#कहानी_सभ्यता_के_पतन_की
हम सभी ने कभी न कभी यह जरूर सुना होगा कि अमुक सभ्यता बड़ी समृद्ध थी, फिर उसका पतन हो गया
अब बड़ा सवाल यह उठता है जब सभ्यता समृद्ध थी तो फिर वह नष्ट कैसे हो गई ?
और नष्ट हुई तो उस सभ्यता को मानने वाले लोग कहा गए और वह सभ्यता नष्ट क्यों और कैसे हुई ?
किसी भी सभ्यता के नष्ट होने के पीछे कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण कारण होते है ll
#सभ्यता शब्द सुनते ही मन में एक विशाल, जीवंत और स्पंदित संसार का चित्र उभरता है नगर, भाषा, कला, दर्शन, विज्ञान, परंपरा और उन अनगिनत मनुष्यों की पीढ़ियाँ जिन्होंने अपने रक्त, स्वेद और स्वप्नों से उस संसार को गढ़ा
किन्तु इतिहास का सबसे विचलित करने वाला सत्य यह है कि ये विशाल सभ्यताएँ जो अपने समय में अजेय, अपरिहार्य और शाश्वत लगती थीं एक दिन मिट्टी में मिल गईं मेसोपोटामिया की सुमेरियन सभ्यता, मिस्र का फ़राओ साम्राज्य, यूनान की अद्वितीय बौद्धिक चेतना, रोम का अखंड गणतंत्र, माया और इंका की अमेरिकी सभ्यताएँ, सिंधु घाटी की उन्नत नगर-योजना ये सब अपने-अपने युग के ध्रुवतारे थे आज ये खंडहरों में, संग्रहालयों की काँच की अलमारियों में और पुरातत्ववेत्ताओं की धूल भरी नोटबुकों में जीवित हैं।
प्रश्न केवल यह नहीं है कि ये सभ्यताएँ नष्ट क्यों हुईं, प्रश्न यह भी है कि उन्हें मानने वाले लोग कहाँ गए, उनका ज्ञान कहाँ गया, उनकी चेतना का क्या हुआ?
और सबसे महत्वपूर्ण क्या हम आज भी उन्हीं भूलों को दोहरा रहे हैं जो उन सभ्यताओं ने की थीं?
यह लेख उन्हीं प्रश्नों की गहराई में उतरने का एक छोटा सा प्रयास है और कुछेक मूल कारणों का उल्लेख है
1 - स्मृति का विनाश, इतिहास को भूल जाना
किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी और अपरिहार्य शक्ति उसकी सामूहिक स्मृति होती है जब कोई समाज अपने पूर्वजों को, अपने संघर्षों को, अपनी उपलब्धियों को और अपनी गलतियों को याद रखता है तो वह उन गलतियों को दोहराने से बचता है और उन उपलब्धियों की नींव पर नया निर्माण करता है किन्तु जब यह स्मृति खंडित होती है तो समाज एक ऐसे मनुष्य की भाँति हो जाता है जिसे स्मृतिभ्रंश हो गया हो वह हर सुबह नए सिरे से शुरू करता है, पर कहीं पहुँचता नहीं
जर्मन दार्शनिक इमर्शन की यह उक्ति इतिहास के सबसे तीखे और सटीक कूटनीतिक सूत्रों में से एक है "यदि किसी देश की सभ्यता को नष्ट करना हो, तो वहाँ की किताबें महंगी कर दो "
इस वाक्य की गहराई को समझने के लिए थोड़ा रुककर सोचना होगा किताब केवल कागज़ और स्याही का संयोजन नहीं होती वह उस सभ्यता की आत्मा का लिखित रूप होती है जब किताब महंगी होती है, तो ज्ञान केवल सम्पन्न वर्ग की सम्पत्ति बन जाता है साधारण जन, जो किसी भी सभ्यता की वास्तविक रीढ़ होता है, अपनी ही विरासत से कट जाता है
इसका परिणाम दो पीढ़ियों में दिखने लगता है पहली पीढ़ी कम पढ़ती है, दूसरी पीढ़ी जानती ही नहीं और जब ज्ञान का वह खालीपन पैदा होता है तो प्रोपगेंडा, मिथ्या इतिहास और आरोपित संस्कृति उस रिक्तता को भर देती है लोग वही सच मान लेते हैं जो उन्हें बताया जाता है, क्योंकि उनके पास तुलना करने के लिए मूल स्रोत ही नहीं होता।
