गाली का सामान्यीकरण : भाषा बदल रही है या हमारी संवेदनशीलता?
गाली का सामान्यीकरण : जब अपशब्द सामाजिक
संस्कृति बन जाएँ
किसी समाज की पहचान केवल उसकी ऊँची इमारतों, चमकती सड़कों, तकनीकी विकास या आर्थिक समृद्धि से नहीं होती। किसी समाज को वास्तव में समझना हो तो यह देखना चाहिए कि वहाँ के लोग एक-दूसरे से किस तरह बात करते हैं, असहमति के समय कैसी भाषा इस्तेमाल करते हैं और अपने से कमजोर या अलग विचार रखने वाले व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।
क्योंकि भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं है।
भाषा हमारे संस्कार, संवेदनशीलता, रिश्तों और सामाजिक मूल्यों का आईना भी होती है।
हमारे समाज में लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि व्यक्ति की पहचान केवल उसके काम से नहीं, उसकी वाणी से भी होती है। घर में बच्चों को सिखाया जाता था कि बड़ों से कैसे बात करनी है, छोटों के साथ कैसा व्यवहार करना है और गुस्से में भी अपनी जुबान पर कैसे नियंत्रण रखना है।
गाली देना केवल गलत शब्द बोलना नहीं माना जाता था। इसे व्यक्ति के व्यवहार और संस्कार से जोड़कर देखा जाता था।
लेकिन आज स्थिति बदल रही है।
गाली अब केवल गुस्से की भाषा नहीं रह गई है। वह मजाक में है, दोस्तों की बातचीत में है, फिल्मों और वेब सीरीज में है, सोशल मीडिया पर है, ऑनलाइन गेमिंग में है और कई बार सार्वजनिक बहस का भी हिस्सा बन जाती है।
सबसे चिंताजनक बात शायद यह नहीं है कि लोग गाली बोल रहे हैं।
चिंता की बात यह है कि गाली को गलत मानने की हमारी संवेदनशीलता कम होती जा रही है।
जो शब्द कभी सुनकर हमें असहज कर देते थे, आज उन्हीं पर हँसी आती है। कभी जिस भाषा को अशिष्ट समझा जाता था, आज उसे "बिंदास", "रियल", "दोस्ताना" या "दबंग" होने की निशानी तक माना जाने लगा है।
यहीं से असली सवाल पैदा होता है—
क्या यह केवल भाषा का बदलाव है या हमारे सामाजिक मानकों का भी?
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समाज बदलता है, लेकिन हर बदलाव प्रगति नहीं होता
समाज हमेशा बदलता है। भाषा भी बदलती है। नए शब्द आते हैं, पुराने शब्द कम हो जाते हैं। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है।
लेकिन हर बदलाव को प्रगति नहीं कहा जा सकता।
अमेरिकी समाजशास्त्री टैल्कॉट पार्सन्स (Talcott Parsons) ने समाज को बनाए रखने में साझा
मूल्यों और सामाजिक मानकों की भूमिका पर जोर दिया था। किसी भी समाज में कुछ ऐसी
अनकही सीमाएँ होती हैं जो हमें बताती हैं कि कौन-सा व्यवहार स्वीकार्य है और कौन-सा नहीं।
इन्हीं सीमाओं से सामाजिक जीवन में एक तरह की व्यवस्था बनी रहती है।
जब कोई व्यवहार लगातार दोहराया जाता है और समाज उसे स्वीकार करने लगता है, तो धीरे-धीरे उसकी सामाजिक सीमा भी बदल सकती है।
गाली के मामले में भी यही सवाल महत्वपूर्ण है।
पहले कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से गाली देता था तो आसपास के लोग असहज हो जाते थे। आज कई परिस्थितियों में वही गाली सुनकर लोग हँस देते हैं या उसे सामान्य बातचीत का हिस्सा मान लेते हैं।
शब्द वही हैं, लेकिन उनके प्रति समाज की संवेदनशीलता बदल रही है।
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फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम (Émile Durkheim) ने सामाजिक जीवन में साझा
नियमों और मानकों के महत्व को समझाया था। उन्होंने Anomie की अवधारणा के माध्यम से
ऐसी स्थिति की चर्चा की जिसमें समाज के स्थापित मानक कमजोर या अस्पष्ट होने लगते हैं।
इसे बहुत सरल भाषा में समझें तो किसी समाज में यह स्पष्टता कम होने लगे कि क्या उचित है और क्या अनुचित, तो सामाजिक व्यवहार की सीमाएँ भी बदलने लगती हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि गाली बढ़ना अपने आप में समाज के विघटन का प्रमाण है।
लेकिन जब किसी अपमानजनक व्यवहार को लगातार सामान्य बताया जाए और उसे गलत कहने पर उलटे यह कहा जाए कि "इतना तो चलता है", तब हमें यह जरूर देखना चाहिए कि हमारी सामाजिक संवेदनशीलता किस दिशा में जा रही है।
क्योंकि सभ्यता का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य कभी गुस्सा न करे।
सभ्यता का अर्थ यह है कि गुस्से में भी सामने वाले की गरिमा को पूरी तरह खत्म न कर दिया जाए।
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लेकिन क्या हर गाली बुरी होती है?
