गई है। NIMHANS के शोध बताते हैं कि एकाकी जीवन जीने वाले व्यक्तियों में अवसाद की दर संयुक्त परिवारों में रहने वालों की तुलना में 2.3 गुना अधिक है। 'सोशल मीडिया' पर हजारों 'फ्रेंड्स' रखने वाली पीढ़ी मानसिक एकाकीपन की सबसे बड़ी शिकार है।


👉 वृद्धों का दंश


भारत में वृद्धाश्रमों की संख्या में विस्फोटक वृद्धि हुई है। हेल्पेज इण्डिया की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 65% वृद्ध किसी न किसी रूप में परिवार की उपेक्षा का शिकार हैं। वे माता-पिता जिन्होंने अपना सर्वस्व बच्चों को दिया, वे अपने जीवन की सन्ध्या में अकेले हैं यह भारत की सबसे बड़ी नैतिक त्रासदी है।


👉 बच्चों का अनाथपन


'लैच-की चिल्ड्रन' यह अंग्रेजी पद उन बच्चों के लिए है जो स्कूल के बाद घर खाली पाते हैं क्योंकि माता-पिता दोनों काम पर हैं। अमेरिका में यह समस्या दशकों पहले आई, भारत में अब आ रही है।


जिन बच्चों को दादा-दादी की कहानियाँ, माँ की लोरियाँ और संयुक्त परिवार के संस्कार मिलने चाहिए थे, उन्हें मिल रही है " एक स्क्रीन "।


"जिस परिवार ने हजारों वर्षों तक भारत को बचाया,

आज वह परिवार स्वयं बचाने की प्रतीक्षा में है।"



👉 स्वतन्त्रता का भ्रम


'माय बॉडी माय चॉइस', 'फ्री बर्ड', 'इण्डिपेण्डेण्ट वुमन' ये नारे सुनने में कितने मनोहर लगते हैं! परन्तु जरा रुककर पूछें यह 'स्वतन्त्रता' किसने परिभाषित की? किसके हित में है यह स्वतन्त्रता?


जब एक युवती संयुक्त परिवार छोड़कर 'स्वतन्त्र' जीवन जीने के लिए महानगर जाती है तो वह किसके पास जाती है? किराये के मकान में, जिसका किराया कोई निगम लेता है।

'इण्डिपेण्डेण्ट' जीवन जीने के लिए वह अधिक उत्पाद खरीदती है जो कोई बहुराष्ट्रीय कम्पनी बेचती है। वह 'डेटिंग ऐप' उपयोग करती है, जो किसी टेक कम्पनी का है, वह 'ऑनलाइन फूड ऑर्डर' करती है जो किसी एग्रीगेटर का है।


अर्थात् वह परिवार की 'परतन्त्रता' से तो 'मुक्त' हुई, परन्तु बाजार की परतन्त्रता में आ गई। परिवार बिना शर्त प्रेम करता था, बाजार हर क्षण शर्तों पर प्रेम करता है। परिवार में झगड़े थे परन्तु एक अन्तर्निहित सुरक्षा भी थी बाजार में सुरक्षा है ही नहीं।


नारीवाद के मूल में जो सुन्दर विचार था स्त्री की गरिमा, उसका सम्मान, उसकी शिक्षा, उसके अवसर उसे बाजार ने हाइजैक कर लिया और उसे 'उपभोग की स्वतन्त्रता' में बदल दिया। असली नारीवाद स्त्री को परिवार में भी सम्मान दिलाना चाहता था, टीवी और बाजार ने उसे परिवार से ही अलग कर दिया।



👉डिजिटल दौर कही टूटन की अगली कड़ी तो नही बन गई है।



टेलीविजन ने जो काम शुरू किया, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने उसे पूर्ण कर दिया। यदि टेलीविजन ने परिवार को एक कमरे में अलग-अलग बैठा दिया, तो स्मार्टफोन ने एक ही टेबल पर बैठे लोगों को अलग-अलग दुनिया में भेज दिया।


'फिअर ऑफ मिसिंग आउट' (FOMO) यह मनोवैज्ञानिक अवस्था डिजिटल युग की देन है। इसमें व्यक्ति अपने वास्तविक परिवार और सम्बन्धों से अधिक 'वर्चुअल' जीवन को महत्त्व देने लगता है। जब माँ खाना बनाती है तो बच्चे 'रील्स' देख रहे होते हैं। जब पिता बात करना चाहते हैं तो युवा 'ऑनलाइन' हैं।


▸ भारत में औसत स्क्रीन टाइम (2023) : 6.5 घण्टे प्रतिदिन (DataReportal 2023)

▸ 10-17 वर्ष के बच्चों का स्क्रीन टाइम : 8+ घण्टे प्रतिदिन

▸ परिवार के साथ बिताया समय (शहरी) : 1.5-2 घण्टे प्रतिदिन (औसत)