स्पेन के दार्शनिक जॉर्ज सन्तायाना ने कहा है "जो लोग इतिहास को नहीं जानते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त हैं " यह पंक्ति सभ्यताओं के पतन का सबसे सरल और सबसे गहरा सूत्र है इतिहास केवल तथ्यों का संग्रह नहीं होता वह समाज की सामूहिक बुद्धि का भंडार होता है जब वह भंडार लुट जाता है या जानबूझकर नष्ट किया जाता है, तो समाज बार-बार वही भूलें करता है जो उसके पूर्वजों ने की थीं
नालंदा और तक्षशिला के पुस्तकालयों को जब जलाया गया, तो केवल इमारतें नहीं जलीं लाखों पांडुलिपियाँ जलीं, जिनमें गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, दर्शन और भाषाविज्ञान का अथाह ज्ञान था कहते हैं कि नालंदा के पुस्तकालय में इतनी पांडुलिपियाँ थीं कि वे तीन महीने तक जलती रहीं यह केवल पुस्तकों का दहन नहीं था यह एक सभ्यता की स्मृति का नियोजित विनाश था
2 - भाषा की मृत्यु और सभ्यता का मूक अंत
भाषा किसी भी सभ्यता की सबसे गहरी और सबसे सूक्ष्म अभिव्यक्ति होती है यह केवल संवाद का साधन नहीं होती यह उस समाज की सोचने की पद्धति होती है, उसके देखने का तरीका होती है, उसके अनुभव करने का माध्यम होती है जब कोई भाषा मरती है, तो उसके साथ अनगिनत अवधारणाएँ, दर्शन, लोककथाएँ और आध्यात्मिक अनुभव भी मर जाते हैं जिन्हें किसी दूसरी भाषा में पूरी तरह अनूदित करना असम्भव होता है
भाषाविद् एडवर्ड सपीर और बेंजामिन वॉर्फ ने "भाषाई सापेक्षता" के सिद्धांत में सिद्ध किया कि हम जिस भाषा में सोचते हैं, उसी के अनुसार संसार को देखते और समझते हैं संस्कृत में "ऋत" का अर्थ केवल सत्य नहीं,
वह ब्रह्मांडीय व्यवस्था का बोध है "धर्म" का अनुवाद "religion" नहीं हो सकता क्योंकि धर्म में कर्तव्य, नैतिकता, प्राकृतिक नियम और आध्यात्मिक सत्य सब एक साथ समाहित हैं जब ये भाषाएँ कमज़ोर होती हैं, तो ये अवधारणाएँ भी धुँधली पड़ने लगती हैं
यह तर्क विचारणीय है यदि "धर्म" को "religion" से समझाया जाए और "कर्म" को "fate" से, तो उस सभ्यता की पूरी दार्शनिक संरचना विकृत हो जाती है और यही विकृति धीरे-धीरे उस सभ्यता को उसकी अपनी नींव से अलग कर देती है l
स्वामी विवेकानंद ने चेतावनी दी थी कि यदि भारत ने संस्कृत और अपनी मूल भाषाओं को नहीं बचाया, तो वह अपनी दार्शनिक आत्मा खो देगा और इतिहास साक्षी है कि जब मिस्र की कॉप्टिक भाषा मरी, जब अक्काडियन और सुमेरियन भाषाएँ लुप्त हुईं तो उन सभ्यताओं की आंतरिक चेतना का सूत्र भी टूट गया।
3 - बाहरी सभ्यता का अंधानुकरण और हीनताबोध
जब कोई समाज अपनी जड़ों से कटने लगता है, तो स्वाभाविक रूप से एक मनोवैज्ञानिक रिक्तता पैदा होती है और उस रिक्तता को वह दूसरे की सभ्यता से भरने की कोशिश करता है यह प्रक्रिया हमेशा बाहरी दबाव से नहीं होती बल्कि अधिकांशतः यह भीतरी हीनताबोध से उत्पन्न होती है और यह हीनताबोध किसी की देन नहीं होती यह सुनियोजित तरीके से रोपी जाती है
फ्रांस के मनोविश्लेषक और उपनिवेशवाद के महान आलोचक फ्रैंज़ फैनन ने अपनी कृति "The Wretched of the Earth" में इस प्रक्रिया का सूक्ष्म विश्लेषण किया उनके अनुसार उपनिवेशवाद केवल भूमि और संसाधन नहीं छीनता वह उपनिवेशित समाज की आत्मछवि को नष्ट करता है जब कोई समाज यह मानने लगता है कि उसकी अपनी भाषा, परंपरा और ज्ञान हीन है तो वह अपने विजेता की नकल करना प्रारंभ कर देता है और यही क्षण उस सभ्यता की वास्तविक पराजय का होता है न वह क्षण जब युद्ध हारा गया था।