यहाँ थोड़ा रुकना जरूरी है।
गाली के बारे में चर्चा करते समय एक गलती अक्सर की जाती है—हर तरह की गाली को एक ही श्रेणी में रख दिया जाता है।
मनोवैज्ञानिक टिमोथी जे (Timothy Jay) ने लंबे समय से taboo words
और swearing पर शोध किया है। उनके अनुसार गाली या अपशब्द केवल
आक्रामकता व्यक्त करने के लिए इस्तेमाल नहीं होते। वे गुस्सा, निराशा, दर्द
और तीव्र भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम भी हो सकते हैं और अलग-
अलग सामाजिक परिस्थितियों में उनके अलग-अलग उद्देश्य हो सकते हैं।
यानी किसी व्यक्ति के मुँह से गुस्से में निकला एक अपशब्द और किसी व्यक्ति को जानबूझकर नीचा दिखाने के लिए इस्तेमाल की गई अपमानजनक भाषा—दोनों को बिल्कुल एक जैसा समझना सही नहीं होगा।
समस्या केवल शब्द में नहीं है; उसके पीछे का उद्देश्य, परिस्थिति और सामने वाले पर पड़ने वाला प्रभाव भी महत्वपूर्ण है।
यही फर्क हमारे समाज को समझने की जरूरत है।
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गाली कभी भावनाओं का निकास भी हो सकती है
मनोवैज्ञानिक शोध में गाली के कुछ ऐसे प्रभाव भी सामने आए हैं जो सामान्य धारणा से अलग हैं।
ब्रिटेन के मनोवैज्ञानिक रिचर्ड स्टीफंस (Richard Stephens) और उनके सहयोगियों के 2009
के एक प्रयोग में पाया गया कि कुछ परिस्थितियों में गाली बोलने वाले प्रतिभागियों ने ठंडे पानी में
हाथ रखने वाले दर्द-परीक्षण में अधिक समय तक सहनशीलता दिखाई और दर्द की अनुभूति कम
बताई। शोधकर्ताओं ने इसे तीव्र भावनात्मक/शारीरिक प्रतिक्रिया से जोड़कर समझाया।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि गाली देना स्वास्थ्य या व्यवहार के लिए अच्छी आदत है।
इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि गाली का मनोवैज्ञानिक उपयोग हमेशा एक जैसा नहीं होता।
कभी वह अचानक निकली भावनात्मक प्रतिक्रिया हो सकती है।
कभी दोस्ती के बीच इस्तेमाल होने वाला शब्द।
कभी दर्द या निराशा की अभिव्यक्ति।
और कभी किसी दूसरे व्यक्ति को अपमानित करने का हथियार।
इसलिए समस्या को समझने के लिए हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि "गाली बोली गई या नहीं?"
हमें यह भी पूछना चाहिए—
किससे बोली गई? क्यों बोली गई? किस परिस्थिति में बोली गई? और उसका असर क्या हुआ?
