लोकतंत्र और बहुमत / भीड़

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  लोकतंत्र में बहुमत कब भीड़ बन जाता है? जब संख्या तर्क से बड़ी, नारा तथ्य से बड़ा और बहुमत संविधान से ऊपर हो जाए... लोकतंत्र का सबसे सरल अर्थ है—जनता का शासन। लेकिन यहीं से एक कठिन सवाल पैदा होता है। अगर जनता की संख्या ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है, तो क्या बहुमत जो चाहे वह कर सकता है? क्या 51 प्रतिशत लोग 49 प्रतिशत लोगों के अधिकार तय कर सकते हैं? क्या बहुमत के पास यह अधिकार होना चाहिए कि वह अल्पमत की आवाज़ बंद कर दे? और अगर किसी दिन बहुमत तर्क के बजाय भावनाओं, कानून के बजाय आक्रोश और विवेक के बजाय भीड़ की मानसिकता से निर्णय लेने लगे, तो वह बहुमत लोकतंत्र रहता है या भीड़ बन जाता है? यही वह महीन रेखा है जहाँ लोकतंत्र और भीड़तंत्र, विवेक और उन्माद, सभ्यता और बर्बरता एक-दूसरे के सामने खड़े दिखाई देते हैं। --- भीड़तंत्र क्या है? ग्रीक भाषा में Ochlocracy (ओक्लोक्रेसी) शब्द दो शब्दों से बना है—ochlos, जिसका अर्थ है भीड़, और kratos, जिसका अर्थ है शासन या सत्ता। अर्थात—भीड़ का शासन। लेकिन भीड़ का अर्थ केवल सड़क पर जमा हजारों लोगों से नहीं है। कभी-कभी संसद में बैठा बहुमत भी भीड़ जैसी म...

कागज

जब कागज़ जीत गया
और इंसान हार गया

ओडिशा के जीतू मुंडा को अपनी मृत बहन का कंकाल कंधे पर उठाकर बैंक जाना पड़ा 
यह एक घटना नहीं, इस व्यवस्था का असली चेहरा है।
अप्रैल 2026
क्योंझर, ओडिशा
व्यवस्था_रूपी_राक्षस
कागज़_नामक_दैत्य
जगह -मल्लिप्सी गाँव · क्योंझर जिला · ओडिशा

अप्रैल की तपती दोपहर में 42 वर्षीय जीतू मुंडा अपनी मृत बहन ककरा मुंडा का कंकाल कंधे पर उठाए, जलती धूप में तीन किलोमीटर पैदल चलकर ओडिशा ग्रामीण बैंक की शाखा पहुँचता है जानते है क्यों, उसे अपनी मृत बहन के जन धन खाते में पड़े पैसे निकालने थे 

उसकी माँग बेहद मामूली थी — बहन के खाते में जमा ₹19,300 उसे दिया जाए 

लेकिन जिस व्यवस्था ने उसे यहाँ तक पहुँचाया था उसने कागज़ माँगे, दस्तावेज़ माँगे, और जब कुछ नहीं बना तो उसे श्मशान से बहन की हड्डियाँ उठानी पड़ीं।

यह कोई फ़िल्म का दृश्य नहीं। यह 2026 के "डिजिटल इंडिया" का असली चेहरा है।

पूरी कहानी यह है कि 

ककरा मुंडा की ज़िंदगी पहले ही बर्बाद हो चुकी थी। पति जा चुका था, इकलौता बेटा जा चुका था। दो महीने पहले वह भी चली गई। जीतू उसका एकमात्र जीवित स्वजन था।

उसने अंतिम संस्कार किया और फिर सोचा — बहन ने जो थोड़ा-सा पैसा बचाया था, उसे वह निकाल ले, अपने काम आए।

वह कई दिनों तक बैंक के चक्कर काटता रहा। बैंक अधिकारी हर बार यही कहते — मृत्यु का प्रमाण लाओ, कानूनी उत्तराधिकारी के दस्तावेज़ लाओ। वह अनपढ़ था, प्रक्रियाओं से अनजान था। हर बार लौटा दिया गया।

और एक दिन उसका धैर्य टूट गया। उसने वह किया जो एक टूटा हुआ इंसान आखिर में करता है — उसने बहन की कब्र खोदी, कंकाल उठाया, कपड़े में लपेटा और चल पड़ा।

क्योंकि व्यवस्था को "सबूत" चाहिए था — और उसके पास यही एकमात्र सबूत था।

कागज़ नामक दैत्य — जो अजर है, अमर है

जीतू मुंडा और ककरा मुंडा कोई अपवाद नहीं हैं। वे उस अदृश्य दैत्य के नवीनतम शिकार हैं — जिसका नाम है कागज़।

यह दैत्य सर्वव्यापी है। यह हर जगह मिलता है 

अस्पताल में — जहाँ एक माँ अपने मरते बच्चे को गोद में लिए भर्ती के कागज़ात के लिए भटकती है।

स्कूल में — जहाँ एक गरीब बाप का बच्चा प्रमाणपत्रों के अभाव में दाखिले से वंचित रह जाता है।

न्यायालय में — जहाँ न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी नहीं, कागज़ों का पुलिंदा बँधा है।

सरकारी दफ्तर में — जहाँ एक बूढ़ी विधवा पेंशन के लिए सालों से दर-दर की ठोकरें खा रही है।