अर्थात् भारत का युवा अपने परिवार से तीन-चार गुना अधिक समय स्क्रीन के साथ बिता रहा है। जो संस्कार, जो मूल्य, जो इतिहास-बोध परिवार देता था वह अब नहीं मिल रहा। जो मिल रहा है वह है उपभोक्तावाद,

एकाकीपन, और एक कृत्रिम 'स्वतन्त्रता' का भ्रम


👉  हमने क्या खोया क्या पाया इस पर सोचना होगा 



यह ब्लॉग परिवर्तन का विरोध नहीं कर रहा है स्त्री शिक्षा, स्त्री स्वातन्त्र्य, जाति-उत्पीड़न का अन्त ये सब आवश्यक और स्वागतयोग्य परिवर्तन हैं। परन्तु प्रश्न यह है कि क्या हमने परिवर्तन की आड़ में कुछ ऐसा भी खो दिया जो अमूल्य था?


हमने पाया व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, उपभोग के अवसर, महानगरीय जीवनशैली। परन्तु हमने खोया वह बुजुर्ग जो ज्ञान का भण्डार थे और अब वृद्धाश्रम में हैं।

वह माँ जो घर की धुरी थी और अब 'बोझ' बन गई है। वह संयुक्त परिवार जिसमें अवसाद के लिए कोई स्थान न था क्योंकि कोई न कोई साथ था।


जो दवाइयाँ आज अरबों की कमाई करती हैं नींद की, अवसाद की, चिन्ता की, क्या वे दवाइयाँ संयुक्त परिवार में इतनी बिकतीं? क्या दादी की लोरी, बुजुर्गों का आशीर्वाद, भाई-बहन का साथ क्या ये 'एण्टी-डिप्रेसेण्ट' नहीं थे?


"परिवार एक बीमा था बिना प्रीमियम का जब से परिवार टूटा, तब से अस्पताल, मनोचिकित्सक और

वृद्धाश्रम समृद्ध होने लगे।"



निष्कर्ष : क्या अभी भी देर नहीं हुई?



भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी पुनरुत्थान-क्षमता रही है। जो सभ्यता हजारों वर्षों के आघातों के बाद भी खड़ी रही, वह इस संकट को भी पहचान सकती है और उससे उबर सकती है परन्तु इसके लिए पहले इस संकट को स्वीकार करना होगा।


समाधान न तो यह है कि हम टेलीविजन तोड़ दें, न यह कि स्त्रियों को 'घर में बन्द' करें।


समाधान यह है कि हम अपनी पारिवारिक परम्परा की उस आत्मा को पुनः पहचानें जिसमें सबका सम्मान था, सबकी भूमिका थी और उसे आधुनिक संदर्भ में पुनर्परिभाषित करें।


परिवार में जो अन्याय थे जाति-भेद, स्त्री-उत्पीड़न, बड़ों का अत्याचार उन्हें दूर करना था। परन्तु परिवार की आत्मा परस्पर प्रेम, सेवा, त्याग, साझेदारी उसे सुरक्षित रखना था। हम ने अन्याय तो पूरी तरह नहीं हटाया, परन्तु परिवार की आत्मा को अवश्य क्षत-विक्षत कर दिया।


आज का युवा यदि सचमुच 'फ्री बर्ड' बनना चाहता है तो उसे समझना होगा कि वह पक्षी जो जड़ों से कटा हो, वह आकाश में उड़ नहीं सकता गिर जाता है। जड़ें परतन्त्रता नहीं हैं, जड़ें शक्ति हैं। और भारतीय परिवार अपनी समस्त दुर्बलताओं और शक्तियों के साथ इस सभ्यता की सबसे गहरी जड़ है।


"जब तक भारत में परिवार है, भारत है।

जब परिवार टूटा, तो जो बचेगा वह भारत नहीं —

केवल भारत की भूमि पर बसा एक उपभोक्ता















सन्दर्भ-स्रोत :

भारत की जनगणना 1961, 1991, 2011 | WHO Mental Health Report 2023 | NIMHANS National Survey 2021, 2023 | HelpAge India Report 2022 | DataReportal India 2023 | NCRB Accidental Deaths & Suicides in India 2022 | Law Commission of India Report | Family Courts Annual Report Delhi & Mumbai 2022 | CSDS Lokniti Survey 2022 | iCall TISS Mumbai | Cigna Loneliness Index India 2023 | Naomi Wolf, The Beauty Myth | Marshall McLuhan, Understanding Media (1964) | Theodor Adorno & Max Horkheimer, Dialectic of Enlightenment | Erich Fromm, The Art of Loving (1956) & Escape from Freedom (1941) | Zygmunt Bauman, Liquid Modernity (2000) & Liquid Love (2003) | Neil Postman, Amusing Ourselves to Death (1985) | Ministry of Social Justice & Empowerment, India


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