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बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं
मनोवैज्ञानिक अल्बर्ट बंडूरा (Albert Bandura) के सामाजिक अधिगम सिद्धांत की एक
महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य केवल उपदेश सुनकर नहीं, बल्कि दूसरों को देखकर भी सीखता
है।
बच्चा अपने माता-पिता को देखता है।
फिर भाई-बहन, दोस्त, शिक्षक और आसपास के लोगों को।
आज उसके सामने एक और बहुत बड़ा संसार है—मोबाइल की स्क्रीन।
वह कुछ ही मिनटों में ऐसे वीडियो देख सकता है जिनमें गाली देना मजाक है, किसी को नीचा दिखाना मनोरंजन है और आक्रामक भाषा आत्मविश्वास या दबंगई की निशानी है।
बच्चा हमेशा यह विश्लेषण नहीं करता कि यह अभिनय है या वास्तविक जीवन।
वह पहले व्यवहार देखता है।
फिर उसे दोहराता है।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि बच्चा गाली क्यों बोल रहा है।
सवाल यह भी है—
उसने गाली को सामान्य मानना सीखा कहाँ से?
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शोध में मीडिया और गाली के बीच संबंध भी मिला है
यह विषय केवल हमारी सामाजिक धारणा तक सीमित नहीं है।
2011 में Pediatrics में प्रकाशित एक अध्ययन में 223 किशोरों के बीच मीडिया में प्रोफ़ानिटी
यानी अपशब्दों के संपर्क, उनके प्रति दृष्टिकोण, उनके इस्तेमाल और आक्रामक व्यवहार के बीच
संबंधों का अध्ययन किया गया।
अध्ययन में पाया गया कि अलग-अलग मीडिया माध्यमों में गाली-गलौज के अधिक संपर्क का संबंध गाली के प्रति अधिक स्वीकारात्मक दृष्टिकोण, उसके अधिक इस्तेमाल और कुछ प्रकार के आक्रामक व्यवहार से था। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि गाली के प्रति दृष्टिकोण इस संबंध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।
लेकिन इस शोध को भी सही तरीके से समझना जरूरी है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि मीडिया अकेले किसी बच्चे या युवा को आक्रामक बना देता है।
व्यक्ति के व्यवहार पर परिवार, मित्र समूह, व्यक्तित्व, सामाजिक वातावरण और अन्य अनेक कारकों का प्रभाव होता है।
लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिस भाषा को हम बार-बार देखते और सुनते हैं, वह हमारे लिए धीरे-धीरे अधिक परिचित और स्वीकार्य हो सकती है।
यही कारण है कि मीडिया की भूमिका को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।
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बार-बार सुनने से असहजता कम हो सकती है
मनोविज्ञान में Desensitization की अवधारणा बताती है कि किसी उत्तेजना के बार-बार संपर्क
में आने पर उसके प्रति भावनात्मक प्रतिक्रिया कम हो सकती है।
इसे रोजमर्रा के उदाहरण से समझना आसान है।
पहली बार कोई बहुत अपमानजनक शब्द सुनकर हमें बुरा लगता है।
दसवीं बार सुनने पर शायद उतना नहीं।
और अगर वही शब्द रोज सुनाई देने लगे, तो संभव है कि हम उसे सामान्य बातचीत का हिस्सा मानने लगें।
हालाँकि गाली के सामान्यीकरण को समझाने में इस अवधारणा का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए; यह कहना उचित नहीं होगा कि हर बार गाली सुनने से व्यक्ति अनिवार्य रूप से संवेदनहीन हो जाएगा।
लेकिन एक बात स्पष्ट है—
बार-बार दिखाई और सुनाई जाने वाली भाषा सामाजिक स्वीकार्यता की हमारी धारणा को प्रभावित कर सकती है।
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गाली और पुरुषत्व की एक खतरनाक धारणा
हमारे समाज में गाली को कभी-कभी ताकत का प्रतीक भी बना दिया जाता है।
जितनी जोर से बोलो।
जितना अपमान करो।
जितना डर पैदा करो।
उतना ही "दबंग" समझे जाओ।
यह धारणा युवाओं के लिए विशेष रूप से नुकसानदायक हो सकती है।
अमेरिकी समाजशास्त्री Erving Goffman ने सामाजिक जीवन में व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की जाने
वाली सामाजिक छवि और उसके व्यवहार के बीच संबंध को समझाया था।
आज सोशल मीडिया ने इस छवि को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
कई लोग वास्तविक जीवन से अधिक आक्रामक दिखाई देना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उन्हें लोकप्रियता, प्रभाव या सम्मान मिलेगा।
लेकिन हमें एक बुनियादी अंतर समझना चाहिए—
डर पैदा करना और सम्मान पाना एक चीज नहीं है।
जो व्यक्ति हर बातचीत में गाली देता है, वह कुछ समय के लिए प्रभावशाली दिखाई दे सकता है।
लेकिन लोग उससे सम्मान के कारण नहीं, उससे बचने के लिए भी दूरी बना सकते हैं।
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क्या गाली देने वाला व्यक्ति कम बुद्धिमान होता है?
