लोकतंत्र और बहुमत / भीड़

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  लोकतंत्र में बहुमत कब भीड़ बन जाता है? जब संख्या तर्क से बड़ी, नारा तथ्य से बड़ा और बहुमत संविधान से ऊपर हो जाए... लोकतंत्र का सबसे सरल अर्थ है—जनता का शासन। लेकिन यहीं से एक कठिन सवाल पैदा होता है। अगर जनता की संख्या ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है, तो क्या बहुमत जो चाहे वह कर सकता है? क्या 51 प्रतिशत लोग 49 प्रतिशत लोगों के अधिकार तय कर सकते हैं? क्या बहुमत के पास यह अधिकार होना चाहिए कि वह अल्पमत की आवाज़ बंद कर दे? और अगर किसी दिन बहुमत तर्क के बजाय भावनाओं, कानून के बजाय आक्रोश और विवेक के बजाय भीड़ की मानसिकता से निर्णय लेने लगे, तो वह बहुमत लोकतंत्र रहता है या भीड़ बन जाता है? यही वह महीन रेखा है जहाँ लोकतंत्र और भीड़तंत्र, विवेक और उन्माद, सभ्यता और बर्बरता एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं। --- भीड़तंत्र क्या है? ग्रीक भाषा में Ochlocracy (ओक्लोक्रेसी) शब्द दो शब्दों से बना है—ochlos, जिसका अर्थ है भीड़, और kratos, जिसका अर्थ है शासन या सत्ता। अर्थात—भीड़ का शासन। लेकिन भीड़ का अर्थ केवल सड़क पर जमा हजारों लोगों से नहीं है। कभी-कभी संसद में बैठा बहुमत भी भीड़ जैसी म...

काँटों का ताज

काँटों_का_ताज - सोनार बाँग्ला का स्वप्न और सुवेन्दु की कठिन राह

आज  9 मई 2026 को कोलकाता का ब्रिगेड परेड ग्राउंड इतिहास की एक नई इबारत का गवाह बना

सुवेन्दु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के पहले भाजपा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली  और इसके साथ भाजपा ने उस राज्य में अपनी पहली सरकार बनाई, जिसे जीतने का स्वप्न पार्टी ने दशकों से देखा था भाजपा ने 293 में से 207 सीटें जीतकर 15 वर्षों की तृणमूल सत्ता का अंत किया। 

जनसागर उमड़ा,भगवा लहराया,नारे गूँजे

लेकिन इस उत्सव के पीछे, जश्न के शोर के नीचे, एक दूसरी आवाज़ भी थी  बंगाल की धरती की आवाज़, जो दशकों के घावों से कराह रही है।

जो ताज आज सुवेन्दु अधिकारी के सिर सजा है, वह सोने का नहीं  काँटों का है और वे काँटे असली हैं, तीखे हैं, और हर दिशा से चुभते हैं
        आज उन्ही काँटों पर विचार करते है 

पहला_काँटा — लहू से सनी विरासत

जीत की रात अभी ठीक से बीती भी नहीं थी कि बंगाल ने अपनी पुरानी, क्रूर आदत दिखा दी

6 मई 2026 को सुवेन्दु अधिकारी के निजी सहायक और भूतपूर्व वायुसेना वेटरन चंद्रनाथ राठ को मध्यमग्राम, उत्तर 24 परगना में मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने बेरहमी से गोली मार दी  चार गोलियाँ, करीब से, सुनियोजित तरीके से यह कोई आवेश में की गई हत्या नहीं थी —यह पेशेवर हत्या थी, जो दिनों की पूर्व-निगरानी के बाद अंजाम दी गई 

 चुनाव कोई हो हिंसा होना लाजिमी रहा है बिहार में इस बार भी यह दोनों तरफ से हो रहा है और यही बंगाल की सबसे बड़ी त्रासदी है।

ममता राज में सैकड़ों भाजपा कार्यकर्ता मारे गए 2021 के चुनाव-पश्चात हिंसा में सुनियोजित हत्याएँ, बलात्कार और आगजनी हुई हर बार तृणमूल की हार के बाद यही पैटर्न दोहराया गया 

