लोकतंत्र और बहुमत / भीड़

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  लोकतंत्र में बहुमत कब भीड़ बन जाता है? जब संख्या तर्क से बड़ी, नारा तथ्य से बड़ा और बहुमत संविधान से ऊपर हो जाए... लोकतंत्र का सबसे सरल अर्थ है—जनता का शासन। लेकिन यहीं से एक कठिन सवाल पैदा होता है। अगर जनता की संख्या ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है, तो क्या बहुमत जो चाहे वह कर सकता है? क्या 51 प्रतिशत लोग 49 प्रतिशत लोगों के अधिकार तय कर सकते हैं? क्या बहुमत के पास यह अधिकार होना चाहिए कि वह अल्पमत की आवाज़ बंद कर दे? और अगर किसी दिन बहुमत तर्क के बजाय भावनाओं, कानून के बजाय आक्रोश और विवेक के बजाय भीड़ की मानसिकता से निर्णय लेने लगे, तो वह बहुमत लोकतंत्र रहता है या भीड़ बन जाता है? यही वह महीन रेखा है जहाँ लोकतंत्र और भीड़तंत्र, विवेक और उन्माद, सभ्यता और बर्बरता एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं। --- भीड़तंत्र क्या है? ग्रीक भाषा में Ochlocracy (ओक्लोक्रेसी) शब्द दो शब्दों से बना है—ochlos, जिसका अर्थ है भीड़, और kratos, जिसका अर्थ है शासन या सत्ता। अर्थात—भीड़ का शासन। लेकिन भीड़ का अर्थ केवल सड़क पर जमा हजारों लोगों से नहीं है। कभी-कभी संसद में बैठा बहुमत भी भीड़ जैसी म...

जिमखाना क्लब - दिल्ली

#औपनिवेशिक_विलास का अंतिम दुर्ग - दिल्ली जिमखाना क्लब

#जब_गुलामी भी शानदार थी कुछ लोगों के लिए

#एक_इमारत_दो_युग_एक_ही_चरित्र

इतिहास में कुछ इमारतें केवल ईंट-पत्थर की संरचना नहीं होतीं वे एक व्यवस्था का साकार रूप होती हैं दिल्ली जिमखाना क्लब ऐसी ही एक संरचना है 1913 में जब यह क्लब स्थापित हुआ, तब इसका उद्देश्य स्पष्ट था ब्रिटिश साम्राज्य के उन अधिकारियों और उनके चुने हुए भारतीय सहयोगियों को एक ऐसा आश्रय देना जहाँ शासन की थकान उतारी जाए, जहाँ सत्ता अपने आप से मिले, जहाँ विशेषाधिकार को "क्लब की सदस्यता" का सभ्य नाम दिया जाए।

1947 में देश आज़ाद हुआ यूनियन जैक उतरा परन्तु जिमखाना क्लब के ऊपर जो अदृश्य पताका लहराती थी विशेष वर्ग की, विशेष लोगों के लिए, विशेष दुनिया की वह आज भी वैसी ही फहराती रही केवल उसके रंग बदले, चेहरे बदले भीतर का चरित्र वही रहा।

दिल्ली जिमखाना क्लब का वर्तमान भवन जिस व्यक्ति की कल्पना और कूँची से बना, उसका नाम था #रॉबर्ट_टॉर_रसेल Robert Tor Russell वे ब्रिटिश भारत के पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (PWD) के मुख्य वास्तुकार थे 1930 के दशक के आरम्भ में जब नई दिल्ली को ब्रिटिश साम्राज्य की नई राजधानी के रूप में खड़ा किया जा रहा था, रसेल उस पूरे स्थापत्य-स्वप्न के केंद्र में थे।

जिमखाना क्लब का मुख्य भवन 1930-33 के बीच बनकर तैयार हुआ इसका ठेका दिया गया #सर_तेजा_सिंह_मलिक को, जो उस दौर के प्रतिष्ठित निर्माण ठेकेदार थे। 
 भवन को इंडो-सारासेनिक और नव-शास्त्रीय यूरोपीय शैली के संयुक्त शैली में बनाया गया जो उस पूरे युग की स्थापत्य-भाषा थी : यानी भारतीय भूमि पर यूरोपीय अहंकार का सुरुचिपूर्ण प्रदर्शन।