महात्मा गांधी ने इसे बहुत स्पष्ट रूप से देखा मैकॉले की शिक्षा नीति का लक्ष्य ही यही था "रंग से भारतीय, पर विचार, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज" और यह नीति इतनी सफल रही कि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी भारत की शिक्षा, प्रशासन और न्याय-व्यवस्था उसी साँचे में ढली रही यह बाह्य अनुकरण नहीं था यह आंतरिक रूपांतरण था
अरनॉल्ड टॉयनबी ने अपने विशाल ग्रंथ "A Study of History" में इस प्रक्रिया को "Mimesis" कहा अर्थात नकल उनके अनुसार जब कोई समाज अपनी "रचनात्मक अल्पसंख्यक" अर्थात अपने विचारक, कलाकार, दार्शनिक, साहित्यकार की नकल करने के बजाय बाहरी समाज की नकल करने लगता है, तो वह अपनी मौलिकता खो देता है और मौलिकता के बिना कोई भी सभ्यता जीवित नहीं रह सकती।
4 - सांस्कृतिक षड्यंत्र और बौद्धिक उपनिवेशवाद
आधुनिक युग में सभ्यताओं को तलवार से नहीं जीता जाता उन्हें विचार से, कलम से, कैमरे से और स्क्रीन से जीता जाता है यह सांस्कृतिक युद्ध का वह रूप है जो दिखाई नहीं देता, पर सबसे अधिक घातक होता है क्योंकि जिस पर आक्रमण होता है, उसे पता ही नहीं चलता कि वह पराजित हो रहा है
इतालवी मार्क्सवादी विचारक एंटोनियो ग्राम्शी ने "सांस्कृतिक आधिपत्य" (Cultural Hegemony) की अवधारणा दी। उनके अनुसार जब कोई शक्ति किसी समाज के साहित्य, मीडिया, शिक्षा और कला पर नियंत्रण स्थापित कर लेती है तो वह उस समाज की सोचने की प्रक्रिया को बदल देती है लोग अपनी दासता को स्वयं चुनते हैं, और यही सबसे परिपूर्ण विजय होती है बंदूक से जीते गए समाज विद्रोह करते हैं पर विचार से जीते गए समाज अपने विजेता के प्रति कृतज्ञ भी हो जाते हैं
इस प्रक्रिया को समझने के लिए एक तर्क पर विचार करें यदि किसी समाज में पाँच सौ वर्षों तक यह सिखाया जाए कि उसके पूर्वज अज्ञानी थे, उनका विज्ञान अंधविश्वास था, उनकी कला आदिम थी तो उस समाज की नई पीढ़ी उन पूर्वजों से किसी भी प्रकार की प्रेरणा लेने में संकोच करेगी और जब प्रेरणा का स्रोत कट जाता है, तो समाज की रचनात्मक शक्ति भी सूख जाती है भारत इसका ज्वलंत उदाहरण है " शून्य, ग्रह, दुरी, ब्रह्माण्ड की खोज करने वाला देश सपेरों का देश कहलाया है
दीनदयाल उपाध्याय ने कहा है कि जिस देश की संस्कृति पर आघात होता है, वह देश भले ही राजनीतिक स्वतंत्रता पा ले, किन्तु वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र नहीं होता सांस्कृतिक परतंत्रता राजनीतिक परतंत्रता से अधिक दीर्घकालीन और अधिक घातक होती है क्योंकि राजनीतिक परतंत्रता दिखती है, इसलिए उसके विरुद्ध संघर्ष होता है पर सांस्कृतिक परतंत्रता अदृश्य होती है और जो दिखता ही नहीं, उसके विरुद्ध लड़ना कठिन होता है
साहित्य, मनोरंजन, पाठ्यक्रम और मीडिया के माध्यम से जब यह संदेश धीरे-धीरे और निरंतर दिया जाता है कि अपनी सभ्यता पुरानी, कुंठित और अप्रासंगिक है तो युवा पीढ़ी स्वयं उससे दूर होने लगती है यह काम एकाएक नहीं होता यह दशकों का धैर्यपूर्ण और सुनियोजित प्रयास होता है
5 - नैतिक और आध्यात्मिक पतन
रोमन साम्राज्य का पतन इतिहास का सबसे अधिक अध्ययन किया गया विषय है और अधिकांश इतिहासकार इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि रोम की पराजय सैन्य नहीं, नैतिक थी
एडवर्ड गिब्बन ने "The Decline and Fall of the Roman Empire" में लिखा कि जब रोमन नागरिकों में अपने गणतंत्र के प्रति उत्तरदायित्व का भाव समाप्त हो गया, जब विलासिता और भ्रष्टाचार सामान्य हो गए, जब सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का स्थान चालाकी ने ले लिया