अब सत्ता पलट गई है लेकिन बंगाल की राजनीतिक हिंसा की संस्कृति वह नहीं पलटी है वह जड़ों तक उतरी हुई है।

अधिकारी के सामने सबसे पहली परीक्षा यही है  क्या वे इस चक्र को तोड़ेंगे, या उसी चक्र में नया सिरा जोड़ेंगे? विजेता जब प्रतिशोध का रास्ता चुनता है, तो वह स्वयं भी उसी दलदल में धँस जाता है जिससे निकलने का दावा करता है 

दूसरा_काँटा - उत्तर बंगाल की उपेक्षित धरती : दिनाजपुर से कूचबिहार तक

दक्षिण दिनाजपुर में इस चुनाव में 94.58 प्रतिशत मतदान हुआ  पूरे बंगाल में सर्वाधिक 
   उत्तर दिनाजपुर में 77.32 प्रतिशत और पूर्वी मेदिनीपुर में 78.94 प्रतिशत  इन संख्याओं के पीछे बैठी है एक भूखी, आहत जनता की पुकार  जो दशकों से विकास के नाम पर ठगी जाती रही है।

दिनाजपुर  उत्तरी और दक्षिणी, दोनों एक समय चाय बागानों, धान के खेतों और संथाल-राजबंशी संस्कृति की समृद्ध विरासत के लिए जाने जाते थे आज वहाँ की तस्वीर क्या है?

चाय बागानों में भूख से मौतें हो चुकी हैं श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती,  राजबंशी समुदाय दशकों से अलग राज्य 'कामतापुर' की माँग करता आया है  क्योंकि उन्हें लगता है कि न वाम ने उन्हें देखा, न ममता ने,कूचबिहार में 'ग्रेटर कूचबिहार' की भावना अभी भी धधकती है

उत्तर दिनाजपुर, रायगंज, इस्लामपुर, गोयालपोखर  ये वे सीटें हैं जहाँ मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कांग्रेस और तृणमूल का वोट बिखरा लेकिन इन इलाकों में घुसपैठ, मवेशी तस्करी और अवैध व्यापार के नेटवर्क की जड़ें बहुत गहरी हैं  और इन्हें केवल चुनावी भाषणों से नहीं उखाड़ा जा सकता।

अधिकारी सरकार को उत्तर बंगाल को एक अलग दृष्टि से देखना होगा  वहाँ के आदिवासी, राजबंशी, चाय श्रमिक और सीमांत किसान  इनकी वफादारी मिली है, लेकिन यह वफादारी नाजुक है उसे विकास और सम्मान से सींचना होगा

तीसरा_काँटा - मेदिनीपुर : वह धरती जो आज भी जलती है

मेदिनीपुर  पश्चिम और पूर्व, दोनों  बंगाल की राजनीतिक चेतना की आत्मा हैं यहीं से मिदनापुर के क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की नींद हराम की थी यहाँ की माटी में विद्रोह की सुगंध है

        लेकिन आज

पश्चिम मेदिनीपुर के जंगलमहल क्षेत्र  झाड़ग्राम, बेलपाहाड़ी, बिनपुर  में एक ज़माने में माओवाद की आग था ममता ने उसे ठंडा किया, लेकिन उन जंगलों में आज भी विकास नहीं पहुँचा
  आदिवासी समुदाय संथाल, मुंडा, कुड़मी  आज भी सरकारी योजनाओं और जमीनी यथार्थ के बीच की खाई में फँसे हैं।

पूर्वी मेदिनीपुर, नंदीग्राम  यह वह धरती है जहाँ से स्वयं सुवेन्दु अधिकारी आते हैं उन्होंने नंदीग्राम और भवानीपुर  दोनों सीटें जीती भवानीपुर में उन्होंने ममता बनर्जी को 15,115 मतों के अंतर से हराया। यह निजी विजय थी, लेकिन नंदीग्राम की जनता को अब परिणाम चाहिए  नारे नहीं

