कागज
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जब कागज़ जीत गया
और इंसान हार गया
यह एक घटना नहीं, इस व्यवस्था का असली चेहरा है।
अप्रैल की तपती दोपहर में 42 वर्षीय जीतू मुंडा अपनी मृत बहन ककरा मुंडा का कंकाल कंधे पर उठाए, जलती धूप में तीन किलोमीटर पैदल चलकर ओडिशा ग्रामीण बैंक की शाखा पहुँचता है जानते है क्यों, उसे अपनी मृत बहन के जन धन खाते में पड़े पैसे निकालने थे
उसकी माँग बेहद मामूली थी — बहन के खाते में जमा ₹19,300 उसे दिया जाए
लेकिन जिस व्यवस्था ने उसे यहाँ तक पहुँचाया था उसने कागज़ माँगे, दस्तावेज़ माँगे, और जब कुछ नहीं बना तो उसे श्मशान से बहन की हड्डियाँ उठानी पड़ीं।
यह कोई फ़िल्म का दृश्य नहीं। यह 2026 के "डिजिटल इंडिया" का असली चेहरा है।
पूरी कहानी यह है कि
ककरा मुंडा की ज़िंदगी पहले ही बर्बाद हो चुकी थी। पति जा चुका था, इकलौता बेटा जा चुका था। दो महीने पहले वह भी चली गई। जीतू उसका एकमात्र जीवित स्वजन था।
उसने अंतिम संस्कार किया और फिर सोचा — बहन ने जो थोड़ा-सा पैसा बचाया था, उसे वह निकाल ले, अपने काम आए।
वह कई दिनों तक बैंक के चक्कर काटता रहा। बैंक अधिकारी हर बार यही कहते — मृत्यु का प्रमाण लाओ, कानूनी उत्तराधिकारी के दस्तावेज़ लाओ। वह अनपढ़ था, प्रक्रियाओं से अनजान था। हर बार लौटा दिया गया।
और एक दिन उसका धैर्य टूट गया। उसने वह किया जो एक टूटा हुआ इंसान आखिर में करता है — उसने बहन की कब्र खोदी, कंकाल उठाया, कपड़े में लपेटा और चल पड़ा।
कागज़ नामक दैत्य — जो अजर है, अमर है
जीतू मुंडा और ककरा मुंडा कोई अपवाद नहीं हैं। वे उस अदृश्य दैत्य के नवीनतम शिकार हैं — जिसका नाम है कागज़।
यह दैत्य सर्वव्यापी है। यह हर जगह मिलता है
अस्पताल में — जहाँ एक माँ अपने मरते बच्चे को गोद में लिए भर्ती के कागज़ात के लिए भटकती है।
स्कूल में — जहाँ एक गरीब बाप का बच्चा प्रमाणपत्रों के अभाव में दाखिले से वंचित रह जाता है।
न्यायालय में — जहाँ न्याय की देवी की आँखों पर पट्टी नहीं, कागज़ों का पुलिंदा बँधा है।
सरकारी दफ्तर में — जहाँ एक बूढ़ी विधवा पेंशन के लिए सालों से दर-दर की ठोकरें खा रही है।
यह दैत्य हर जगह है — और इसे मारना हर किसी के बस की बात नहीं।
जिसके पास पैसा है, वह वकील रखता है, दलाल रखता है, जुगाड़ लगाता है। जिसके पास पहुँच है, वह फोन घुमाता है — काम हो जाता है।
लेकिन जीतू मुंडा जैसों के पास क्या है उनके पास है एक टूटा हुआ दिल — और बहन की हड्डियाँ
और इस राष्ट्रव्यापी शर्मिंदगी के कारण है कुछेक जिम्मेदार लोग जिन्हे संविधान ने दायित्व दिया था। कानून ने अधिकार दिया था। समाज ने भरोसा किया था।
लेकिन नौकरी के मद में, पद के अहंकार में, रिश्वत की लत में और जवाबदेही के पूर्ण अभाव में — कुछ अधिकारी भस्मासुर बन जाते हैं।
वही भस्मासुर — जो वरदान पाने के बाद अपने दाता को ही भस्म करने दौड़ पड़ा था।
यही उनका उत्तर था। यही उनकी संवेदना थी। यही उनकी "जनसेवा" थी।
इस घटना के बाद अधिकारियों ने स्वीकार किया कि जीतू को प्रक्रियाओं की जानकारी ही नहीं थी।
जब अधिकारियों को पता था कि यह व्यक्ति अनजान है — तो उन्होंने उसे रास्ता क्यों नहीं बताया? क्या यह उनकी जिम्मेदारी नहीं थी? या जिम्मेदारी सिर्फ वेतन-पर्ची लेने तक सीमित है?