इसके निर्माण की मूल लागत के सटीक सरकारी आंकड़े अभिलेखागार में दबे हैं, सार्वजनिक नहीं है किन्तु यह ज्ञात है कि स्विमिंग बाथ का निर्माण अकेले ₹21,000 (तत्कालीन मुद्रा में) में हुआ था जो उस युग में एक बड़ी राशि थी और इसे #लेडी_विलिंगडन (वायसराय की पत्नी) ने व्यक्तिगत रूप से वित्त पोषित किया था। 

 1936 में स्विमिंग बाथ और स्क्वाश कोर्ट पूर्ण हुए, जिनके उद्घाटन के पत्थर आज भी भवन में लगे हैं।#रॉबर्ट_टॉर_रसेल केवल जिमखाना क्लब के निर्माता नहीं थे उनकी कलम से नई दिल्ली की कुछ सबसे प्रतिष्ठित और आज भी जीवंत इमारतें निकलीं 

#कनॉट_प्लेस (1928-33) - नई दिल्ली का वाणिज्यिक हृदय जॉर्जियन नव-शास्त्रीय शैली में बना यह गोलाकार बाज़ार आज भी राजधानी का केंद्र है रसेल ने इसे उस नई दिल्ली के व्यापारिक केंद्र के रूप में डिज़ाइन किया जो ब्रिटिश साम्राज्य की शान को प्रतिबिंबित करे।

कमांडर-इन-चीफ का आवास, जो बाद में #तीन_मूर्ति_भवन (Teen Murti House) बना स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का आधिकारिक निवास आज यह नेहरू स्मारक संग्रहालय है।

#हार्डिंग_एवेन्यू के सरकारी बंगले - लुटियन दिल्ली के उन भव्य आवासीय क्षेत्रों की रचना जो आज भी मंत्रियों, अफसरों और न्यायाधीशों के निवास हैं।

इस प्रकार रसेल ने एक ऐसी दिल्ली गढ़ी जिसमें शासन, वाणिज्य और विलास तीनों के लिए अलग-अलग, भव्य और स्थायी ठिकाने थे। जिमखाना उसी त्रयी का विलास-स्तम्भ था।

1928 में नई दिल्ली की नई राजधानी के मानचित्र पर जब एडविन लुटियन की रेखाएं खिंच रही थीं, तब इस क्लब को 27.3 एकड़ भूमि परपेचुअल लीज़ पर दी गई यानी अनंतकाल के लिए।

पता था -2, सफदरजंग रोड प्रधानमंत्री आवास से पैदल दूरी, राष्ट्रपति भवन से कुछ किलोमीटर, लोधी एस्टेट से सटा हुआ,यानी सत्ता के गलियारों के ठीक बगल में, विलास का एक स्वायत्त संसार।

इस 27.3 एकड़ में समाया था 26 घास के टेनिस कोर्ट (देश में सर्वाधिक, विम्बलडन की घास के समतुल्य माने जाने वाले), स्विमिंग पूल, स्क्वाश और बैडमिंटन कोर्ट, गोल्फ प्रैक्टिस ग्राउंड, बॉलरूम, बैंक्वेट हॉल, आवासीय कक्ष, बार, रेस्तराँ और वह सब जो "सभ्य जीवन" की परिभाषा ब्रिटिश कुलीन वर्ग ने तय की थी।

3 जुलाई 1913 को जब कलकत्ता से राजधानी दिल्ली स्थानांतरित हुए अभी दो वर्ष भी नहीं बीते थे कि इस क्लब की स्थापना हुई थी 
 प्रथम अध्यक्ष थे #स्पेंसर_हार्कोर्ट_बटलर संयुक्त प्रान्त के तत्कालीन गवर्नर।