नंदीग्राम में 2007 में जो हुआ  किसानों पर गोलियाँ  वह घाव अभी भी ताज़ा है इस माटी के लोगों ने बड़े भरोसे से वोट दिया है यह भरोसा टूटा तो माटी फिर उठेगी और तब वह किसी को नहीं देखेगी

चौथा_काँटा - जनसांख्यिकी और सीमा की सुलगती समस्या

मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना में अनियंत्रित अवैध घुसपैठ ने जनसांख्यिकीय संतुलन को बदला है  इन जिलों में भूमि कब्जे और स्थानीय हिंदू निवासियों के विस्थापन की घटनाएँ दर्ज हैं। 

बांग्लादेश के गृह मंत्री सलाहुद्दीन अहमद ने चिंता व्यक्त की है कि भाजपा के सत्ता में आने से 'पुशबैक' अभियान तेज हो सकते हैं, जबकि विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने चेताया कि ढाका जवाब देगा

दूसरी ओर, विश्लेषक प्रश्न उठाते हैं कि यदि इतने बड़े पैमाने पर दशकों से घुसपैठ हो रही थी, तो केंद्र में भाजपा शासन के बावजूद औपचारिक निर्वासन के मामले इतने कम क्यों हैं

यह विरोधाभास ही असली चुनौती है

राजनीतिक वक्तव्य और प्रशासनिक यथार्थ के बीच की इस खाई को अधिकारी सरकार को पाटना होगा  न केवल बयानों से, बल्कि BSF की सक्रियता, स्थानीय पुलिस में सुधार और सीमावर्ती जिलों में विकास से  जो इंसान रोज़गार और सम्मान पाता है, वह अवैध नेटवर्कों का औज़ार नहीं बनता।

मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में  जो परंपरागत रूप से तृणमूल के गढ़ रहे जहाँ इस चुनाव में प्रतिस्पर्धा तीव्र थी इन इलाकों में शासन की चुनौती सबसे कठिन होगी  क्योंकि यहाँ की जमीन पर अनेक समुदायों के हित एक-दूसरे से टकराते हैं।

पाँचवाँ_काँटा - बंद कारखाने, टूटी अर्थव्यवस्था

एक समय था  जब दुर्गापुर का स्टील प्लांट भारत की औद्योगिक शक्ति का प्रतीक था  आसनसोल की खदानें धधकती थीं, हुगली के किनारे जूट मिलें सारे देश को धागा देती थीं,  हावड़ा का उद्योग पूरे पूर्वी भारत की धड़कन था।

आसनसोल  जहाँ मतगणना के दौरान भी हिंसा हुई  वह औद्योगिक शहर आज बेरोजगारी और पलायन की कहानी कह रहा है।

वाम मोर्चे के 34 वर्षों में यूनियन की राजनीति ने उद्योगों की कमर तोड़ दी ममता के 15 वर्षों में 'सिंडिकेट राज' ने जो बचा था, वह भी लील लिया। निवेशक बंगाल से भागते रहे  तृणमूल के गुंडों का भय, अनिश्चित कानून-व्यवस्था और 'कट मनी' की संस्कृति ने राज्य को निवेश के नक्शे से बाहर कर दिया

नई सरकार की प्राथमिकताओं में औद्योगिक पुनरुद्धार, रोज़गार और निवेश आधारित नीतियाँ शामिल हैं। लेकिन निवेशक कागज़ी घोषणाओं पर नहीं, जमीनी वास्तविकता पर आते हैं उन्हें चाहिए  स्थिर सरकार, सुरक्षित माहौल और ईमानदार प्रशासन

दिनाजपुर के किसान को उचित मूल्य चाहिए मेदिनीपुर के बुनकर को बाज़ार चाहिए, आसनसोल के खदान मजदूर को काम चाहिए, जंगलमहल के आदिवासी को ज़मीन का पट्टा चाहिए।