जो हुआ, वह केवल एक बैंक की लापरवाही नहीं है।
यह उस संविधान के मुँह पर करारा तमाचा है — जिसने हर नागरिक को समान गरिमा और समान अधिकार का वादा किया था।
वह संविधान जिसकी प्रस्तावना में लिखा है — "न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक।" वह संविधान जो कहता है — अनुसूचित जनजातियों का संरक्षण राज्य का दायित्व है।
उस संविधान की आत्मा उस दिन तड़प उठी होगी — जब एक आदिवासी को अपनी मृत बहन का कंकाल उठाकर तीन किलोमीटर चलना पड़ा।
पुलिस आई। भीड़ इकट्ठी हुई। कंकाल को वापस दफनाया गया। अधिकारियों ने "उचित कानूनी प्रक्रिया" से पैसा दिलाने का आश्वासन दिया।
लेकिन जिन अधिकारियों ने हफ्तों तक एक असहाय आदमी को दरवाजे से लौटाया — उनके खिलाफ क्या हुआ?
कोई निलंबन नहीं। कोई जाँच नहीं। कोई FIR नहीं। कुछ नहीं।
जब अपराधी को सज़ा नहीं मिलती, तो अपराध परंपरा बन जाता है। जब लापरवाह को न पुरस्कार मिलता है और न दंड — तो लापरवाही संस्कृति बन जाती है।
यही हो रहा है। यही होता रहेगा — जब तक इस दैत्य को मारने की इच्छाशक्ति ऊपर से नहीं आएगी।
हम गर्व से कहते हैं — डिजिटल इंडिया, जन धन योजना, वित्तीय समावेशन। नारे बड़े हैं। विज्ञापन चमकदार हैं। आँकड़े प्रभावशाली हैं।
जन धन खाता खुलवाना एक नारा है। लेकिन उस खाते तक पहुँचने की प्रक्रिया — इतनी जटिल, इतनी क्रूर, इतनी अमानवीय — कि एक आदिवासी को बहन का कंकाल उठाना पड़े, तो यह "वित्तीय समावेशन" नहीं — यह खुला धोखा है।
बैंक गाँव-गाँव खुल गए। लेकिन संवेदना का दरवाज़ा बंद ही है
जीतू मुंडा ने जो किया, वह पागलपन नहीं था। वह एक टूटे हुए इंसान की आखिरी चीख थी — उस व्यवस्था के विरुद्ध जो उसे बार-बार अदृश्य समझती रही।
जीतू मुंडा पागल नहीं था। पागल वह व्यवस्था है जिसने उसे पागल बनाया। और पागल हम हैं — जो यह देखकर भी सो जाते हैं।
यह घटना एक दर्पण है। इस दर्पण में हमें अपना चेहरा देखना होगा — हम किस तरह का समाज बना रहे हैं? किस तरह का राष्ट्र?
जब तक इस कागज़ रूपी दैत्य को मारने की — और इसे ताकत देने वाले भस्मासुरों को दंड देने की — राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति नहीं आएगी, तब तक ऐसे जीतू मुंडा बनते रहेंगे।
और ककरा मुंडा जैसी आत्माएँ — कब्र में भी चैन से नहीं सो पाएँगी।
यह हार बार-बार होती रहेगी।
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