यह धारणा भी आम है कि जो व्यक्ति ज्यादा गाली देता है, उसका शब्द-भंडार कम होता है या वह कम बुद्धिमान होता है।
लेकिन शोध इस सरल निष्कर्ष का समर्थन नहीं करता।
टिमोथी जे के शोध में गाली को केवल "कम भाषा-ज्ञान" का परिणाम मानने के बजाय उसके
भावनात्मक और सामाजिक उपयोगों पर जोर दिया गया है।
इसलिए किसी व्यक्ति को केवल उसके द्वारा बोले गए अपशब्दों के आधार पर बुद्धिमान या मूर्ख घोषित करना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।
हाँ, यदि कोई व्यक्ति हर परिस्थिति में गाली को अपनी भाषा का विकल्प बना ले, तो यह उसके संवाद कौशल और सामाजिक व्यवहार पर सवाल जरूर खड़ा कर सकता है।
क्योंकि शब्दों की कमी और शब्दों का गलत इस्तेमाल—दो अलग बातें हैं।
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लोकतंत्र में भाषा का महत्व
गाली का सवाल केवल परिवार या समाज तक सीमित नहीं है।
इसका संबंध लोकतंत्र से भी है।
लोकतंत्र में हम सभी एक-दूसरे से सहमत नहीं हो सकते।
राजनीति में मतभेद होंगे।
धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, अर्थव्यवस्था और समाज को लेकर अलग-अलग विचार होंगे।
लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि—
असहमति के बावजूद बातचीत जारी रहती है।
अमेरिकी दार्शनिक John Dewey लोकतंत्र को केवल सरकार चुनने की व्यवस्था के रूप में नहीं,
बल्कि सामूहिक जीवन और सहभागिता की संस्कृति के रूप में देखते थे।
इस दृष्टि से लोकतंत्र केवल संसद और चुनाव में नहीं होता।
लोकतंत्र हमारे घर की बातचीत में भी होता है।
सोशल मीडिया पर भी होता है।
दो दोस्तों की बहस में भी होता है।
और उस क्षण भी होता है जब हम अपने विरोधी की बात सुनकर उसे गाली देने के बजाय उसका जवाब तर्क से देते हैं।
यदि हर असहमति का जवाब गाली बन जाए, तो धीरे-धीरे संवाद की जगह दुश्मनी लेने लगती है।
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सोशल मीडिया ने समस्या को और बड़ा कर दिया
पहले किसी व्यक्ति की गाली कुछ लोगों तक सीमित रहती थी।
आज वही बात कुछ सेकंड में हजारों लोगों तक पहुँच सकती है।
सोशल मीडिया की एक और समस्या है—तुरंत प्रतिक्रिया पाने की चाह।
जो बात चौंकाएगी, भड़काएगी या लोगों को हँसाएगी, उसे अधिक प्रतिक्रिया मिल सकती है।
इसलिए कुछ लोग जानबूझकर ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं।
धीरे-धीरे एक अजीब स्थिति पैदा होती है—
सभ्य भाषा सामान्य होने के कारण दिखाई नहीं देती और गाली चर्चा में आ जाती है।
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक टिमोथी जे ने ऑनलाइन संचार में भी swear
words के इस्तेमाल और ऑनलाइन सामाजिक मानकों के संबंध पर चर्चा
की है। उनके अनुसार इंटरनेट पर भी भाषा का इस्तेमाल सामाजिक
वातावरण और वहाँ के व्यवहारिक मानकों से प्रभावित होता है।
इसलिए सोशल मीडिया को केवल तकनीक समझना पर्याप्त नहीं है।
यह भी एक सामाजिक स्थान है।