शुरू में नाम था -इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब यह "इम्पीरियल" शब्द संयोग नहीं था वह एक घोषणा थी, सदस्यता का अधिकार था - ICS अधिकारियों को, सशस्त्र सेना के वरिष्ठ अंग्रेज़ अफसरों को, और उन चुनिन्दा भारतीय रईसों को जिन्हें साम्राज्य ने अपने तंत्र में उपयोगी पाया था।

यहाँ टेनिस खेला जाता था लेकिन वह केवल खेल नहीं था, वह संबंध बनाने का मंच था, यहाँ रात्रिभोज होते थे लेकिन वे केवल भोजन नहीं थे। वे नीति-निर्माण की अनौपचारिक बैठकें थीं। राष्ट्रपति #प्रणब_मुखर्जी जी ने 2013 में इसके शताब्दी समारोह में कहा था कि "इसके कक्षों में हुई बैठकों ने भारत की एकता और सत्ता हस्तांतरण में भूमिका निभाई "

आजादी के बाद 1947 में "इम्पीरियल" शब्द हटा दिया गया नाम से,किन्तु भावना से नहीं।

अब यह क्लब नए शासक वर्ग का अड्डा बन गया - IAS, IPS, सेना के जनरल, उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, नेता, उद्योगपति 
 वही विशेषाधिकार, वही बंद दरवाजे, केवल नाम-पट्टिकाओं पर अंग्रेज़ी नाम की जगह हिन्दुस्तानी नाम आ गए।

  कागज़ों पर सदस्यता की औपचारिक फीस कभी ₹4.5 लाख (सरकारी कोटे में), कभी ₹22 लाख तक दिखाई गई, प्रतीक्षा सूची 37 वर्ष तक की है 

परन्तु व्यवहार में यह क्लब एक #समानान्तर_बाज़ार में तब्दील हो गया जब प्रतीक्षा सूची में दशकों का इन्तजार हो और "पहुँच" की मांग करोड़ों में हो, तो सदस्यता एक मूक सम्पत्ति बन जाती है जो बेची तो नहीं जाती, पर उसके लिए करोड़ों रुपये की अनौपचारिक "व्यवस्था" होती रही है। 
 कोई रिकॉर्ड नहीं, कोई रसीद नहीं केवल "पहचान" और "सिफारिश" का वह अदृश्य तंत्र जो हमेशा से भारतीय सत्ता-व्यवस्था की रीढ़ रहा है।

क्लब के अपने नियमों ने भी इस खेल को पोषित किया मौजूदा सदस्यों के बच्चों को प्राथमिकता दी जाने लगी यानी एक लोकतंत्र में, सरकारी ज़मीन पर, एक #वंशानुगत_विशेषाधिकार का संस्थान पल रहा था।

22 मई 2026 को सरकार ने 5 जून तक परिसर खाली करने का आदेश दिया है रक्षा अवसंरचना और राष्ट्रीय हित का हवाला देते हुए।

113 वर्ष पुराना यह क्लब अब इतिहास के मोड़ पर खड़ा है।

प्रश्न केवल इतना है क्या यह 27.3 एकड़ सच में आम नागरिक के काम आएगी? या एक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की ज़मीन किसी और विशेषाधिकार प्राप्त संस्था को सौंपी जाएगी?

क्योंकि इतिहास तो यही बताता है कि इमारतें बदलती हैं वर्ग-चरित्र नहीं।

रॉबर्ट टॉर रसेल ने जो दिल्ली बनाई थी वह शासकों के लिए थी आज उस दिल्ली का एक टुकड़ा वापस लिया जा रहा है देखना यह है कि वह किसको लौटाया जाता है जनता को, या किसी नए "इम्पीरियल" स्वप्न को

यह क्लब केवल एक भवन नहीं है यह उस मानसिकता का पता था जो मानती है कि कुछ लोग जन्म से ही "क्लब के योग्य" होते हैं, और बाकी सब - #प्रतीक्षा_सूची में

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