तब रोम भीतर से खोखला हो गया बाहरी आक्रमणकारियों ने तो केवल उस खोखलेपन का लाभ उठाया
यह तर्क आज की सभ्यताओं पर भी समान रूप से लागू होता है जब किसी समाज में व्यक्तिगत लाभ, सामूहिक दायित्व से ऊपर हो जाता है, जब झूठ और सच में अंतर करने की इच्छाशक्ति समाप्त हो जाती है, जब नेतृत्व आदर्शों से नहीं बल्कि स्वार्थ से संचालित होता है तो वह समाज अपनी ही जड़ों को काटने लगता है।
रामकृष्ण परमहंस ने कहा है कि जिस समाज में सत्य की चाहत समाप्त हो जाती है, उस समाज का अध:पतन अनिवार्य है सत्य केवल धार्मिक अवधारणा नहीं है यह सभ्यता की नींव है जब न्यायालय में न्याय न हो, जब शिक्षालय में ज्ञान न हो, जब धर्मालय में आत्मचिंतन न हो तो सभ्यता के सभी स्तंभ एक साथ खोखले होने लगते हैं
6 -इब्न खल्दून की "असबिया" और सामाजिक विखंडन
चौदहवीं शताब्दी के महान अरब इतिहासकार, समाजशास्त्री और दार्शनिक इब्न खल्दून ने अपनी कालजयी कृति "अल-मुकद्दिमा" में सभ्यताओं के उत्थान और पतन का एक अत्यंत तर्कसंगत और वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया उनकी केंद्रीय अवधारणा थी "असबिया" अर्थात वह सामाजिक एकजुटता, सामूहिक भावना और पारस्परिक विश्वास जो किसी समाज को एकसूत्र में बाँधती है
इब्न खल्दून के अनुसार जब कोई सभ्यता अपने उत्थान के चरम पर होती है, तो उसमें असबिया प्रबल होती है लोग एक-दूसरे के लिए, समाज के लिए और अपनी सभ्यता के लिए बलिदान देने को तत्पर होते हैं किन्तु जैसे-जैसे सभ्यता समृद्ध होती है, वैसे-वैसे विलासिता बढ़ती है, व्यक्तिवाद बढ़ता है और असबिया कमज़ोर पड़ने लगती है। समाज वर्गों, जातियों और गुटों में बँट जाता है। और जब असबिया टूट जाती है तो कोई बाहरी शक्ति आकर उस सभ्यता को धूल में मिला देती है
इस तर्क को आधुनिक भारत के संदर्भ में देखें जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर जब समाज में विभाजन गहरे होते हैं तो असबिया कमज़ोर होती है और जब असबिया कमज़ोर होती है, तो बाहरी शक्तियाँ उन विभाजनों को और गहरा करने में सफल होती हैं यह कोई नई रणनीति नहीं है यह "फूट डालो और राज करो" का वही पुराना सूत्र है जो हर युग में कारगर रहा है।
7 - आर्थिक असमानता और शासन का भ्रष्टाचरण
जब किसी सभ्यता में संसाधन और अवसर मुट्ठी भर लोगों के हाथ में केंद्रित हो जाते हैं तो शेष समाज उस सभ्यता से विमुख होने लगता है और यह विमुखता स्वाभाविक है जिस व्यवस्था ने उन्हें न्याय नहीं दिया, न अवसर दिया, न सम्मान दिया उसके प्रति न उनमें आस्था होती है, न समर्पण
यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने "रिपब्लिक" में लिखा कि जब कोई राज्य अपने नागरिकों के प्रति न्यायपूर्ण नहीं रहता, तो वह राज्य भीतर से विघटित होने लगता है शासन का अर्थ केवल सत्ता का संचालन नहीं शासन का अर्थ है समाज की नैतिक और भौतिक दिशा का उत्तरदायी संचालन जब यह उत्तरदायित्व टूटता है, तो नागरिक और शासन के बीच का वह अदृश्य सामाजिक अनुबंध भी टूट जाता है।
अरस्तू ने इससे आगे जाकर कहा कि अत्यधिक संपत्ति और अत्यधिक गरीबी दोनों सभ्यता के शत्रु हैं मध्यवर्ग किसी भी सभ्यता की रीढ़ होता है जब मध्यवर्ग कुचला जाता है और समाज दो ध्रुवों में बँट जाता है तो वह विखंडन की ओर बढ़ता है।