और हर सामाजिक स्थान की तरह वहाँ भी कुछ मर्यादाएँ जरूरी हैं।
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मजाक और अपमान के बीच एक सीमा होती है
आज अक्सर गाली को यह कहकर बचा लिया जाता है—
"अरे, मजाक कर रहा था।"
लेकिन हर मजाक निर्दोष नहीं होता।
दो दोस्तों के बीच कोई शब्द जिस अर्थ में इस्तेमाल होता है, वही शब्द किसी दूसरे व्यक्ति के लिए अपमानजनक हो सकता है।
मनोवैज्ञानिक शोध भी यह बताता है कि गाली की स्वीकार्यता संदर्भ, व्यक्ति-व्यक्ति के संबंध और परिस्थिति पर निर्भर करती है।
इसलिए किसी भाषा का असर केवल बोलने वाले की मंशा से तय नहीं होता।
सामने वाला उसे किस रूप में महसूस करता है, यह भी महत्वपूर्ण है।
यही सामाजिक संवेदनशीलता है।
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क्या गाली पर कानून बना देना समाधान है?
हर सामाजिक समस्या का समाधान कानून नहीं हो सकता।
कानून की अपनी सीमा है।
यदि कोई व्यक्ति धमकी देता है, किसी को लक्षित करके उत्पीड़न करता है या कानून का उल्लंघन करता है, तो कानूनी व्यवस्था को अपना काम करना चाहिए।
लेकिन रोजमर्रा की भाषा में सम्मान पैदा करने का काम पुलिस नहीं कर सकती।
यह काम परिवार, विद्यालय और समाज को करना होगा।
बच्चे को यह समझाना होगा कि—
गाली इसलिए गलत नहीं है कि कोई उसे पकड़ लेगा; बल्कि इसलिए गलत हो सकती है क्योंकि सामने वाला भी उतनी ही गरिमा का हकदार है जितने हम खुद।
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परिवार पहला विद्यालय है
बच्चे को संस्कार देने के लिए बड़े-बड़े भाषणों की जरूरत नहीं होती।
वह घर में सुनता है।
वह घर में देखता है।
यदि माता-पिता आपस में सम्मान से बात करते हैं, तो बच्चा सम्मान सीखता है।
यदि घर में हर असहमति गाली और चिल्लाहट में बदलती है, तो बच्चा वही भाषा बाहर ले जाएगा।
इसलिए बच्चों से केवल यह कहना पर्याप्त नहीं—
"गाली मत दो।"
हमें अपने व्यवहार से दिखाना होगा कि बिना गाली दिए भी गुस्सा किया जा सकता है, असहमति जताई जा सकती है और अपनी बात मजबूती से रखी जा सकती है।
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विद्यालय केवल परीक्षा की जगह नहीं है
शिक्षा का अर्थ केवल परीक्षा पास करना और नौकरी पाने की योग्यता हासिल करना नहीं है।
शिक्षा व्यक्ति को यह भी सिखाती है कि समाज में दूसरे मनुष्यों के साथ कैसे रहना है।
इसलिए विद्यालयों में सम्मानजनक संवाद, असहमति का सम्मान, डिजिटल नागरिकता और जिम्मेदार अभिव्यक्ति जैसे विषयों पर बातचीत जरूरी है।
बच्चों को यह समझाना होगा कि इंटरनेट पर लिखा हुआ शब्द भी उतना ही वास्तविक प्रभाव डाल सकता है जितना सामने बोल दिया गया शब्द।
स्क्रीन के पीछे बैठकर किसी को गाली देना आसान है।
लेकिन यह याद रखना जरूरी है—
स्क्रीन के दूसरी तरफ भी एक इंसान है।
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हमें क्या करना चाहिए?