ये माँगें नारों से नहीं, नीतियों से पूरी होती हैं।

छठा_काँटा — पाड़ा का क्लब, 'दादा' की दादागिरी

बंगाल को समझना हो तो 'पाड़ा' को समझो  वह मोहल्ला-इकाई जो हर बंगाली के सामाजिक जीवन की धुरी है।

हर पाड़े का एक क्लब, हर क्लब का एक 'दादा', यह दादा कभी दुर्गापूजा का आयोजक था, कभी खेल-कूद का संरक्षक लेकिन तृणमूल राज में यही दादा बन गया  चंदा वसूलने वाला, ठेके का दलाल, 'कट मनी' का माध्यम

दुकान खोलनी हो, मकान बनाना हो, सरकारी योजना का लाभ लेना हो  क्लब के दादा को हिस्सा दो यही बंगाल की समानांतर सत्ता थी।

तृणमूल से जुड़े ताकतवर लोगों ने  विशेषकर संदेशखाली जैसे इलाकों में  महिलाओं पर अत्याचार किए, जमीनें छीनीं और आम जीवन में आतंक का माहौल बनाया। 

अब यदि उसी क्लब पर केवल भगवा झंडा लग जाए और दादागिरी वैसी ही चलती रहे  तो जनता को जल्दी पता चल जाएगा कि बदलाव महज रंग का था, चरित्र का नहीं है 

सातवाँ_काँटा - सामाजिक ताना-बाना और सद्भाव की परीक्षा

इस चुनाव में बंगाल में हिंदू मतदाताओं का एक अभूतपूर्व समेकन हुआ  जाति, वर्ग और भाषा की सीमाएँ तोड़कर यह एक राजनीतिक शक्ति थी जिसने भाजपा को सत्ता तक पहुँचाया।

लेकिन सत्ता में आकर केवल एक पहचान का प्रतिनिधि बने रहना  यह शासन नहीं, विभाजन की शुरुआत है।

बंगाल की बहुलतावादी सांस्कृतिक विरासत  जो वामपंथ और 'भद्रलोक' की राजनीति की आड़ में पली थी  आज एक नई परीक्षा के दौर में है। 

रवींद्रनाथ, नज़रुल, राम मोहन राय  इस धरती ने हमेशा विचारों की बहुलता को अपनी ताकत माना अधिकारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि बंगाल के  मूल मुसलमान  जो इस राज्य के किसान हैं, बुनकर हैं, कारीगर हैं  वे भयभीत नागरिक न बनें क्योंकि जो शासन भय पर टिका हो, वह लंबा नहीं चलता।

और जो शासन सबको साथ लेकर चले  वही इतिहास में याद रहता है।

भाजपा का बंगाल अभियान सीमा सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और पहचान की राजनीति पर केंद्रित था।  ये सब असली मुद्दे थे। जनता ने उन्हें सुना, समझा और वोट दिया।

लेकिन अब जनता ने जो दिया है  वह वोट नहीं, एक करार है दिनाजपुर का किसान, मेदिनीपुर का मजदूर, आसनसोल का बेरोजगार युवा, जंगलमहल का आदिवासी, हुगली के किनारे बैठा बुनकर  इन सबने एक उम्मीद खरीदी है इनकी टूटी उम्मीदों को पूरा करना होगा 

सोनार बाँग्ला  रवींद्रनाथ का वह स्वर्णिम स्वप्न  सिर्फ एक नारा नहीं है वह एक जिम्मेदारी है एक वचन है।

जीत का जश्न एक दिन का होता है शासन का इम्तहान पाँच साल का।

और बंगाल की माटी  जो वाम को उठाकर पटक चुकी है, जो ममता को उठाकर पटक चुकी है  वह अधिकारी को भी उठाकर पटक देगी, यदि काँटों का यह ताज उन्होंने सम्मान से नहीं सँभाला।

इतिहास की अदालत में न दल देखा जाता है, न झंडे का रंग वहाँ केवल एक प्रश्न पूछा जाता है : क्या तुमने जनता की पीड़ा को पहचाना? क्या तुमने उसे न्याय दिया?

यह प्रश्न आज सुवेन्दु अधिकारी की आँखों में झाँक रहा है।

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