8 - पर्यावरणीय और भौतिक पतन
माया सभ्यता के पतन पर किए गए आधुनिक शोध यह बताते हैं कि उस सभ्यता के अंत में एक बड़ी भूमिका पर्यावरणीय विनाश की भी थी अत्यधिक वन-कटाई, मृदा-क्षरण और जल-संकट ने उस सभ्यता की कृषि को नष्ट कर दिया और जब अन्न नहीं रहा, तो नगर खाली होने लगे
सिंधु घाटी सभ्यता के पतन में भी जलवायु परिवर्तन और नदियों के मार्ग-परिवर्तन की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
यह तर्क आधुनिक सभ्यता के लिए एक गहरी चेतावनी है जो सभ्यता अपनी प्रकृति को शत्रु मानकर उसका शोषण करती है वह अंततः उसी प्रकृति के प्रतिशोध का शिकार होती है भारतीय दर्शन ने सदैव प्रकृति को माता माना "माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:" अर्थात भूमि माता है और मैं उसका पुत्र यह केवल काव्यात्मक उद्गार नहीं था यह एक सभ्यता का अस्तित्व-दर्शन था
9 - युद्ध और बाह्य आक्रमण
युद्ध सभ्यताओं के पतन का सबसे प्रत्यक्ष और दृश्यमान कारण है किन्तु इतिहास के गहन अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि युद्ध अधिकांशतः कारण नहीं, परिणाम होता है जो सभ्यता भीतर से एकजुट, नैतिक और सशक्त होती है वह बाहरी आक्रमण का प्रतिरोध कर सकती है किन्तु जो सभ्यता भीतर से विखंडित, नैतिक रूप से दिवालिया और बौद्धिक रूप से रिक्त हो चुकी होती है उसके लिए बाहरी आक्रमण तो केवल अंतिम प्रहार होता है
चाणक्य ने अर्थशास्त्र में स्पष्ट लिखा है कि राज्य का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं, भीतर होता है।
आंतरिक कलह, भ्रष्ट अमात्य और दिशाहीन नेतृत्व ये बाहरी शत्रु से भी अधिक घातक हैं और इतिहास ने बार-बार यह सिद्ध किया है पृथ्वीराज चौहान की पराजय में उनके सामंतों की अनैक्य की भूमिका थी रोम को अंदर से कमज़ोर होते देख ही बाहरी आक्रमणकारियों ने उसकी सीमाएँ तोड़ीं
10 - रचनात्मकता का अंत और अनुकरण की शुरुआत
टॉयनबी ने यह भी रेखांकित किया कि प्रत्येक सभ्यता के उत्थान में एक "रचनात्मक अल्पसंख्यक" की निर्णायक भूमिका होती है वे विचारक, कलाकार, वैज्ञानिक, दार्शनिक और समाज-सुधारक जो नई चुनौतियों का रचनात्मक समाधान खोजते हैं समाज उनका अनुसरण करता है, क्योंकि उनमें प्रेरणा और दिशा होती है।
किन्तु जब यह रचनात्मक अल्पसंख्यक "सत्ताधारी अल्पसंख्यक" में बदल जाती है अर्थात जब वे प्रेरणा की जगह बल से, उदाहरण की जगह दबाव से नेतृत्व करने लगते हैं तो समाज उनका अनुसरण बंद कर देता है इस बिंदु पर विघटन शुरू होता है और यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो हर महान सभ्यता में दोहराई गई है
ओशो ने इस प्रसंग में कहा था कि सभ्यता का संकट तब आता है जब समाज में प्रश्न पूछने की शक्ति समाप्त हो जाती है जब हर उत्तर पहले से तय हो, जब जिज्ञासा को विद्रोह माना जाए, जब युवा केवल परंपरा का बोझ उठाने वाले हों न कि उसे पुनर्जीवित करने वाले तो वह सभ्यता जड़ हो जाती है और जड़ता मृत्यु का पहला चरण है।
क्या सभ्यताएँ पूरी तरह नष्ट होती हैं यहाँ यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दार्शनिक प्रश्न उठता है क्या कोई सभ्यता वास्तव में पूरी तरह नष्ट होती है ? या वह एक रूप से दूसरे रूप में, एक युग से दूसरे युग में, एक भूमि से दूसरी भूमि में प्रवाहित होती रहती है?