यह दैत्य हर जगह है — और इसे मारना हर किसी के बस की बात नहीं।

जिसके पास पैसा है, वह वकील रखता है, दलाल रखता है, जुगाड़ लगाता है। जिसके पास पहुँच है, वह फोन घुमाता है — काम हो जाता है।

लेकिन जीतू मुंडा जैसों के पास क्या है उनके पास है एक टूटा हुआ दिल — और बहन की हड्डियाँ

 और इस राष्ट्रव्यापी शर्मिंदगी के कारण है कुछेक जिम्मेदार लोग जिन्हे संविधान ने  दायित्व दिया था। कानून ने अधिकार दिया था। समाज ने भरोसा किया था।

लेकिन नौकरी के मद में, पद के अहंकार में, रिश्वत की लत में और जवाबदेही के पूर्ण अभाव में — कुछ अधिकारी भस्मासुर बन जाते हैं।

वही भस्मासुर — जो वरदान पाने के बाद अपने दाता को ही भस्म करने दौड़ पड़ा था।

व्यवस्था की "संवेदना" — उनके शब्दों में
"कागज़ नहीं है? जाओ, लेकर आओ।"
"नॉमिनी नहीं है? हम क्या करें?"
"नियम तो नियम है।"

यही उनका उत्तर था। यही उनकी संवेदना थी। यही उनकी "जनसेवा" थी।


इस घटना के बाद अधिकारियों ने स्वीकार किया कि जीतू को प्रक्रियाओं की जानकारी ही नहीं थी।

 सवाल जो जवाब माँगता है

जब अधिकारियों को पता था कि यह व्यक्ति अनजान है — तो उन्होंने उसे रास्ता क्यों नहीं बताया? क्या यह उनकी जिम्मेदारी नहीं थी? या जिम्मेदारी सिर्फ वेतन-पर्ची लेने तक सीमित है?

जो हुआ, वह केवल एक बैंक की लापरवाही नहीं है।

यह उस संविधान के मुँह पर करारा तमाचा है — जिसने हर नागरिक को समान गरिमा और समान अधिकार का वादा किया था। 

वह संविधान जिसकी प्रस्तावना में लिखा है — "न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक।" वह संविधान जो कहता है — अनुसूचित जनजातियों का संरक्षण राज्य का दायित्व है।

उस संविधान की आत्मा उस दिन तड़प उठी होगी — जब एक आदिवासी को अपनी मृत बहन का कंकाल उठाकर तीन किलोमीटर चलना पड़ा।

पुलिस आई। भीड़ इकट्ठी हुई। कंकाल को वापस दफनाया गया। अधिकारियों ने "उचित कानूनी प्रक्रिया" से पैसा दिलाने का आश्वासन दिया।

लेकिन जिन अधिकारियों ने हफ्तों तक एक असहाय आदमी को दरवाजे से लौटाया — उनके खिलाफ क्या हुआ?

कोई निलंबन नहीं। कोई जाँच नहीं। कोई FIR नहीं। कुछ नहीं।

जब अपराधी को सज़ा नहीं मिलती, तो अपराध परंपरा बन जाता है। जब लापरवाह को न पुरस्कार मिलता है और न दंड — तो लापरवाही संस्कृति बन जाती है।

यही हो रहा है। यही होता रहेगा — जब तक इस दैत्य को मारने की इच्छाशक्ति ऊपर से नहीं आएगी।

हम गर्व से कहते हैं — डिजिटल इंडिया, जन धन योजना, वित्तीय समावेशन। नारे बड़े हैं। विज्ञापन चमकदार हैं। आँकड़े प्रभावशाली हैं।

लेकिन जीतू मुंडा की यह यात्रा उन तमाम नारों का मुँह नोच लेती है।

जन धन खाता खुलवाना एक नारा है। लेकिन उस खाते तक पहुँचने की प्रक्रिया — इतनी जटिल, इतनी क्रूर, इतनी अमानवीय — कि एक आदिवासी को बहन का कंकाल उठाना पड़े, तो यह "वित्तीय समावेशन" नहीं — यह खुला धोखा है।

बैंक गाँव-गाँव खुल गए। लेकिन संवेदना का दरवाज़ा बंद ही है 

जीतू मुंडा ने जो किया, वह पागलपन नहीं था। वह एक टूटे हुए इंसान की आखिरी चीख थी — उस व्यवस्था के विरुद्ध जो उसे बार-बार अदृश्य समझती रही।

जीतू मुंडा पागल नहीं था। पागल वह व्यवस्था है जिसने उसे पागल बनाया। और पागल हम हैं — जो यह देखकर भी सो जाते हैं।

यह घटना एक दर्पण है। इस दर्पण में हमें अपना चेहरा देखना होगा — हम किस तरह का समाज बना रहे हैं? किस तरह का राष्ट्र?

जब तक इस कागज़ रूपी दैत्य को मारने की — और इसे ताकत देने वाले भस्मासुरों को दंड देने की — राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति नहीं आएगी, तब तक ऐसे जीतू मुंडा बनते रहेंगे।

और ककरा मुंडा जैसी आत्माएँ — कब्र में भी चैन से नहीं सो पाएँगी।

नियम जीत गया — इंसानियत हार गई
कागज़ जीत गया — इंसान हार गया
दैत्य जीत गया — राष्ट्र हार गया
और जब तक इस हार की कीमत किसी को नहीं चुकानी पड़ेगी —
यह हार बार-बार होती रहेगी।

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