समाधान बहुत कठिन नहीं है।
शुरुआत छोटी-छोटी जगहों से हो सकती है।
घर से।
विद्यालय से।
दोस्तों के बीच।
सोशल मीडिया से।
और सबसे पहले अपने आप से।
हमें हर गाली पर युद्ध करने की जरूरत नहीं है।
लेकिन उसे सामान्य और गौरव की चीज बनाने से बचना जरूर होगा।
बच्चों को यह समझाना होगा कि मजाक और अपमान के बीच एक सीमा होती है।
दोस्ती और बेइज्जती एक चीज नहीं है।
आत्मविश्वास और आक्रामकता एक चीज नहीं है।
बोलने की आजादी और किसी को अपमानित करने की आजादी भी एक चीज नहीं है।
और सबसे जरूरी बात—
गुस्सा होना गलत नहीं है। लेकिन गुस्से में दूसरे की गरिमा खत्म कर देना सही नहीं हो जाता।
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अंत में सवाल भाषा का नहीं, हमारी संवेदनशीलता का है
समय के साथ भाषा बदलेगी।
कुछ पुराने शब्द खत्म होंगे, नए शब्द आएँगे।
यह स्वाभाविक है।
हमें भाषा को संग्रहालय में रखकर बचाने की जरूरत नहीं है।
हमें केवल यह देखना है कि भाषा बदलते-बदलते हमारी संवेदनशीलता न बदल जाए।
गाली का सबसे बड़ा खतरा शायद वह शब्द नहीं है जो हम बोलते हैं।
खतरा तब पैदा होता है जब सामने वाले के अपमान से हमें कोई फर्क पड़ना बंद हो जाए।
जब किसी की माँ, बहन, परिवार, शरीर या निजी जीवन को निशाना बनाकर हँसना मनोरंजन लगने लगे।
जब तर्क खत्म होते ही गाली शुरू हो जाए।
और जब गाली देने वाले को गलत कहने के बजाय हम कहें—
"अरे, मजाक कर रहा था।"
यहीं हमें रुककर सोचना चाहिए।
क्योंकि समाज केवल कानूनों से नहीं बनता।
समाज रोजमर्रा के व्यवहार से बनता है।
हम जिस तरह बोलते हैं, उसी तरह की सामाजिक दुनिया धीरे-धीरे हमारे आसपास बनती जाती है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि गाली किसने शुरू की।
सवाल यह है—
क्या हम उसे सामान्य बनाना चाहते हैं?
अगर जवाब नहीं है, तो शुरुआत किसी कानून से नहीं, हमारी अपनी जुबान से होनी चाहिए।
क्योंकि शब्द हवा में खत्म नहीं हो जाते।
वे बच्चों के व्यवहार में जाते हैं।
रिश्तों में उतरते हैं।
समाज की भाषा बनते हैं।
और धीरे-धीरे हमारी सार्वजनिक संस्कृति को प्रभावित करते हैं।
भाषा की मर्यादा केवल अच्छे शब्दों की बात नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि हम दूसरे इंसान
की गरिमा को कितना महत्व देते हैं।
और शायद सभ्य समाज की सबसे सरल पहचान यही है—
जहाँ असहमति हो सकती है, गुस्सा हो सकता है, बहस हो सकती है—लेकिन सामने वाले की इंसानियत बची रहती है।
इस विषय पर आप मेरा पिछला लेख भी पढ़े
गाली और बदलती सामाजिक भाषा के सवाल पर मैंने पहले भी “गाली : संस्कृति का उदय — भाषा के गिरते मानक” शीर्षक से लिखा था। उस लेख में इसी विषय को एक अलग दृष्टिकोण से देखने की कोशिश की गई थी।
इस लेख के साथ उस पुराने लेख को भी पढ़ें, ताकि इस बदलती भाषा और सामाजिक संस्कृति के दोनों पक्षों को समझा जा सके।

सारगर्भित लेख, समाज को इस पर ध्यान देना चाहिए।
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