ओशो ने इस प्रश्न पर विचार करते हुए कहा था कि सभ्यताएँ नष्ट नहीं होतीं वे चेतना के गहरे तलों में चली जाती हैं, अव्यक्त हो जाती हैं जब कोई समाज उन्हें याद करता है, उनसे संवाद करता है तो वे पुनः व्यक्त होने लगती हैं भारतीय सभ्यता इसका सबसे बड़ा और जीवंत प्रमाण है, हज़ारों वर्षों के आघातों, आक्रमणों, और षड्यंत्रों के बाद भी वेदों की ऋचाएँ जीवित हैं, उपनिषदों का ज्ञान जीवित है, रामायण और महाभारत की कथाएँ करोड़ों जनों के जीवन में जीवित हैं।
रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा है कि भारत अनेक मृत्यु देख चुका है पर उसने हर बार पुनर्जन्म लिया, क्योंकि उसकी आत्मा केवल इमारतों में नहीं, अपितु जन-जन की स्मृति में बसती है
रमण महर्षि ने इस प्रश्न को और गहरे स्तर पर देखा उनके अनुसार जो आत्मा में है, वह कभी नष्ट नहीं होता सभ्यता का वह अंश जो केवल भौतिक था वह मिट्टी में मिल जाता है किन्तु जो उसमें सत्य था, सुंदर था, शुभ था वह किसी न किसी रूप में जीवित रहता है
कबीर की वाणी में यही सत्य है
"माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय।।"
सभ्यता की माटी इतनी सरलता से नहीं मरती वह दबती है, प्रतीक्षा करती है और जब कोई जागरूक पीढ़ी उसे पहचानती है, तो वह पुनः अंकुरित होती है।
स्मृति ही सभ्यता की आत्मा है जो हमें हमारा वर्तमान दिखाता है आज जब ज्ञान के स्रोत महंगे और दुर्लभ हो रहे हैं, जब इतिहास को विवादास्पद बनाया जा रहा है, जब भाषाएँ और लोककलाएँ कमज़ोर पड़ रही हैं, जब मीडिया और मनोरंजन जनमानस की अभिरुचियाँ निर्धारित कर रहे हैं, जब युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से अनजान और बाहरी संस्कृति से अभिभूत है तो यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है
किसी भी सभ्यता की रक्षा केवल सेना नहीं करती उसकी रक्षा करते हैं उसके लेखक जो सत्य लिखते हैं, उसके शिक्षक जो अगली पीढ़ी को उसकी विरासत से परिचित कराते हैं, उसके माता-पिता जो अपने बच्चों को अपनी भाषा और परंपरा से जोड़ते हैं, और उसके वे युवा जो अपनी जड़ों को जानकर आधुनिकता को अपनाते हैं क्योंकि वही वृक्ष आँधियों में टिकता है जिसकी जड़ें गहरी हों
इतिहास का सबसे बड़ा पाठ यही है सभ्यताएँ एकाएक नहीं मरतीं वे धीरे-धीरे भूल जाती हैं और जब तक कोई समाज अपनी स्मृति को जीवित रखता है अपनी भाषा में, अपनी कला में, अपने उत्सवों में, अपनी कहानियों में तब तक वह सभ्यता जीवित है l
अंततः स्मृति ही सभ्यता की आत्मा है और जब तक यह आत्मा जीवित है कोई उसे नष्ट नहीं कर सकता।
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